भरतपुर का राजा मान सिंह फर्जी एनकाउण्टर Raja Man Singh Encounter

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21 फरवरी 1985 का दिन। राजस्थान के डीग शहर में और दिनों की तरह चहल-पहल थी। डीग शहर के मण्डी इलाकें में भी शहर के अन्य क्षेत्रों की भांति मामूली चहल-पहल थी। दोपहर का समय हो चुका था। किसानों के अलावा श्रमिकों और अन्य व्यवसायियों से मण्डी पूरी तरह से गुलजार थी।
मण्डी की एक सड़क पर एक जोंगा जीप गुजर रही थी। उस जोंगा जीप का गुजरना एक अति सामान्य सी घटना थी। सो उस पर किसी का ध्यान नहीं गया। लेकिन जब अचानक उस जीप को पीछे और सामने से आकर कई पुलिस वाहनों ने घेर लिया, तो कुछ लोगों का ध्यान उधर गया। और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता या जीप पर सवार लोग संभल पाते, पुलिस वाहनों से तेजी से पुलिसकर्मी निकले और उन्होंने जोंगा जीप के टायरों पर दनादन फायर करने शुरू कर दिये।

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उस जोंगा जीप में उस समय भरतपुर रियासत के राजकुमार राजा मान सिंह अपने दामाद विजय सिंह और दो अन्य साथियों सुमेर सिंह और हरि सिंह के साथ मौजूद थे। अचानक चारों ओर से जीप पर अप्रत्याशित रूप से गोलियों के प्रहार से राजा मान सिंह और उनके साथी भौंचक्के रह गये। राजा मान सिंह का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने देखा उनकी जीप को चारों ओर से हभियारबन्द लगभग 20 पुलिसकर्मियों ने घेर रखा था। उन सबके हाथों में हथियार दबे थे जिनका रुख राजा साहब की ओर ही था और डीग थाने का थानाध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह और इलाके का डीएसपी कान सिंह भाटी सबसे आगें खड़े अपने हाथों में आग उगलने के लिए तैयार रिवाल्वर दबाये आग्नेय नेत्रों से राजा मान सिंह की ओर देख रहे थे। जो पुलिस अधिकारी रोज उनके दरबार मंे हाजिरी लगाते थे और उनकी जी हुजूरी में पूंछ हिलाते फिरते थे, वे उस समय उनके सामने साक्षात् कालदूत बने खड़े थे।

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देश के इतिहास की एकमात्र घटना


गोलियां चलने और गोलियों की मार से जीप के चारों टायर एक एक साथ फटने से धमाकों की शृंखला ने मण्डी में मौजूद हर आदमी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। 65 वर्षीय राजा मान सिंह तमककर जीप से नीचे कूदने को तैयार हो गये। उसी समय एक पुलिस वाले की गोली उनकी कनपटी पर लगी और सीधे भेजे में जा घुसी। तड़…तड़…तड़… क्षणांश में दर्जनो गोलियां राजा मान सिंह और उनके साथिंयों के शरीरों में पैबस्त हो गयीं। जीप में राजा मान सिंह के पीछे बैठे उनके दामाद विजय सिंह के सिर पर एक सिपाही ने राइफल की बट का प्रहार किया, जिससे वह बेसुध से हो गये। राजा मान सिंह और उनके दोनों साथी जीवन-मृत्यु के बीच में फंसे तड़प रहे थे।

घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने राजा मान सिंह की जीप को पहचान लिया। लोग समझ गये कि पुलिस ने राजा मान सिंह को मार डाला था। लेकिन किसी व्यक्ति का साहस न हुआ कि वह राजा मान सिंह की जीप के पास तक जा सके। सारा घटनाक्रम लोगों ने स्पष्ट देखा था। स्पष्ट रूप से पुलिस दल ने दिन दहाड़े राजा मान सिंह की हत्या कर डाली थी। देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी पदेन एमएलए का दिनदहाड़े एनकाउंटर किया गया था।

