महाराजा सूरजमल के एक पत्र से हारा अब्दाली

Please Share!

दिल्ली को जीतने के घमण्ड मे चूर अहमदशाह अब्दाली को लगा कि अब जैसे सारा संसार उसके कदमों के नीचे आ गया है। उसे अब पूर्ण विश्वास हो गया था कि अब वह भारत के प्रत्येक राजा से बिना युद्ध किये ही आसानी से कर वसूल कर सकेगा। उसको पता चला था कि उस समय भरतपुर सम्राट महाराजा सूरजमल  भारत के राजाओं में सबसे धनी राजा थे। कुछ समय पूर्व सूरजमल ने अब्दाली को पांच लाख रुपये और उसके मंत्री को दो लाख रुपये देने का वचन दिया था। परंतु सूरजमल ने अभी तक अपना वचन नही निभाया था। उसने महाराजा सूरजमल को एक धमकी भरा पत्र लिखा। उसनेआदेश दिया कि वह राज-कर देने के लिए उसके सामने हाजिर हों और उसके झण्डे के नीचे रहकर मेरी सेवा करें और मुगल सल्तनत के छीने इलाकों को वापिस लौटा दे तथा दिल्ली दरबार के दुश्मनों को जो उसके पास हैं, उनको अविलम्ब दिल्ली दरबार को भेज दे।

महाराजा सूरजमल की ताकत का अंदाज़ा नहीं था अब्दाली को

सूरजमल को समाचार मिल चुका था कि अहमदशाह अब्दाली नामक उस तूफान से सारा उत्तरी भारत भयाक्रांत था और सब राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। लेकिन सूरजमल जानता था कि अब्दाली केवल अपने कट्टरता के कारण ही लोगों के जेहन पर भय बैठा रहा था। असल में अब्दाली ने अभी तक किसी से सीधे-सीधे युद्ध किया ही नहीं था। उसके सैनिक जो केवल लूट के लालच मे उसके साथ आये थे और जिनको अब तक हर नगर में जी भरकर लूटने का अवसर मिला था, के सामने जब जाट वीर युद्ध के लिए खड़े होंगे, तो वे अवश्य ही मैदान छोड़कर भाग खड़े होंगे। न तो अब्दाली ने और न ही उसके सैनिकों ने अभी ठीक से जाटों की तलवारों काी परख नहीं की थी। इसलिए सूरजमल ने अब्दाली के धमकी भरे पत्र को कोई महत्व नहीं दिया और अब्दाली के पत्र के उत्तर में डेढ़ पंक्ति का उत्तर भेजा, ‘‘जब बड़े-बड़े जमींदार हुजूर की सेवा में हाजिर होंगे, तब इस किसान को भी शाही ड्योढ़ी पर आने मंे कोई गुरेज न होगा। जिन्होंने मेरे पास शरण ली है, मैं उन्हें कैसे भेज सकता हूं।’’

अब्दाली ने किया नरसंहार

अब्दाली समझ गया था कि सूरजमल अब उसे कभी धन न देगा। अतः उसने गुस्से मे भरकर बल्लभगढ़, मथुरा और आगरा पर आक्रमण कर वहां भारी लूट और मारकाट मचायी। उसकी सेना ने इन नगरों के धर्मपरायणा लोगों का कत्ले-आम कर दिया। वहां के अनेकों मन्दिरो को तोड़ दिया गया। जगह-जगह हिन्दुओं के कटे सिरों के स्तूप नजर आने लगे थे। जवान और सुन्दर स्त्रियों को अब्दाली के सैनिकों ने कैद कर लिया।
मराठे जो अब तक इस क्षेत्र के स्वामी बने बठे थे और वहां से करों की उगाही कर रहे थे, अब्दाली के आने का समाचार पाते ही दूम दबाकर भाग गये थे। उस समय केवल सूरजमल के साहसी पुत्र जवाहर सिंह के नेतृत्व में भरतपुर की सेना ने ही अब्दाली की सेना का भरसक विरोध किया था।
सूरजमल उस समय भरतपुर के किले में युद्ध की तैयारियों में लगा हुआ था। उसे पता था कि अब्दाली उस पर आक्रमण अवश्य करेगा। वह सूरजमल अब्दाली को ऐसा सबक सिखाना चाहता था कि वह वहां से दुम दबाकर भाग खड़ा हो और फिर कभी भी भारत की ओर पैर करके भी न सोये। अब्दाली भी सूरजमल की ओर से आशंकित था और सूरजल से टकराने से बच रहा था और सूरजमल कोे धमकी में लेकर उससे मोटी रकम वसूल करनी चाहता था। अतः उसने सूरजमल को धमकी भरे पत्र लिखा कि यदि उसने उसे वांछित धन नहीं दिया, तो सूरजमल के भरतपुर, डीग और कुम्हेर के किलों को भूमिसात कर दिया जायेगा।
सूरजमल अब्दाली की इस धमकी से जरा बराबर भी नहीं डरे। उन्होने अब्दाली के पत्र के उत्तर में एक पत्र लिखा, जो न केवल उसके साहस को ही दर्शाता है, वरन् वह सूरजमल की पत्र लेखन-कला का एक अद्वितीय नमूना है। इसमें दृढ़ता के साथ चतुराई का, अप्रतिम साहस के साथ खिझाने वाली स्पष्टवादिता का, अभिमान के साथ विनय का सम्मिश्रण है। इसके अलावा यह पत्र बड़ी धीरता से भरा था। इस पत्र में सूरजमल ने अब्दाली को स्पष्ट चेतावनी व धमकी भी दी थी। यह पत्र संसार भर के कूटनीतिज्ञों के लिए ईष्र्या का विषय है। इसी पत्र से ही अब्दाली सूरजमल से परास्त हो गया था।

