राजनीति के भीष्म पितामह चौ. चरण सिंह-एक विशलेषण

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राजनीति के भीष्म पितामह चौ. चरण सिंह-एक विशलेषण

महाभारत काल में कालचक्र ने देवव्रत को भीष्म की संज्ञा से विभूषित किया था और आधुनिक काल में कालचक्र ने जिस व्यक्ति को इस महिमामयी पद पर आसीन किया, उसका नाम है स्व. चौधरी चरण सिंह, जिसने भारतीय राजनीतिज्ञों के समक्ष राजनीति का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर राजनीति के भीष्म पितामह का चरित्र आधुनिक काल में दिखाया था।

भीष्म पितामह की पीड़ा

युद्ध में भीष्म पितामह अर्जुन के तीरों से घायल, तीरों के बिछावन पर पड़े थे। पाण्डव द्रोपदी सहित भीष्म पितामह से अंतिम उपदेश लेने पहुंचे। भीष्म ने उपदेश देते हुए कहा, ‘मनुष्य को विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपना धर्म त्याग नहीं करना चाहिए और अपने विवेक और संयम के बल पर अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए।’

पितामह भीष्म की बात पर द्रौपदी हंस पड़ी। पितामह भीष्म ने द्रौपदी से उसके हंसने का कारण पूछा, तो द्रौपदी ने झिझकते हुए कहा, ‘क्षमा करना पितामह! आपकी बातें सुनकर मुझे वह समय याद आ गया, जब आपके समक्ष कौरव मेरा चीर हरण कर रहे थे और आप निःशब्द बैठे थे। यह सोचकर मुझे हंसी आ गयी कि पितामह भी कैसी बातें कह रहे हैं। क्या उस समय मेरी रक्षा करना आपका धर्म नहीं था? यदि मेरी रक्षा करना आपका धर्म था, तो क्या उस समय आपका विवेक और संयम आपके वश में नहीं था?’

द्रौपदी के प्रश्न पर पितामह भीष्म थोड़ी देर तक मौने रहे और फिर स्वयं को संभालकर बोले, ‘पुत्री यह सत्य है कि जब दुःशासन के अपिवत्र हाथ तेरे शरीर को छू रहे थे, उस समय मैंने न तो दुःशासन को उस पाप कर्म से रोका और न ही उसकी भर्त्सना ही की। यदि मैं उस समय तुम्हारी रक्षा हेतु एक शब्द भी बोला होता, तो किसी में साहस न था कि वह तुम्हें छू भी सकता। किंतु पुत्री! उस समय मेरे यूं चुप रहने का कारण भी मेरा धर्म ही था। धर्म निर्वहन ने ही उस समय मेरे होठों पर ताले डाल दिये थे। उस समय संताप और पीड़ा का जो समंदर मेरे अंदर ठाठें मार रहा था, उसे मेरे अलावा और कोई नहीं देख सकता था। पुत्री! मैंने कभी हस्तिनापुर राज्य सिंहासन के प्रति वफादारी की जो शपथ ली थी, उसी ने मुझे उस समय बोलने से रोकने के लिए विवश किया था। क्योंकि उस समय यही मेरा धर्म था।’

काजल की कोठरी राजनीति

पितामह भीष्म के काल से लेकर आज तक धर्म निर्वहन हेतु लोग न जाने कितनी और कैसी-कैसी परिस्थितियों में से होकर गुजरे होंगे.  धर्म ने न जाने कितने रूप धारण किये। धर्म निर्वहन का नाम वर्तमान तक आते-आते राजनीति हो गया। राजनीति आज काजल की ऐसी काली कोठरी का नाम है, जिसमें घुसकर गन्दा होता ही होता है। लाखों करोड़ों में से कोई विरला ही राजनीति रुपी इस काजल की कोठरी में से बेदाग होकर निकलता है। ऐसे व्यक्ति को जो राजनीति नामक काजल की इस कोठरी से बेदाग बाहर निकल आये, महामानव कहा जाता है। लेकिन उस महामानव को उस काजल की कोठरी से बेदाग बाहर निकलने में आत्म-बलिदान की लम्बी श्रंखला और अनेकों उपालम्भों, आरोपों रुपी वाणों के प्रहारों से हुई पीड़ा के कितने महासागरों से होकर गुजरना पड़ता है, उसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता है। युग-युगांतर ऐसे महामानव के त्याग, तपस्या, न्यायशीलता, अटल सत्यानुरागी होने के साक्षी होते हैं। कालचक्र उस व्यक्ति को ‘भीष्म’ संज्ञा से विभूषित करता है।

