हनुमान भक्त हूँ मैं, गले में रुद्राक्ष पहनता हूँ

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बजरंग पूनिया किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। बजरंग पूनिया तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए और उन मुश्किलों के सामने न झुकते हुए संघर्ष किया और 2018 में वो कर दिखाया जो करने का बड़े बड़े पहलवान सिर्फ सपना देखते हैं।  पहलवान बजरंग पूनिया ने एशियन गेम 2018 में पुरुषों की 65 किलोग्राम वर्ग कुश्ती स्पर्धा के फाइनल में जापान के पहलवान तकातानी डियाची को एकतरफा मुकाबले में 11-8 से पटखनी देकर गोल्ड जीता। . एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाले भारत के 9वें पहलवान बने। बजरंग पूनिया के मैडल को मीडिया ने ज्यादा तवज्जो नहीं दी क्योंकि उन्होंने अपना यह गोल्ड मेडल पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी बाजपेयी को समर्पित किया. यहां पर मीडिया की संकुचित सोच और असहिष्णुता के दर्शन होते हैं।

26 फरवरी 1994 को हरियाणा के झाझर गाँव में जन्मे बजरंग पूनिया के पिता बलवान सिंह भी एक पेशेवर पहलवान है. इनकी माता का नाम ओमप्यारी हैं.

बजरंग पूनिया को कुश्ती विरासत में मिली. इनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि बजरंग पूनिया को बचपन में दूध भी नहीं मिलता था. बजरंग के लिए दूध का इंतजाम करने के लिए इनके पिताजी बस का किराया बचाकर साइकिल से अपना काम पूरा करते थे. बजरंग की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही पूरी हुई. सात साल की उम्र में कुश्ती शुरू की और उन्हें उनके पिता द्वारा बहुत सहयोग मिला. बजरंग ने महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातक की शिक्षा पूरी की . बजरंग पूनिया ने भारतीय रेलवे में  TTE का भी काम किया.

बजरंग पूनिया भगवान को बहुत मानते हैं। वे  कहते  हैं  कि मैं बजरंग बली का भक्त हूँ  और गले में रुद्राक्ष पहनता हूँ। रुद्राक्ष पहनकर मुझे शांति मिलती हैं।

ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ मुकाबले के वक्त ईश्वर को याद करते हैं। बजरंग पूनिया ट्रेनिंग, आराम व पूजा पाठ को बराबर समय देते हैं। इसके साथ वे अपने आपको तरोताज़ा रखने के लिए बास्केटबॉल भी खेलते हैं। वे कहते हैं कि पूजा पाठ ने उन्हें मानसिक तौर पर मजबूत बनाया है। जब उन्हें महसूस होता है कि बजरंग बली उनके साथ है, तो शरीर में ताकत दोगुनी महसूस होती है और सामने वाला अपनी आधी ताकत खो देता है।

बजरंग पूनिया कहते हैं कि जीत-हार का फैसला किस्मत से भी जुड़ा होता है। 2015 वर्ल्ड चैंपियनशिप की का मुुकाबला मुझे कभी नहीं भूलता। मुकाबला मैं जीतते जीतते हार गया। वह हार मुझे कचोटती रही। आज मेरे पास 3 गोल्ड होते। लेकिन उस हार ने मुझे और मेहनत करने की प्रेरणा दी। उस दिन मुझे समझ में आया कि मैंने अपने आप में विश्वास खोया। नतीजा यह हुआ कि मुझसे गलती हुई और मेरी गलती का फायदा सामने वाले पहलवान ने उठाया और मैं मुकाबला जीतते जीतते हार गया।

योगी भाई के बारे में बताते हुए बजरंग पूनिया कहते हैं कि योगी भाई मेरे गुरु और बड़े भाई जैसे हैं। 2014 में उन्होंने गोल्ड जीता था और मैंने सिल्वर। तब उन्होंने अपना गोल्ड मुझे दिया था और कहा था कि ये गोल्ड अगली बार तुम्हारे द्वारा जीता जाना चाहिए। मैंने उनसे वादा किया था इस बार गोल्ड लाने का। और बजरंग बली के आशीर्वाद से मैंने अपना वादा निभाया। योगी भाई मुझे अपने परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं। पहलवानी से अलग भी मेरी कई समस्याओं में मेरी मदद करते हैं। मेरी गलती पर मुझे डांट भी देते हैं। अगर दोबारा गलती हो जाये तो मुझसे बहुत नाराज भी हो जाते हैं। उनकी यही हिदायत होती है कि कोई गलती दोबारा न हो। वह बहुत बड़े पहलवान हैं। ओलंपिक में दो-दो बार उन्होंने मेडल जीता है। मैं उनकी सभी सलाह पूरी तरह गंभीरता से लेता हूं।

 

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