कांग्रेस जनों ने फाडे राजा मान सिंह के बैनर व् पोस्टर

इस घटना की विस्तृत जानकारी एकत्र करने पर पता चला कि 20 फरवरी 1985 को शिवचरण माथुर कांग्रेस प्रत्याशी बिजेन्द्र सिंह का प्रचार करने के लिए डीग में एक जनसभा करने का कार्यक्रम था।  माथुर के आगमन से उत्साहित कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह पर लगे राजा मान सिंह के पोस्टर, बैनर और रियासत के झंडे फाड़ दिये। यहां तक कि कुछ अति उत्साही कार्यकर्ताओं ने तो डीग के महल पर लगा राजशाही झण्डा उतारकर फेंक दिया और वहां कांग्रेस का झण्डा ही लगा दिया।

राज परिवार की अनुमति के बिना रियासत के झण्डे को इस प्रकार उतार कर फेंकने का अर्थ था कि झण्डा उतारकर फेंकने वाले का्रग्रेसी कार्यकताओं को कांग्रेस हाईकमान द्वारा ऐसा करने के लिए निर्देशित किया गया था। राजा मानसिंह समझ गये कि यह सब कुछ मुख्यमन्त्री शिवचरण माथुर की शह पर अंजाम दिया गया था। डीग के किसी भी व्यक्ति में ऐसा साहस न था कि वह डीग के किले पर चढ़कर रियासत के झण्डे को छू तक सकता। यह बात राजा मान सिंह को बहुत नागवार गुजरी।

राजा मान सिंह ने शिवचरण माथुर का मंच और हैलीकाॅप्टर तोड़ा

जिस जगह पर शिवचरण माथुर की जनसभा हो रही थी, उससे कुछ ही दूर राजा मान सिंह भी अपनी जन सभा कर रहे थे। शिवचरण माथुर ने जले पर नमक छिड़कते हुए अपने भाषण में भरतपुर राज घराने पर आपत्तिजनक तथा अपमानजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। राजा साहब के समर्थकों ने राजा साहब को अइस सम्बन्ध में जाकर बताया, तो वह गुस्से में भर उठे। उनकी रियासत के झण्डे के अपमान से राजा साहब पहले से ही क्षुब्ध थे, शिवचरण माथुर के आपत्तिजनक व्यवहार ने आग में घी डाल दिया और राजा मान सिंह आग बबूला होकर अपनी जनसभा छोड़ अपनी जोंगा जीप लेकर शिवचरण माथुर की जनसभा की ओर चल दिये।

राजा मानसिंह चैडा स्थित मैदान में शिवचरण माथुर की जनसभा स्थल पर जा पहुंचे। उस समय तक माथुर वहां तक नहीं पहुंच सका था। राजा मानसिंह ने सभा स्थल पर जाते ही सभा स्थल का तोरण द्वार तोड़ा डाला और फिर वह जांेगा जीप लिये हुए मंच की ओर बढ़े। राजा साहब का विदु्रप रूप देखकर कांग्रेस समर्थकों में भगदड़ मच गयी। इसके बाद राजा मानसिंह ने मुख्यमंत्री के मंच को तहस-नहस कर दिया। राजा साहब का गुस्सा इतने पर ही शान्त नहीं हुआ। वे अपनी जोंगा जीप लेकर सीधे हेलीपैड पहुंचे और वहां खड़े मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर के हेलिकॉप्टर को अपनी जीप से टक्कर मार-मारकर तोड़ डाला।

शिवचरण माथुर की  राजा मान सिंह को धमकी

इस घटना की प्रतिक्रिया में कांग्रेस और राजा समर्थकों में कई स्थान पर झड़प हुईं। शिवचरण माथुर को अपना भाषण बीच में ही छोड़कर वापिस लाटना पड़ा। लकिन वह जाते हुए राजा मान सिंह को धमकी दे गया कि राजा मानसिंह को बहुत जल्द इसके बहुत गम्भीर परिणाम भुगतने होंगे। थाना डीग में राजा मान सिंह के खिलाफ सरकारी सम्पत्ति का नुकसान करने, मुख्यमंत्री और उसके हेलीकोप्टार चालक को जान से मारने की नीयत से उन पर हमला करने, हैलीकाप्टर तोड़ने और दंगा भड़काने का प्रयास करने का केस दर्ज कर दिया गया.