चौ. चरण सिंह कलियुग के भीष्म पितामह

महाभारत के देवव्रत तो अपने पिता के लिए ली हुई भीष्म प्रतिज्ञा के कारण राजसिंहासन का अधिकार त्यागकर जीवन भर हस्तिनापुर राजसिंहासन के प्रति समर्पित होने के परिणाम स्वरूप संताप और पीड़ा के महासमुद्र से होकर गुजरे थे, किन्तु चौ. चरणसिंह ने तो समष्टि और गांव-देहात की उन्नति की शपथ ली थी। उन्होंने अपनी शपथ के लिए भारतीय राजनीति में त्याग का जो ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया, वह उनके जीवन-दर्शन का साक्षी है। उन्हें उनके ही आदर्शों ने कितना ही संताप और पीड़ा क्यों न दी हो, किन्तु वे अपने आदर्शों से कभी पीछे नहीं हटे। इसके लिए उन्हें अनेकों बार उपालम्भों, षड्यंत्रों का गरल पीना पड़ा, अनेकों अवसरों पर तुच्छ-कलुषित व ओछे राजनीतिज्ञों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु उनको हाशिये पर पहुंचाने का प्रयास किया। इसके उपरांत भी चौ. चरणसिंह ने न तो कभी किसी को अपना प्रतिद्वन्द्वी या विरोधी नहीं समझा। उन्होंने कभी सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा को अपने अंदर नहीं पलने दिया। उन्होंने राष्ट्रीय अस्मिता के मूल्य पर मनसा, वाचा, कर्मणा कभी कोई अनैतिक या राष्ट्रविरोधी, जन-विरोधी या समाज-विरोधी कार्य नहीं किया। लोग अपने स्वार्थ-साधन के लिए उनके चारों तरफ षड्यंत्रों का जाल बुनकर उनको जितना नेपथ्य में धकेलने का प्रयास करते रहे, वे उतनी ही दृढ़ता से राजनीति के उच्च शिखर पर चढ़ते गये, जहाँ सभी ईमानदार राजनीतिज्ञ पहुँचने की कामना करते हैं।

सिद्धांवादी  चौ. चरण सिंह

चौ. चरण सिंह ने अपने सिद्धांतों के सामने  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद को बार-बार ठोकर मारी। भारतीय राजनीति के इस भीष्म पितामह को क्या मुख्यमंत्री जैसे पद का इस प्रकार त्याग करते समय कोई संताप न हुआ होगा। किन्तु उन्होंने कभी इसका अफसोस नहीं किया। तभी तो यह ‘भीष्म पितामह’ उ. प्र., पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान ही नहीं समस्त भारत के लोगों के दिलों पर राज करता था।

जब इन्दिरा गाँधी चुनाव हारने के उपरांत भी प्रधानमंत्री के पद पर असंवैधानिक तरीके से काबिज हो गयीं, तो उनके इस कृत्य की आलोचना करने एवं उनसे त्यागपत्र माँगने वालां में चौ. चरण सिंह प्रमुख थे। जब इंदिरा गाँधी ने देश में आपात्काल घोषित किया और विरोधियों को जेल भेजने की बात चली, तब चौ. चरण सिंह उस सूची में सबसे ऊपर थे।

नये भारत के संस्थापक चौ. चरण सिंह

देश के उच्च कोटि के चिंतकों, राजनीतिज्ञों ने इस समस्या का स्थायी हल खोजने के लिए तमाम राजनीतिक दलों को एक झण्डे व एक संविधान के नीचे लाने की आवश्यकता समझी। सर्वप्रथम चौ. चरण सिंह ने जेल में रहते हुए इस विचारधारा को मूर्तरूप देने का संकल्प लिया। उनका जनाधार पूरे उत्तर भारत में था। वे इंदिरा गाँधी के बाद दूसरे सबसे बड़े व्यापक जनाधार वाले नेता थे। किंतु जनसंघ और एक मामूली सी पार्टी संगठन कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई इस नये दल के गठन का विरोध कर रहे थे। अंततः जयप्रकाश नारायण के बीच में आने से नये दल के गठन पर सभी विपक्षी राजनीतिक दलों में सहमति बनी।