महाराजा  सूरजमल का अब्दाली को जवाब

राजा सूरजमल ने लिखा था-
‘‘हिंदुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्वपूर्ण स्थिति और शक्ति नहीं है। इसीलिए इस काल के किसी सम्राट ने मेरे मामलों में अपना दखल देना अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं समझा। अब हुजूर जैसे एक शक्तिशाली सम्राट ने युद्ध के मैदान में मुझसे मिलने और मुकाबला करने का दृढ़ निश्चय किया है और इस नगण्य से व्यक्ति के लिए अपनी सेनाएं ला खड़ी की हैं। खाली यह कार्रवाई ही शाह की शान और बड़प्पन के लिए शर्मनाक होगी। इससे मेरी स्थिति ऊंची होने में सहायता मिलेगी और मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के लिए यह अभिमान की बात होगी। दुनिया कहेगी कि ईरान और तूरान के शहंशाह ने बहुत ही ज्यादा डरकर, अपनी सेनाएं लेकर एक कंगाल बंजारे पर चढ़ाई कर दी। केवल ये शब्द ही राजमुकुट प्रदान करने वाले हुजूर के लिए कितनी शर्म की चीज होंगे। फिर अंतिम परिणाम भी अनिश्चितता से पूरी तरह से रहित नहीं हैं। यदि आप इतनी शक्ति और साज सामान लेकर मुझ जैसे कमजोर को बरबाद कर देने में सफल हो भी जाएं, तो इससे आपको क्या यश मिलेगा? मेरे बारे में तो लोग केवल यही कहेंगे कि उस बेचारे की शक्ति और हैसियत ही कितनी सी थी। परंतु यदि भगवान की इच्छा से जो कि किसी को मालूम नहीं है, मामला कहीं उलट गया, तो उसका परिणाम क्या होगा? यह सारी शक्ति और प्रभुत्व, जो हुजूर के सैनिकों ने ग्यारह वर्षों में कमाया है, क्षण भर में ही नष्ट हो जायेगा।’’
‘‘यह अचरज की बात है कि इतने बड़े दिल वाले हुजूर ने इस छोटी सी बात पर गौर नहीं किया और इतनी भारी भीड़-भाड़ और इतने बड़े लाव लश्कर के साथ सीधे-सादे तुच्छ से अभियान पर स्वयं आने का कष्ट उठाया। जहां तक मुझे कत्ल करने और मेरे देश को बरबाद कर देने का धमकी भरा प्रचंड आदेश देने का प्रश्न है, वीरों को इस बात का कभी भय नहीं हुआ करता। सभी को मालूम है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस क्षण-भंगुर जीवन का तनिक भी भरोसा नहीं किया करता। रही मेरी बात, तो जीवन के पचास सोपान पहले ही पार कर चुका हूं। और अभी कितने बाकी हैं, मुझे मालूम नहीं। मेरे लिए इससे बढ़कर वरदान और कुछ नहीं हो सकता कि मैं मातृभूमि हित में बलिदान के अमृत का पान करूं। यह देर-सवेर योद्धाओं के अखाड़े में और युद्ध के मैदान में वीर सैनिकों के साथ करना ही पड़ेगा। मैं चाहता हूं कि काल-ग्रंथ के पृष्ठों पर अपना और अपने पूर्वजों का नाम छोड़ जाऊं, जिससे लोग याद करें कि एक बेजोर किसान ने एक ऐसे महान और शक्तिशाली सम्राट से बराबरी का दम भरा, जिसने बड़े-बड़े राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया और वह किसान लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ था। और ऐसा ही शुभ संकल्प मेरे निष्ठावान अनुयायियों और साथियों के हृदय में भी विद्यमान है। यदि मैं चाहूं भी कि मैं आपके दैवी दरबार की देहरी पर आकर उपस्थित हाऊं, तो भी मेरे मित्रों की प्रतिष्ठा मुझे ऐसा नहीं करने देगी। ऐसी दशा में, यदि न्याय के निर्झर हुजूर मुझे, जो कि तनिक कमजोर हूं, क्षमा करें और अपना ध्यान किन्हीं अन्य महत्वपूर्ण अभियानों पर लगाएं, तो उससे आपकी प्रतिष्ठा या कीर्ति को कोई हानि नहीं पहुंचेगी। मेरे इन तीन किलों (डीग, कुम्हेर और भरतपुर) के बारे में, जिन पर हुजूर को रोष है और जिन्हें हुजूर के सरदारों ने मकड़ी के जाले सा कमजोर बताया है, की सच्चाई की परख लड़ाई के बाद ही हो पायेगी। भगवान ने चाहा, तो ये किले सिकन्दर के गढ़ जैसे अजेय ही रहेंगे।’’
सूरजमल के इस पत्र का अब्दाली पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह सूरजमल पर आक्रमण करने की बात सदा के लिए दिल से निकालकर चला गया। इस प्रकार जाटों के विरुद्ध अब्दाली का संग्राम सैनिक दृष्टि से अत्यंत ही असफल रहा। राजनीतिक दृष्टि से महाराजा सूरजमल ने अब्दाली की तुलना में अधिक सूझबूझ से काम लिया। चैमुहा में सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने जो वीरता दिखायी थी, वह भी अनदेखी न रह सकी। यह निर्विवाद रूप से स्वीकार कर लिया गया कि हिंदुस्तान में केवल जाट ही ऐसे लोग हैं, जो अपने धर्म स्थानों की रक्षा के लिए प्राण दे सकते हैं।

Related Posts