राजा मान सिंह अगले दिन अर्थात 21 फरवरी को अपने समर्थकों के साथ चुनाव प्रचार हेतु अपनी जीप से निकल तो डीग मंडी के पास डीग के डिप्टी एसपी कान सिंह भाटी की अगुवाई में 17-18 पुलिसकर्मियों के एक दल ने उन्हें अचानक घेर कर मार डाला गया। और घटना को अंजाम देने के बाद थाना डीग के थानाध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह द्वारा राजा मान सिंह व उनके समर्थकों पर पुलिस दल पर जान से मारने की नीयत से आग्नेय अस्त्रों से आक्रमण करने का फर्जी एनकाउण्टर का मुकदमा दर्ज किया गया।

मुख्यमंत्री शिवचरण ने करायी राजा मान सिंह की हत्या?  

राजस्थान में विधानसभा चुनाव घोषित हो चुके थे. शिवचरण माथुर राजस्थान का मुख्यमंत्री था। कांग्रेस हाई कमान से माथुर को आदेशित हुआ था कि डीग विधानसभा क्षेत्र से प्रत्येक दशा में राजा मान सिंह के राजनीतिक किले को ध्वस्त कर कांग्रेस प्रत्याशी को जीत दिलायी जाये और कांग्रेस की गिरती साख को बचाया जाये।

आरोपित है कि कांग्रेस पार्टी हाई कमान के इस आदेश पर मुख्यमंत्री माथुर ने डीग की सीट को हर हाल में कांग्रेस के पक्ष में करने की कसम खायी और राजा मान सिंह को येन-केन-प्रकारेण हराने का उपक्रम करना  शुरू कर दिया। माथुर ने डीग विधानसभा सीट से रिटायर्ड आईएएस अधिकारी बिजेंद्र सिंह को कांग्रेस उम्मीदवार घोषित कराया और चुनाव प्रचार का जिम्मा स्वयं ले लिया। इसके साथ माथुर ने राजा मान सिंह और भरतपुर राजघराने के विरुद्ध अपमानजनक और भड़काऊ बयान देने का सिलसिला शुरू कर दिया।

माथुर चाहता था कि उसके इन भड़काऊ बयानों पर राजा मान सिंह कुछ ऐसी प्रतिक्रिया जरूर देंगे जिसके बहाने से  प्रशासन उनके विरुद्ध कोई भी झूठा सच्चा आपराधिक मामला बनाकर चुनाव संपन्न होने तक  उनको जेल में दाल सकता था। माथुर का विचार था कि एक बार राजा मान सिंह के जेल जाने के बाद उनकी छवि को आसानी से ध्वस्त कर उनके राजनीतिक वर्चस्व को आसानी से खत्म किया जा सकता था।

राजा मान सिंह की हत्या की सजिश 

इसी योजना के तहत मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए राजा मान सिंह और उनके परिवार का बार-बार अपमान किया . उसके ही आदेश पर  राजा मान सिंह के बैनर-पोस्टर फाडे गए और यहाँ तक कि पा खो उठे और इसका परिणाम राजा साहब की मौत के रूप में सामने आया। लेकिन माथुर पर भी कहावत ‘आसमान का थूका मुंह पर ही आकर गिरता है’ चरितार्थ हुई। अहंकार में डूबे माथुर को भी इस घटना के कुल 24 घण्टे बाद ही अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद माथुर इतिहास की रेत के नीचे सदा-सदा के लिए दफन हो गया।