चौधरी चरण सिंह के प्रयास से 19 फरवरी को मोरारजी के आवास पर एक सर्वदलीय मीटिंग का आयोजन किया गया। मोरारजी इस मीटिंग के स्वयंभू अध्यक्ष बन बैठे। मीटिंग में नये दल के गठन पर चर्चा आरम्भ हुई, तो मोरारजी ने कहा कि नया दल बनाना पाप होगा। वे नये दल की अपेक्षा मोर्चा बनाने पर बल देने लगे, जबकि चौ. चरण सिंह, एन.जी. गोरे व पीलू मोदी सारी पार्टियों का विलय कर नये दल के गठन पर जोर दे रहे थे।

कपटी व स्वार्थी मोरारजी देसाई

मोरारजी ने शर्त रखी कि वह नये दल के गठन में तभी शामिल हो सकते हैं कि जब उन्हें दल का अध्यक्ष बनाया जाए। स्पष्ट था कि मोरारजी देशहित में नहीं, वरन् अपने स्वार्थ के लिए ही नये दल में शामिल होने को तैयार हो सकते थे।

चौ. चरण सिंह तथा अन्य नेताओं ने जयप्रकाश नारायण से सम्पर्क किया तो उन्होंने निर्णय दिया, ‘‘मोरारजी देसाई आयु में सबसे बड़े हैं, अतः वही नये दल के अध्यक्ष व चौ. चरण सिंह दल के उपाध्यक्ष होंगे।’’ जयप्रकाश नारायण को नहीं पता था कि मोरारजी दो दिन पूर्व तक नये दल के गठन को ही पाप बता नये दल के गठन को रोकने का ही प्रयास कर रहे थे। चौधरी साहब ने खुले हृदय से देश हित में यह निर्णय मान लिया। नये दल के गठन का रास्ता साफ हो गया।

चौ. चरण सिंह के व्यक्तित्व का चमत्कार

आसन्न चुनावों के लिए चौधरी साहब को समस्त उत्तर भारत का जिम्मा सौंपा गया। उन्होंने नये दल का नाम ‘जनता पार्टी’ रखा। उन्होंने पार्टी को लोकदल का चुनाव चिन्ह भी दे दिया। उन्होंने ही नयी पार्टी का घोषणा-पत्र तैयार किया। चौ. साहब ने पूरे उत्तर भारत में जमकर चुनाव प्रचार किया। इससे उनका स्वास्थ्य खराब हो गया, फिर भी वे रात-दिन चुनाव प्रचार में लगे रहे। चुनाव परिणाम अत्यंत चौंकाने वाले थे। उत्तर भारत से कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब व बिहार में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। उसे राजस्थान में मात्र एक सीट प्राप्त हुई थी, जहां एकमात्र जाट नेता रामनिवास मिर्धा ही चुनाव जीत सके थे। यह सब चौ. चरण सिंह के चमत्कारी व्यक्तित्व, उनकी बेदाग छवि व उनकी रणनीति का ही चमत्कार था। विशेष उल्लेखनीय यह है कि कांग्रेस विरोधी इस लहर में भी मोरारजी अपने गृह राज्य से हारते-हारते बचे थे।

अवसरवादी-अहन्कारी मोरारजी

खराब स्वास्थ्य में भी अनवरत चुनावों में लगे रहने के कारण चौधरी चरण सिंह को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। चुनाव परिणाम आने पर अवसरवादी जगजीवनराम व हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में आ गये थे। चौ. चरण सिंह जनता पार्टी का नेता चुनने के लिए आयोजित बैठक में नहीं आ सके, इस बात का फायदा मोरारजी देसाई ने उठाया और पार्टी के कई बड़े नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया और जनता पार्टी संसदीय दल का नेता बनने पर अड़ गये। जयप्रकाश नारायण, जो स्वयं चौ. चरण सिंह को दल के नेता के रूप में चुनना चाहते थे, मोरारजी की हठ के सामने झुक गये और उन्होंने मोरारजी देसाई को संसदीय दल का नेता घोषित कर दिया।

