Jat Jati ki Utpatti | जाट जाति की उत्पत्ति का इतिहास | जाटों की उत्पत्ति कहाँ से हुई

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जाटों की उत्पत्ति कहाँ से हुई Jat jati ki utpatti kahan se hui

जाट जाति की उत्पत्ति का इतिहास महाभारत के समय से शुरू होता है। महाभारत के एक दृष्टांत के अनुसार कौरवों और  पाण्डवों में हुए महाभारत युद्ध के पश्चात महाराजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था। इस यज्ञ के काल में भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के द्वारा शिशुपाल का वध कर दिया था। शिशुपाल का वध करने के पश्चात श्रीकृष्ण ने कभी शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी। श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को देखते हुए उन्हें ज्येष्ठ की उपाधी दी गयी थी। महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण के साथी दो पक्षों में विभाजित हो गये। पहले श्रीकृष्ण की पदवी के पक्षधर ज्येष्ठ कहलाये और दूसरे यदु कहलाये। कालांतर में यदु यादव कहलाये और और इन यदुओं की  शाखा ही जाट कहलाये गये। यहीं से जाट जाति की उत्पत्ति के इतिहास का प्रारम्भ होता है।

कुछ इतिहासकारों के  जाट जाति की उत्पत्ति पर भिन्न विचार हैं

इतिहासकार ठाकुर देशराज सिंह का मानना है कि जाट शब्द संस्कृत के ‘ज्ञाति’ शब्द से बना है। ज्ञाति से ‘जात’ और फिर अपभ्रंश होकर ‘जाट’ बन गया। त के स्थान पर ट का उच्चारण उत्तर भारत की भाषा की प्रकृति है। ठाकुर देशराज कहते हैं कि इस विषय में महाभारत में एक स्थान पर कहा गया है-
एक ही राज्यवंश के कुछ लोग साम्राज्यवादी विचार होने के कारण दो श्रेणियों में विभक्त हो गये। एक साम्राज्यवादी और दूसरे ज्ञातिवादी (प्रजातांत्रिक) विचारधारा वाले। अर्थात् पहले साम्राज्य शासन प्रणाली में विश्वास रखने वाले तथा दूसरे ज्ञाति अर्थात उस देश और समाज के लिए कल्याणकारी भाव रखने वाले ज्ञाति ही आगे चलकर ज्ञात कहलाने लगे। और फिर वे ज्ञात से जाट कहलाये।
इतिहासकार नेशफील्ड जो भारतीय जातीय शास्त्र का प्रकाण्ड ज्ञाता है, अपने निष्कर्ष में लिखता है-
” The word Jat is nothing more than the modern Hindi pronunciation of Yadu or Jadu, the tribe in which Krishna was born.”
अर्थात् जाट जदु के वर्तमान हिंदी उच्चारण के सिवा कोई दूसरा शब्द नहीं है। यह वही जाति है, जिसमें भगवान कृष्ण उत्पन्न हुए।
अंगे्रज इतिहासकार जेम्स टाॅड का मत है कि जाट इण्डो-सीथियन कुल के हैं, जो ईसा से भी एक सदी पहले अपने निवास स्थान ऑक्सस घाटी से पंजाब में प्रविष्ट हुए थे। अन्य कई अंगे्रज इतिहासकार जैसे इन्वेटसन (पंजाब कास्ट्स) विन्सेंट स्मिथ (जनरल आफ द रायल ऐशियाटिक सोसायटी) तथा जोजेफ कनिंघम आदि जेम्स टाड के कथन का अनुमोदन करते हैं। कुछ दूसरे इतिहासकार जाटों को कुषान या युह ची जाति से सम्बन्धित मानते हैं। जबकि डाॅ. ट्रम्प्स तथा डाॅ. वीम्स का निष्कर्ष है कि जाट विशुद्ध रूप से इण्डो-आर्य जाति के वंशज हैं।
पं. इंद्र विद्यावाचस्पति उपरोक्त सभी विद्वानों के मतों का बलपूर्वक खण्डन करते हैं। वह अपनी पुस्तक मुगल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण में सप्रमाण कहते हैं, ‘जब से जाटों का वर्णन मिलता है, तभी से यह स्पष्ट विदित होता है कि वे भारतीय ही हैं। यदि कहीं भारतवर्ष के बाहर जाट मिलते हैं, तो वे भी भारत से गये हुए ही हैं।’

महर्षि दयानंद ने जाटों को श्रेष्ठ आर्य कहा है

चिंतामणी विनायक वैद्य लिखते हैं, ‘न तो किसी विदेशी फस्तक में कहीं ऐसा लिखा है कि जाट अमुक देश से भारत में गये और न ही जाटों की दंत कथाओं में इस तरह का कहीं कोई उल्लेख मिलता है। जाट न हूणों की संतान हैं और न शक-सिथियनों की, अपितु वे विशुद्ध आर्य हैं।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी जाटों को शुद्ध आर्य ही माना है। उन्होंने कहा है कि जिस प्रकार आर्य पाखण्ड को नहीं मानते, उसी प्रकार जाट भी पाख्ण्ड को अधिक महिमामण्डित नहीं करते। वह कहते हैं कि यदि सभी पुरुष जाट के समान हो जाएं तो संसार में कोई पोप लीला ही न चले। वह जाट को ‘जाट जी’ के नाम से सम्बोधित करते हैं।
कुछ अंग्रेज इतिहासकारों ने भी कहा है कि जाट पूर्ण रूप से भारतीय ही हैं। इन इतिहाकारों में से एक डब्ल्यू क्रुक ने कहा है कि जाट शुद्ध रूप से भारतीय आर्य जाति है। इतिहासकार मिलर (डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, मुजफ्फरनगर 1920) में लिखता हैः जाटों को सिथियन कहने के लिए अत्यंत ही कल्पना शक्ति की उड़ान भरी गयी है। यदि मुखमण्डल सामुद्रिक ज्ञान का कोई विषय हो सकता है, तो कोई भी विद्वान जाटों के भारतीय आर्य होने पर संदेह नहीं कर सकता।

इतिहासकार जाट जाति को प्राचीनतम मानते हैं

इतिहास लेखक ठाकुर देशराज सिहं ‘जाट इतिहास’ में लिखते हैं, ‘जाट जाति राजपूतों के जन्म से भी 1500 वर्ष पूर्व अस्तित्व में थी। जाट एक प्राचीन व भारतीय जाति है। यह जाति प्राचीन आर्याें की नस्ल है तथा जाट जाति में प्राचीन वर्ण-व्यवस्था में जो स्थान पहले क्षत्रियों का था, वह स्थान अब जाटों का है। जाटों के आचार-विचार पहले के क्षत्रियों से मिलते-जुलते हैं। एक जुट होकर संघर्ष करने वाले लोग ही जाट हैं और ये भारत के मूल निवासी हैं। जाटों का उद्गम ज्ञाति संघ से हुआ है। यह ज्ञाति ही बाद में जाट कहलाये।
जाट कोई एक मूल वंश नहीं है। क्योंकि उनमें सूर्यवंशी और चंद्रवंशी दोनों के ही गोत्र सम्मिलित हैं। इनमें अधिकांश चंद्रवंशी यादव हैं। राजपूतों में सूर्यवंश की अधिकता है। कालांतर में सूर्यवंश चंद्रवंश पर प्रभावी हो गया। चंद्रवंशी यादवों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेने पर ब्राह्मणों ने उन्हें दासीपुत्र या शूद्र कहना शुरू कर दिया।

 

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