सीबीआई द्वारा इस हत्याकांड की पूरी गम्भीरता के साथ जांच की. यद्यपि  सी बी आई पर इस जाँच को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दबाव डाले गये, किन्तु सी बी आई ने पूरी ईमानदारी व् निष्पक्षता के साथ केवल 4 माह में मामले की जांच पूरी कर जयपुर स्थित सी बी आई न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर दिया. इस हत्याकांड के अभियुक्त राजस्थान पुलिस के अधिकारी थे  और वे अपने पदों के प्रभाव से मामले को प्रभावित कर सकते थे, अतः स्वर्गीय राजा मान सिंह की पुत्री  दीपा सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका प्रस्तुत कर मांग की कि चूंकि उनके पिता के आरेपित हत्यारे अत्यन्त प्रभावशाली पुलिस अधिकारी हैं, इस कारण वे जयपुर में न्याय कों प्रभावित कर सकते हैं। अतः उनके पिता की हत्या का मामला जयपुर के स्थान पर उत्तर प्रदेश के मथुरा न्यायालय में स्थानान्तरित कर दिया जाये। दीपा सिंह की इस याचिका  पर सुप्रीम कोर्ट ने इस वाद की सुनवाई मथुरा न्यायालय में स्थानान्तरित कर दी।

30 साल तक चला हत्या का यह मुकदमा 

वर्ष 1990 में मथुरा के जिला एवं सत्र न्यायालय में राजा मान  सिंह हत्याकाण्ड की सुनवाई आरम्भ हुई। इस हत्याकाण्ड की सुनवाई में अभियोजन पक्ष की ओर से 61 गवाह पेश किये गये और प्रतिवादी पक्ष की तरफ से 16 गवाह न्यायालय के समक्ष पेश किये गये। अत्यधिक सुस्त चाल से चले इस वाद में 1700 से अधिक पेशियां हुईं। इस बीच चार अभियुक्तों की मृत्यु हो गयी। अभियोजन पक्ष न्यायालय में इस तथ्य की पुष्टि करने में सफल रहा कि पुलिस दल द्वारा निरपराध राजा मान सिंह व उनके साथियों-सुमेर सिंह और हरि सिंह को अकारण ही घेरकर मारा गया था। अभियोजन पक्ष ने सिद्ध कर दिया कि पुलिस ने राजा की जीप के आगे अपनी जीप अड़ा दी.

राजा मानसिंह की कनपटी और सीने में गोलियां मारी गई थी.  गोलियां अत्यन्त निकटता से मारी गई थी। अगर उनको गोलियां वास्तविक मुठभेड़ में लगी होती, तो गोलियां निश्चित रूप से दूर से चलायी गयी होती, जबकि राजा मान सिंह की कनपटी में लगी गोली केवल तीन फुट से भी कम दूरी से चलायी गयी थी। इसके अलावा अभियोजन पक्ष यह भी सिद्ध करने में सफल रहा था कि पुलिस ने योजना बनाकर राजा मानसिंह को घेरकर मारा था, न कि राजा मान सिंह और पुलिस का अचानक ही आमना-सामना हुआ था। क्योंकि जीडी में दर्ज पुलिस रिकार्ड के अनुसार पुलिस जिस समय राजा मानसिंह की तलाश में थाने से निकली थी, उसके केवल 4 मिनट बाद ही पुलिस और राजा मान सिंह के बीच मुठभेड़ दिखाई गयी थी।

न्यायालय में खुल गयी पुलिस की पोल 

पुलिस का तर्क था कि राजा मान सिंह और पुलिस दल में बहुत देर तक बहस हुई और उसके बाद राजा मान सिंह ने एक देसी कट्टा कालकर पुलिस दल पर गोली चला दी। स्पष्ट था कि पुलिस द्वारा गढ़ी गयी यह कहानी झूठ थी।  पुलिस के अनुसार राजा मान सिंह ने एक देसी  कट्टा निकालकर  पुलिस दल पर गोली चलायी थी। पुलिस ने राजा मान सिंह से एक कट्टा भी बरामद दिखाया था।. जो कि सीबीआई जांच में ही सिद्ध हो गया था कि पुलिस ने उस कट्टे को फर्जी रूप से दिखाया था। जबकि वास्तविकता यह थी कि राजा मान सिंह के पास उस समय कोई हथियार ही नहीं था। उनका रिवाल्वर बाद में उनकी पहुँच से दूर दूसरी जीपमें पाया गया था।