जनता पार्टी निर्माण में सर्वोपरि भूमिका निभाने वाले, पार्टी को प्रचण्ड बहुमत से जिताने वाले, न्यायप्रिय व गरीबों-किसानों के हितैषी को किसी ने प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव नहीं रखा। देश की बागडोर ऐसे हाथों में जाने की भूमिका तैयार हो गयी जो परिवारवादी, अहंकारी, गरीबों-किसानों के शत्रु व धनकुबेरों के हाथों की कठपुतली थे। इस प्रकार भारत की जनता के दुखों का निवारण करने के ‘भीष्म पितामह’ के संकल्प को धराशाई करने की आधारशिला रखी गयी और नवयुग का वह भीष्म पितामह अस्पताल रूपी समर क्षेत्र की सर शैया पर पड़े-पड़े अपने संकल्प को यूँ तिनका-तिनका बिखरते देखते रहने के सिवा कुछ नहीं कर सका।

हठी धृतराष्ट्र की भूमिका में मोरारजी

मोरारजी देसाई ने अपने मामूली से दल ‘संगठन कांग्रेस’ से सात मंत्री बनाये।  उनका पुत्र कांति देसाई उनका सचिव बन बैठा और देश के उद्योगपतियों को आमंत्रित कर पिता के पद का दुरुपयोग करते हुए बेशुमार धन एकत्रित करने में जुट गया। इससे जनता पार्टी सरकार की साख को धक्का पहुँचा। तब चौ. चरण सिंह ने मोरारजी को पत्र लिखकर अपने पुत्र पर नियंत्रण रखने की सलाह दी, किन्तु मोरारजी देसाई उनकी सलाह पर चिढ़ गये और हठी धृतराष्ट्र की शैली में अपने पुत्र पर लगे आरोपों को नकार गये और पुत्र पर नियंत्रण करने की अपेक्षा वे चौ. चरण सिंह को ही अपना दुश्मन मानने लगे।

देश को पतन की ओर धकेलने वाला मोरारजी

मोरारजी देसाई ने अपना एक कॉकस बना लिया था। इसमें जगजीवन राम जैसे अवसरवादी नेता प्रमुख थे। इस कॉकस ने चौधरी चरण सिंह के महत्व को अनदेखा कर, एक ऐसे व्यक्ति चन्द्रशेखर को, जिसका कोई जनाधार न था, पार्टी का अध्यक्ष बनवा दिया। यह चौ. चरणसिंह का प्रत्यक्ष अपमान था, क्योंकि मोरारजी देसाई के बाद जनता पार्टी में यदि कोई अन्य व्यक्ति महत्वपूर्ण था, तो वह चौधरी साहब ही थे। अतः उनका अध्यक्ष चुना जाना ही न्याय संगत व तर्क संगत था, किंतु चन्द्रशेखर को पार्टी का अध्यक्ष बनाकर इस कॉकस ने यह दर्शाने का प्रयास किया था कि उनकी दृष्टि में चौधरी साहब का कोई महत्व नहीं था।

सुपरमैन चौ. चरण सिंह

चौ. चरण सिंह ने गरीबों-किसानों के हित में जो 27 सूत्रीय कार्यक्रम बनाया था, उसे मोरारजी ने नकार दिया। आसन्न उत्तर प्रदेश के चुनावों में चौ. चरणसिंह द्वारा घोषित उम्मीदवारों में से लोकदल के 88 उम्मीदवारों के नाम काट दिये गये। 23 दिसम्बर, 1977 को चौ. चरण सिंह के जन्म दिन पर किसान दिवस के रूप में दिल्ली में एक विशाल रैली का आयोजन हुआ, जिसमें 10 लाख लोग सम्मिलित हुए। समाचार-पत्रों ने इस रैली को विस्तार के साथ प्रकाशित किया। अंग्रेजी अखबार ‘पैट्रियट’ ने चौ. चरण सिंह को ‘सुपरमैन’ की संज्ञा दी। यह देखकर तो जनता पार्टी के अधिकांश नेता तिलमिला उठे और चौधरी साहब को अपमानित कर येन-केन-प्रकारेण पार्टी से बाहर करने का षड्यंत्र बुनने लगे। वे अपने-अपने तरकशों से अपमान के बाण चला-चलाकर चौधरी साहब को अधिक से अधिक पीड़ा देने का कोई भी अवसर गँवाना नहीं चाहते थे। जबकि चौधरी साहब देशहित में उस अपमान को सहन करते जा रहे थे। उन्हें अपने अपमान की नहीं, देश और देश की गरीब जनता की चिंता थी। उनके समक्ष अपमान का गरल पीने के सिवाय दूसरा कोई चारा न था। उन्होंने जनता से जो वादे किये थे, वे उनके होठों पर ताला बनकर चिपके हुए थे। क्योंकि वह पार्टी में विघटन पैदा करने के पाप से बचना चाहते थे।

