1857 के स्वाधीनता संग्राम में मुरादाबाद के पछादे जाटों का योगदान

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1857 के स्वाधीनता संग्राम में मुरादाबाद के जाटों की बहुत सहभागिता रही। मेरठ में क्रांति की ज्वाला के फूटते ही मुरादाबाद में भी इसका समाचार मिल गया था, और यहाँ  की जनता ने क्रांति का उद्घोष कर अंग्रेजों का सफाया आरम्भ कर दिया था। मुरादाबाद जनपद में कई स्थानों पर जाटों ने सक्रिय क्रांति में शामिल होकर अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंचायी थी। मुरादाबाद में पंजाब से आकर बसे पंजाबी (पछादे) जाटों के गांव कैलसा, सिंहपुर सानी, खण्डसाल व लखोरी आदि कई गांवों के जाटों ने इस क्रांति में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। उन्होंने 20 मई 1857 को अमरोहा तहसील व थाने को लूटकर जला दिया था। जाटों ने तहसील को लूटकर आग के हवाले कर दिया। जाटों को तहसील की लूट से 17 हजार रुपये की प्राप्त हुए। इस लूट की रकम से जाटों ने नये अस्त्र-शस्त्र खरीद लिये। जाटों ने अमरोहा क्षेत्र को आजाद घोषित कर दिया। जाटों ने जगह-जगह स्वाधीन भारत का झण्डा फहराकर अपनी जीत की घेाषणा कर दी।

29 मई को मेरठ से विद्रोही सैनिकों की एक टुकड़ी मुरादाबाद पहुंची, उस समय मुरादाबाद में क्रांति की ज्वाला ने और वेग पकड़ा। गांव-गांव में मेरठ की विद्रोही सेना के आने का समाचार फैल गया। लोगों में आजादी हासिल करने का जोश ठाठें भरने लगा। फिर तो लोग चारों ओर से अंग्रेजों के साम्राज्य का नाश करने के लिए अपने घरों से निकल पड़े।

जाटों ने अंग्रेजों का सहयोग भी किया

लेकिन अमरोहा तहसील के अंग्रेज भक्त जाट तहसीलदार गुरुसहाय सिंह के प्रभाव के चलते जाटों ने अंग्रेजी शासन की सहायता की थी। गुरुसहाय ने मुरादाबाद के कलेक्टर की अनुमति से मुरादाबाद-दिल्ली राजमार्ग पर आसपास के जाटों के सहयोग से शांति स्थापना करने का कार्य किया था। उन्होंने बहुत से अग्रेजों को क्रांतिकारियों के हाथों मरने से बचाया था।

देसी सैनिकों ने किया विद्रोेह

मेरठ की विद्रोही सेना को दबाने के लिए अंग्रेजों ने देसी सैनिकों की 29 नम्बर पैदल पलटन को भेजा। लेकिन ये सैनिक विद्रेोही सैनिकों से मिल गये और उन्होंने इन सैनिकों को हर प्रकार की सहायता देने का वचन दिया। अंग्रेजी सेना के देसी सैनिकों ने वापिस जाकर अपने अधिकारियों को बताया कि क्रांतिकारी सैनिक मेरठ की ओर वापिस भाग गये हैं। अंग्रेज अधिकारी विद्रोहियों की ओर से आश्वस्त हो गये। किंतु जब कुछ देर बाद मुरादाबाद के सैनिकों के साथ मेरठ के साथ विद्रोही सैनिकों की टुकड़ी ने शहर में प्रविष्ट कर अंग्रेजों को घेर लिया और उन्हें चेतावनी दी कि ‘ब्रिटिश शासन समाप्त हो चुका है। सभी अंग्रेज दो घण्टों के भीतर ही मुरादाबाद छोड़ दें, वरना अनका कत्ले आम कर दिया जायेगा’ तो अंग्रेजों के हाथों के तोते उड़ गये। अंग्रेज तुरंत मुरादाबाद से पलायन करने लगे।

मुरादाबाद में इस्लाम अपनाकर बचे अंग्रेज

अंग्रेज कमिश्नर पावेल और उसके साथियों को रास्ते में मुसलमानों के एक जत्थे ने घेर लिया। मुसलमानों ने उनसे कहा कि यदि वे अपनी जान बचाना चाहते हैं, तो वे इस्लाम धर्म कबूल कर लें। मरता क्या न करता, पावेल और उसके साथियों ने अपनी जान बचाने के लिए तुरंत ही इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। मुसलमान उन लोगों के धर्म परिवर्तन से संतुष्ट हो गये। बाद में पावेल ने उनका धर्म परिवर्तन करने वाले मुरादाबाद के मुसलमानों और क्रांतिकारियों को ऐसी सख्त सजाएं दीं कि मानवता भी कांप उठी। यदि मुसलमान अपने हाथ में आये अंग्रेजों को इस्लाम कबूल कराने के प्रयास में न रहकर उनकी हत्या कर देते, तो बाद में मुरादाबाद के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों का यूं कोपभाजन न होना पड़ता।

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