अलीगढ के क्रांतिकारी जाट राजा अमानी सिंह

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अलीगढ में जली क्रांति की ज्वाला

1857 में जन क्रांति जिसे स्वाधीनता संग्राम के नाम से जाना जाता है, बेशक इसमें जाटों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही. आज़ादी की यह आग धीरे-धीरे दिल्ली के आसपास के सारे जाट क्षेत्र में फैलती हुई  उ. प्र. के अलीगढ़ क्षेत्र तक भी जा पहुंची थी। इस क्षेत्र के जाटों को मेरठ के सैनिक विद्रोह का समाचार मिला था। विद्रोह का समाचार मिलते ही जैसे पूरे अलीगढ़ क्षेत्र की जनता के हृदय में अंग्रेजों के विरुद्ध व्याप्त नफरत का पैमाना छलक उठा। क्षेत्र के अधिकांश जाट युवक सर पर कफ़न बाँध कर घरों से निकल पड़े. जहां भी कोई अंग्रेज़ दिखाई दिया,जाटों ने उसे वहीं मार डाला। इस कार्य में क्षेत्र के सभी गाँव के जाटों ने भाग लिया।

राजा अमानी सिंह ने किया जाट शक्ति का नेतृत्व

अलीगढ़ जिले की इगलास तहसील में जाट काफी संख्या में निवास करते थे। जाटों का बच्चा-बच्चा क्रांति की खबर पाकर रोमांचित था। जाट युवकों के गुट के गुट इलाके में अंग्रेजों को खोजते फिर रहे थे। उन्हें जहां भी कहीं कोई अंग्रेज दिखाई देता था, वे उसे तत्काल मार डालते थे। जाटों ने गहोन गांव निवासी अमानी जाट के नेतृत्व में जैसे विप्लव ही मचा दिया था। जाटों ने अमानी सिंह के नेतृत्व में इगलास तहसील पर आक्रमण किया। वहां के तहसीलदार ने क्रांतिकारियों पर रौब गाफिल करने के लिए उन्हें धमकाया, तो क्रांतिकारियों ने उसे दौड़ा-दौड़ाकर मारा। क्रांतिकारियों ने अमानी जाट को क्षेत्र का राजा घोषित कर दिया। क्योंकि उसने क्रांति में सबसे अधिक योगदान दिया था और वीरता का प्रदर्शन किया था।

राजा अमानी सिंह के आगे पस्त हुई अंग्रेजी सेना

अंग्रेजी सेना का मेजर बर्लटन इस क्षेत्र में विद्रोह दबाने के लिए विशाल सेना लेकर यहां आया, तो राजा अमानी सिंह के नेतृत्व में जाटों ने उसका डटकर सामना किया। जहां बर्लटन पर आधुनिक बंदूकें और तोपें थीं, तो राजा अमानी सिंह भी कम नहीं थे। उन्होंने भी बंदूकों और तोपों की व्यवस्था की हुई थी। दोनों ओर से डटकर बंदूककें व तोपें चलीं। किंतु दुर्भाग्यवश वर्षा हो जाने से जाटों की तोपों के पलीते भीग गये और उनकी तोपें शांत हो गयीं। अंग्रेजों का तोपखाना अत्यंत आधुनिक था, जिस पर वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। इस कारण लड़ाई में अंग्रेजों का पलड़ा भारी रहा और जाटों को उनके मुकाबले में मैदान छोड़ना पड़ा। लेकिन राजा अमानी सिंह ने साहस नहीं खोया। उन्होंने क्रांतिकारियों को फिर से एकजुट किया और गांव बेसवा व अन्य कई गांव के जाट क्रांतिकारियों ने इगलास में मोर्चा छोड़ते ही खैर तहसील पर हमला कर दिया। वहां उन्होंने तहसील को जी भरकर लूटा और अंग्रेजी राज के चिन्हों को बुरी तरह से नष्ट कर दिया। लेकिन वे अंग्रेजो को पूरी तरह हरा नहीं पाए और इस तरह इगलास तहसील में विद्रोह का अंत हो गया.

राजा अमानी सिंह शहीद हुए

विद्रोह के शमन हो जाने के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर कहर बरपा कर दिया। अंग्रेजों का सबसे अधिक कहर जाटों पर ही टूटा, क्योंकि उन्होंने ही यहां क्रांति में सबसे अधिक भाग लिया था और अंग्रेजों को सबसे अधिक हानि भी पहूँचायी थी। अंग्रेजों ने 1858 के 10 वें एक्ट के अनुसार इगलास तहसील के बेसवा, तुलसेरा, गहलुवा, गोंडा आदि गांवों के बहुत से जाटों को पकड़कर फांसी पर लटकाया और कई लोेगों की जमीनें छीनकर दूसरे लोगों को दे दीं। राजा अमानी सिंह भी गिरफ्तार कर लिए गए. अंग्रेजों ने राजा अमानी सिंह को बहुत ही बेदर्दी से फांसी दे दी ।

जाटों की जमीन जब्त की गयी

जमीन जब्ती के दौरान खैर तहसील में जाटों की 5810 एकड़ भूमि, सिकन्दराराऊ तहसील में 860 एकड़, अलीगढ़ में 2876 एकड़, इगलास तहसील में 3650 एकड़, अतरौली में 650 एकड़ व हाथरस में 975 एकड़ जमीन जब्त हुई थी।
अलीगढ़ के अतिरिक्त सिकन्दरा, राऊ, अतरौली, अकबराबाद, हरदुआगंज आदि में भी जाटों ने अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंचायी थी। यहां के महताब सिंह व मंगल सिंह ने एक मजबूत संगठन बनाया था। उनके संगठन में आसपास के अनेकों गांवों के जाट युवा, अधेड़ तथा वृद्धों ने अंग्रेजों को इस क्षेत्र से भगाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इन लोगों ने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दी थीं। तीन माह तक क्षेत्रीय क्रांतिकारियों ने पूरे क्षेत्र को अंग्रेजी शासन से मुक्त रखा। बादशाह बहादुरशाह जफर ने इस क्षेत्र के क्रांतिकारियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
यहां के बड़गूजर जाटों ने भी इस क्रांति में बहुत ही बढ़-चढ़कर भाग लिया था। उन्होंने अतरौली में ज्वायंट मजिस्ट्रेट मुहम्मद अली को तहसील के फाटक पर जान से मार डाला था।
उस समय जमानापार (वर्तमान हरियाणा) के जाटों के जत्थे भी अलीगढ़ के जाटों की सहायता के लिए आये थे और जाटों के साथ मिलकर अंग्रेजी राज को  नष्ट  करने में अलीगढ़ के जाटों का साथ दिया था।

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