कांति उद्योगपतियों को मनचाहा लाभ पहुँचा रहा था। अखबार इस संबंध में पिता-पुत्र की बराबर आलोचना कर रहे थे। चौधरी साहब चाहते थे कि कांति देसाई पर लगे आरोपों की जाँच हो। चौतरफा दबाव देखकर मोरारजी देसाई ने अपने पुत्र कांति पर लगे आरोपों की जाँच कराने की घोषणा तो की, किंतु चार माह के उपरांत भी जब कोई कार्यवाही आरम्भ नहीं हुई, तो चौधरी साहब ने मोरारजी को पुनः पत्र लिखा।

बेटे के मोह में अँधा मोरारजी

चौ. चरणसिंह का पत्र पाकर मोरारजी बुरी तरह भड़क उठे और उन्होंने प्रत्युत्तर में स्वयं चौधरी साहब की पत्नी गायत्री देवी व उनके दामाद पर ही भ्रष्टाचार का दोषारोपण कर डाला। इस आरोप से चौ. चरण सिंह जरा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने मोरारजी को उत्तर दिया कि वे कांति पर लगे आरोपां की जाँच के साथ ही उनके परिजनों की भी जाँच करा लें। चौ. चरण सिंह ने एक के बाद एक मोरारजी को पाँच पत्र लिखे। मोरारजी उनके प्रत्येक पत्र को दबाकर बैठ गये।

चौधरी साहब देश की जनता से किया वादा निभाना चाहते थे कि जनता पार्टी देशवासियों को स्वच्छ व पारदर्शी सरकार देगी, किन्तु यहाँ उसका उल्टा हो रहा था। अखबारों में सरकार की छीछालेदर हो रही थी। मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, चन्द्रशेखर व जनसंघ घटक के कई नेता अब चौधरी साहब के विरुद्ध षड्यंत्रों का जाल बुनने में सिर जोड़कर जुटे थे। तब तो पराकाष्ठा ही हो गयी जब मोरारजी देसाई विदेश यात्रा पर जाते हुए चौ. चरणसिंह से कहीं कनिष्ठ और मंत्री परिषद् में उनके बाद के क्रम के मंत्री कांग्रेस छोड़कर आये जगजीवनराम को प्रधानमंत्री का पदभार सौंप गये। चौ. चरणसिंह तो इस अपमान का गरल चुपचाप पी गये, किन्तु उनके परम सहयोगी स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण ने खुले रूप मेें मोरारजी के इस कदम की भर्त्सना की।

चौ. चरणसिंह का गृह मंत्री पद से त्यागपत्र

मोराजी ने विदेश से लौटते ही राजनारायण को इस पर सार्वजनिक रूप से फटकार लगायी और चौ. चरण सिंह से इस सम्बन्ध में स्पष्टीकरण माँग लिया। अपराध किसी का-स्पष्टीकरण किसी से। यह तो चौधरी साहब का भयानक अपमान था। ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठा, देश-भक्ति की पवित्र भावना और गरीबों-किसानों के प्रति दयाभाव का ऐसा कठोर दंड मिलेगा, चौधरी साहब ने यह सपने में भी नहीं सोचा था। उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी। उन्होंने मोरारजी द्वारा पग-पग पर किये गये अकारण अपमान से क्षुब्ध होकर गृहमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। यदि चौधरी साहब चाहते, तो उसी समय अपना नया दल बनाकर मोरारजी को करारा जवाब दे सकते थे। उस समय वह इतने सक्षम थे कि मोरारजी को प्रधानमंत्री पद से भी हटा स्वयं प्रधानमंत्री बन सकते थे, किन्तु उनकी आत्मा ने ऐसा करना गवारा नहीं किया। वे चुपचाप मंत्री परिषद से अलग हो गये। देश की राजनीति में इस तरह का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।

