चौ. महेंद्र सिंह टिकैत पर कविता

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किसानों की स्व. चौ. महेंद्र सिंह टिकैत से करुण पुकार

“किसानों के तारणहार, किसानों के मसीहा, किसानों को स्वाधीनता का अर्थ बताने वाले, मूक किसानों को सशक्त आवाज देने वाले, मजलूमों और सर्वहारा के सहारा बाबा टिकैत अभी हमें तुम्हारी बहुत जरूरत थी। तुम हमें बीच मंझधार छोड़कर कहां चले गये?”

“ओ बाबा आज फिर शैतानी ताकतें न जाने कैसे-कैसे नये दांवपेंच चलाकर हमें घेरने आ रही हैं। भोले और मजलूम किसान इन शैतानी ताकतों का तेरे बिन कैसे मुकाबला कर पायेंगे। बिजली को तो ओ बाबा ये जालिम लोग पहले ही हमसे छीन चुके थे, अब हमसे खाद और डीजल भी छीनने के लिए आतुर हैं।”

“ओ बाबा! तुमने हमें कभी डंकल नाम के शैतान के पंजों से छुड़ाया था। आज फिर ऐसा ही एक शैतान एफडीआई का वेश बदलकर आ रहा है। समझ में नहीं आ रहा बाबा कि भोले और गरीब किसान किस तरह इन शैतानी ताकतों का मुकाबला कर पायेंगे?”

“ओ बाबा तुम तो अच्छी तरह से हमारे देश के रहनुमाओं के षड्यन्त्रों को जानते हो। तुम तो इन षड्यन्त्रकारियों को अपने जूते की नोक पर रखते थे और उन्हें उनकी औकात बताते थे, लेकिन अब तो तुम्हारे जाने के बाद ऐसा कोई भी रहबर नहीं जो तुम्हारी तरह अपने प्राणों पर खेलकर हमारी रक्षा कर सके। ओ गरीबों, मजलूमों के मसीहा, हम तुम्हें कहां से खोजकर लाएं? बस एक बार बता दो बाबा अपना पता, फिर हम तुम्हें वहां से लाकर ही रहेंगे।”

स्व. चौ. महेंद्र सिंह टिकैत की याद में कविता

विख्यात जाट पत्रिका महाराजा सूरजमल टाइम्स के सम्पादक वीरेन्द्र सिंह चट्ठा ने स्व. चौ. महेंद्र सिंह टिकैत की याद में यह कविता लिखी थी-

 

कहां से लाएं तुमको तुम ही बता दो बाबा,

कि अंधेरों में कुछ दिखाई देता नहीं है।

चिराग बन किया रौशन तुमने हमारे मग को,

अब तुमसा कोई सूर हमें दिखता नहीं है।

बहुत रो रहे हैं, याद करके सब तुमको,

क्या तुमको रुदन उनका दिखता नहीं है?

थे हम बेसहारा, फिर हो गये बिन सहारे,

बिन तुम्हारे सहाई कोई दिखता नहीं है।

कांप उठते थे जिसकी आवाज से हुक्मरां,

अब ऐसा कोई मसीहा कहीं मिलता नहीं है।

सितमगर कहेंगे हम जो ना आओगे बाबा,

बेकसों पर यूं सितम कोई ढाता नहीं है।

जकड़े हैं बेड़ियां हमें फिर मुफलिसी की,

क्यां आकर ओ बाबा हमें छुड़ाता नहीं हैं?

डुबोने चली है फिर कश्ती ही हमको,

जो बचाले हमें वो पतवार मिलता नहीं है।

फिर घेरे हैं एफडीआई से शैतान हमको,

बचाने का भरोसा कोई देता नहीं है।

के मारे जो जूता हर जुल्मी के मुंह पर,

वो बूता किसी में अब दिखता नहीं है।

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