जब सच्चे जाट नायक धौलपुर नरेश ने जाटों का मस्तक ऊँचा किया

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जब सच्चे जाट नायक श्रीमान् महाराणा उदयभान सिंह धौलपुर नरेश ने जाटों का मस्तक ऊँचा किया

वर्ष सन् 1938 के चैत्र माह का वह दिन दिल्ली के धर्म प्रेमियों के लिए जैसे एक नव संदेश लेकर आया था। उस दिन दिल्ली में एक अत्यंत भव्य मंदिर की आधारशिला रखी जानी थी, जिसका नाम लक्ष्मीनारायण मंदिर रखा गया था।

इस मंदिर का निर्माण भारत के सबसे धनाढ्य व्यक्तियों में से एक, राजा बलदेव दास बिड़ला करा रहे थे। मंदिर की आधारशिला रखने का कार्यक्रम अत्यंत ही भव्य था। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए देश के कोने-कोने से धर्मपरायण प्रजा और सभी राजे-रजवाड़ों को निमंत्रित किया गया था। मंदिर प्रांगण में बहुत ही चहल-पहल थी। साधारण प्रजा से लेकर राजे-महाराजे तक इस कार्यक्रम में बड़ी शान के साथ भाग लेने आये थे। मराठे और राजपूताने से आये राजा-महाराजा अपनी विशेष शाही पोशाकों में सजे-धजे थे।

अति चर्चित लक्ष्मीनारायण मंदिर की आधारशिला कौन रखेगा, यह अभी निश्चित नहीं हुआ था। वह सौभाग्यशाली व्यक्ति कौन होगा जो मंदिर की आधारशिला रखेगा, किसी को पता नहीं था। प्रत्येक राजा को आशा थी कि वही वह सौभाग्यशाली व्यक्ति होगा जिसे मंदिर की आधारशिला रखने के लिए आमंत्रित किया जायेगा।

इस कार्यक्रम में धौलपुर नरेश महाराणा उदयभान सिंह अत्यंत सादी पोशाक में उपस्थित हुए थे। भरतपुर नरेश महाराजा ब्रजेन्द्र सिंह किसी कारणवश इस समारोह में भाग लेने के लिए नहीं आ सके थे।

समारोह आरम्भ हुआ। विख्यात शिक्षाविद् तथा विद्वान पंडित मदन मोहन मालवीय खड़े हुए। उन्होंने मंदिर का शिलान्यास करने वाले योग्य व्यक्ति के गुणां से सम्बन्धित शर्तों को पढ़ना आरम्भ किया।

पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा, ‘भारत के विद्वजनों ने इस मंदिर की आधारशिला रखने वाले व्यक्ति के लिए कुछ शर्तों को पूरा करने का प्रस्ताव रखा है। जो व्यक्ति इन सभी शर्तों को पूरा करेगा, केवल वही व्यक्ति इस लक्ष्मी नारायण मंदिर की आधारशिला रखने का अधिकारी होगा।’

पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब मंदिर की आधारशिला रखने वाले व्यक्ति के लिए शर्तों को पढ़ना शुरू किया, तो सभा में सन्नाटा व्याप्त हो गया। मालवीय जी ज्यों-ज्यों उन शर्तों को पढ़ते जा रहे थे, सभा में बैठे राजाओं के चेहरे नीचे की ओर झुकते जा रहे थे। पंडित मदन मोहन मालवीय ने जब मंदिर की आधारशिला रखने वाले व्यक्ति की तमाम विशेषताओं का उल्लेख कर दिया, तो उस समय सभागार में जैसे पैना सन्नाटा छा गया। लगता था जैसे वहां बैठे सब व्यक्तियों को सांप सूंघ गया था।

पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा मंदिर की आधारशिला रखने वाले व्यक्ति के लिए जिन गुणों और विशेषताओं का उल्लेख किया था, वे इस प्रकार थीं-

‘पवित्र लक्ष्मी नारायण मंदिर की आधारशिला रखने वाला व्यक्ति उच्च कुलीन होना चाहिए, वह व्यक्ति उच्च आदर्शों वाला हो, वह शराब और मांस का भक्षण न करता हो। उस व्यक्ति ने एक से अधिक विवाह न किये हों। उसके वंश में कभी किसी ने मुगलों को अपनी बेटी न दी हो तथा जिसके दरबार में रंडियों के नाच-गाने न होते हों।’

पंडित मदन मोहन मालवीय ने जिन उपरोक्त गुणों की व्याख्या की थी, इन गुणों का किसी एक व्यक्ति में मिलना सम्भव न लगता था। कारण कि तत्कालीन लगभग सभी राजे-महाराजे शराब और मांस का उपभोग करते थे। वे ऐश्वर्य भोग हेतु कई-कई विवाह तो रचते ही थे, साथ ही अनेकों रखैलों को भी अपनी उप पत्नियों के रूप में अपने महल में रखते थे। वे आमोद-प्रमोद हेतु अपने दरबार में रंडियों का नाच कराना गौरव समझते थे।

सभागार में उस समय ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी, जैसी राजा जनक के दरबार में धनुष यज्ञ के समय हो गयी थी। कोई भी राजा स्वयं को आधारशिला रखने का अधिकारी कहने का साहस नहीं कर पा रहा था।

पंडित मदन मोहन मालवीय को मंदिर की आधारशिला रखने के लिए उपयुक्त व्यक्ति चुनने का अधिकार दिया गया। उन्होंने सभागार में खड़े होकर घोषणा की, ‘मेरी दृष्टि में यहां उपस्थित सभी जनों में इस प्रस्ताव की कसौटी पर केवल धौलपुर नरेश महाराणा उदयभान सिंह जी ही खरे उतरे हैं। अतः उनके कर कमलों के द्वारा ही मंदिर की आधारशिला रखी जायेगी।’

पंडित मदन मोहन मालवीय की इस घोषणा को सुनकर जाटों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। मुजफ्फरनगर जिले के सौरम गांव के प्रसिद्ध मल्ल चौ. हरज्ञान सिंह ने सभा में खड़े होकर कहा, ‘पंडित मदन मोहन मालवीय जी के इस निर्णय ने समस्त जाटों का मस्तक भारतवर्ष में ऊंचा कर दिया है।’ यह कहते हुए हरज्ञान सिंह ने अपनी दो धड़ी भारी गदा को वहां पड़े एक भारी पत्थर पर इतने जोर से मारा कि पत्थर के टुकड़े-टुकड़े हो गया।

धौलपुर नरेश महाराणा उदयभान सिंह ने अपने कर कमलों के द्वारा लक्ष्मी नारायण मंदिर, जिसे आज बिड़ला मंदिर के नाम से जाना जाता है, का शिलान्यास किया और राष्ट्रीय स्तर पर जाटों का गौरव बढ़ाया। इस मंदिर में स्थित एक शिला स्तम्भ पर अंकित यह लेख लिखा है-

‘श्री महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से ‘श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर’ की आधारशिला श्रीमान् महाराणा उदयभान सिंह धौलपुर नरेश के कर कमलों द्वारा चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या, रविवार विक्रमी संवत् 1989 (सन 1932) में स्थापित हुई’।

बिड़ला मंदिर के इसी स्तम्भ के दूसरी ओर संगमरमर के पत्थर पर पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा के बांई ओर धौलपुर नरेश उदयभान सिंह की मंदिर का शिलान्यास करती हुई प्रतिमा को देखकर हर जाट का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है और उसका सीना चौड़ा हो जाता है।

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