चौ. चरणसिंह अपमान दर अपमान का विष पीते रहे

जनता पार्टी के अन्य दलों के नेता चौधरी साहब को चिढ़ाने के लिए बयान दे रहे थे कि चरण सिंह अब जनता पार्टी छोड़ देंगे, जबकि मोरारजी व्यंग्य किया करते थे कि वे पार्टी छोड़कर कहाँ जायेंगे, उन्हें कहीं भी ठोर न मिलेगी। मोरारजी द्वारा लोकदल घटक के मुख्यमंत्रियों को हटाने की मुहिम चला दी गयी। इतने पर भी चौधरी साहब चुप थे। वे न तो अपने त्यागपत्र पर और न ही लोकदल घटक के मुख्यमंत्रियों को हटाने के षड्यंत्र पर कुछ बोल रहे थे। जनता को दिये वचनों से बँधा नवयुग का वह भीष्म पितामह, तमाम टूटते भरोसों से मिले अपमान की पीड़ा को चुपचाप झेल रहा था और सरकार को तबाही व टूटने से बचाने के लिए अपने होठों को सिये हुए था। क्योंकि वह अपने ऊपर पार्टी तोड़ने का कलंक नहीं लेना चाहता था।

अटल बिहारी वाजपेयी और कुछ अन्य समझदार नेता मोरारजी पर दबाव डाल रहे थे कि वे चौधरी साहब को किसी भी प्रकार से मनाकर मंत्रीमण्डल में पुनः शामिल करें, लेकिन अहंकार के मद में डूबे मोरारजी ने शर्त रखी कि पहले चरण सिंह कांति पर लगाए आरोपों को वापिस लें, तभी वह उनको मंत्रीमण्डल में लेगा। इस पर चौधरी साहब ने कहा, ‘‘कांति के आरोपों को खारिज करने का अर्थ होगा, उन्हें बेदाग होने का सर्टिफिकेट देना। ऐसा मैं किसी भी दशा में नहीं कर सकता। यह तो देश की जनता के साथ विश्वासघात होगा।’’

देश की जड़ों पर कुठाराघात

पुत्र मोह में अंधा ‘धृतराष्ट्र’ मोरारजी न केवल जनता पार्टी वरन देश की जड़ों पर कुठाराघात कर रहा था। जब जयप्रकाश नारायण ने भी मोरारजी को समझाने का प्रयास किया, तो उसने उन्हें यह कहकर कि ‘वे बाहरी व्यक्ति हैं, उन्हें इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए’ उनको भी अपमानित कर डाला। अहंकार व सत्ता के मद में डूबे अहसान फरामोश मोरारजी ने अपमान के दंश से उस व्यक्ति को भी नहीं बख्शा, जिसके दम पर वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ था। जयप्रकाश नारायण मोरारजी का उत्तर सुनकर हत्प्रभ रह गये और लोग मोरारजी की हठधर्मिता देखकर सन्न। अब सब समझ गये थे कि मोरारजी ने जनता पार्टी को विघटन के दोराहे पर ला खड़ा किया है।

चौ. चरण सिंह के जन्म दिन 23 दिसम्बर 1978 को जब सांसद चन्द्रावती ने दिल्ली में 15 लाख किसानों की महारैली की, तो मोरारजी बुरी तरह हिल गये। उन्हें अब समझ आ गया कि चौधरी चरण सिंह वास्तव में देश की जड़ों से जुड़े नेता हैं और यदि वे विद्रोह पर उतारू हो जाएँ, तो वे एक ही झटके में उन्हें सिंहासन से उतारकर रसातल में फेंक सकते हैं। अतः चौधरी साहब की शक्ति से भयभीत मोरारजी ने स्वयं ही पहल कर चौधरी साहब को पुनः मंत्रीमण्डल में शामिल होने के लिए उनकी मान-मुनव्वल करनी शुरू कर दी। चौ. चरण सिंह किसी भी दशा में अब मंत्रीमण्डल में शामिल होने के लिए तैयार न थे, किन्तु जे.पी. के दबाव पर वे मंत्रीमण्डल में सम्मिलित होने के लिए सहमत हो गये। इस बार चौधरी साहब को उप प्रधानमंत्री बनाया गया, साथ ही उन्हें वित्त मंत्रालय भी सौंपा गया।

वित्त मंत्री के रूप में खेती को वरीयता

चौधरी साहब को बजट प्रस्तुत करने के लिए केवल एक माह का समय मिला था। मोरारजी ने उनसे कहा कि बजट में कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं है, बस पिछले बजट को ही ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया जाए। सबको विश्वास था कि चौ. चरणसिंह इस अल्प समय में बजट में कुछ विशेष नहीं कर पायेंगे, किन्तु जब उन्होंने बजट प्रस्तुत किया, तो सब चौंक पड़े। उन्होंने बजट में रक्षा व्यय पर पूरे 205 करोड़ की वृद्धि करने के साथ कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता दी और कृषि व ग्रामीण परियोजनाओं पर 1254 करोड़ रुपये के स्थान पर 1811 करोड़ का प्रावधान रखा। उन्होंने काम के बदले अनाज योजना में 50 करोड़ की बढ़ोतरी के साथ सिंचाई योजनाओं के लिए अधिक धन, उर्वरकों, हस्त उद्योग की वस्तुओं, डीजल पर भारी छूट घोषित की।

राजनारायण को अभी तक मंत्रीमण्डल में वापिस नहीं लिया गया था। राजनारायण ने नाराज होकर ‘कांग्रेस एस’ नाम से 54 सांसदों को मिलाकर एक नया दल बना लिया। 17 जुलाई 1979 को इस मामले पर जनता पार्टी की उच्च स्तरीय मीटिंग में लोकदल घटक ने चन्द्रशेखर को इस विघटन का जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे त्यागपत्र माँगा, तो अटल बिहारी वाजपेयी व जार्ज फर्नांडिज ने पार्टी टूटने से बचाने के लिए मोरारजी देसाई से त्यागपत्र देने को कहा।

अहंकारी मोरारजी ने त्यागपत्र देने से स्पष्ट इंकार कर दिया, लेकिन अब बात यहाँ तक बढ़ चुकी थी कि मोरारजी के त्यागपत्र के बिना पार्टी का विघटन रोकना असंभव हो गया था। मोरारजी पर चारों तरफ से दबाव पड़ा, तो अंततः उन्हें अपना त्यागपत्र देने के लिए मजबूर होना पड़ा। त्यागपत्र देने के साथ ही वे जनता पार्टी से अलग हो गये। इस प्रकार भारत की जनता के सपनों का महल एक अहंकारी के कारण धराशायी हो गया। चरणसिंह की आत्मा रो पड़ी। वे अवाक् अपनी कोठी के एक कमरे में बंद होकर रह गये।

महाभारत में भीष्म पितामह ने हस्तिनापुर राज्य को अक्षुण्ण रखने हेतु जो त्याग किए, पुत्र-मोह में डूबे धृतराष्ट्र ने उन्हें नगण्य कर दिया, जिसके प्रतिफल में पिता को सत्ताच्युत हो जाना पड़ा और पुत्र को अपने प्राण गंवाने पड़े। साथ ही 18 अक्षोहिणी सेना को उनकी सर्वोच्च महात्वाकांक्षा के कारण अपने प्राण गँवाने पड़े। इस प्रकरण में राष्ट्र को जो हानि पहुँची, उसका आकलन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार पुत्र मोह में डूबे मोरारजी देसाई ने नवयुग के भीष्म पितामह चौ. चरणसिंह के द्वारा राष्ट्रहित में किये त्याग को नष्ट कर दिया। इस प्रकरण में उसकी हठधर्मिता के कारण राष्ट्र को जो क्षति पहुँची, उसका आकलन तो कभी भी नहीं किया जा सकता।

Virendra Chattha

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