35 वर्ष पूर्व हुए इस हत्याकाण्ड का वाद 30 साल तक मथुरा कोर्ट में चला। इस मुकदमे का फैसला 21 जुलाई को हुआ। इस दिन मथुरा की जिला एवं सत्र न्यायाधीश साधना रानी ठाकुर ने 21 फरवरी 1985 को डीग पुलिस द्वारा किये गये एनकाउण्टर को फर्जी घोषित किया और 14 अभियुक्तों में से तीन अभियुक्तों को दोषमुक्त करते हुए रिहा कर दिया और 11 को राजा मान सिंह हत्याकाण्ड में दोषी करार दिया। न्यायालय ने दोषियों को सजा सुनाने के लिए 23 जुलाई का दिन निश्चित किया। 23 जुलाई 2020 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश साधना रानी ठाकुर ने दोषी पाये गये सभी 11 अभिुयक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी।

न्याय प्रक्रिया की सुस्त चाल

लेकिन इस प्रक्रिया ने आम जन के सम्मुख कई सवाल खड़े कर दिये हैं। पहला यह कि जब एक प्रभावशाली रियासत के वंशज और तत्कालीन विधायक की सैकड़ों प्रत्यक्षदर्शियों के सामने हुई हत्या के मामले में मृतक को न्याय मिलने में इतना लम्बा समय लग गया, तो किसी आम आदमी को न्याय कैसे सुलभ हो सकेगा। दूसरा यह कि इस हत्याकाण्ड में पर्दे के पीछे से गोटियां खेलने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर को किसी प्रकार का दण्ड नहीं मिलने से राजनेताओं द्वारा किये जाने वाले इस प्रकार के अपराधो पर अंकुश लगने की सम्भावना ंक्षीण हो गयी और यह कि सजा पाये गये अभियुक्तों में से सभी 70 से 85 वर्ष की आयु के हो चुके हैं। जल्दी ही वे उच्च न्यायालय से जमानतों पर बाहर आ जायेंगे और फिर जब तक उच्च न्यायालय का निर्णय आयेगा, उस समय तक अधिकांश अभियुक्त मृत्यु को प्राप्त हो चुके होंगे। तो क्या इसे वास्तविक न्याय कहा जा सकेगा?

राजा मान सिंह की लोकप्रियता बनी उनकी मृत्यु का कारण 

22 फरवरी को राजा मानसिंह के अन्तिम संस्कार में कई हजार लोगों ने भाग लिया। राजा मानसिंह की लोकप्रियता का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि न केवल डीग और भरतपुर, बल्कि आसपास के सेकड़ों गावों के लगभग 25 हजार आदमी राजा मानसिंह की शव यात्रा में सम्मिलित हुए थे। वहां मौजूद हर पुलिस के इस कुकृत्य से व्यथित और उद्वेलित था। हर आदमी के होंठों पर यही चर्चा थी पुलिस ने बेगुनाह राजा साहब को नकली एनकाउण्टर में मार डाला था। यह चर्चा आम थी कि राजस्थान के मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने  राजा साहब को उनकी लोकप्रियता से घबराकर डीग पुलिस के हाथों राजा मान सिंह की हत्या करायी थी। लोगों की उग्र होती भावनाओं को देख प्रशासन को डर हुआ कि कहीं राजा मान सिंह के समर्थक दंगा-फसाद पर न उतर आयें। अतः अविलम्ब शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया।

इधर डीग की जनता इस हत्याकाण्ड से इतनी उग्र थी कि जगह-जगह पुलिस के साथ लोगों की झडपें होने लगीं। इस घटना के बाद कान सिंह  भाटी और थाना डीग के थानाध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह को उनके पद से हटा दिया गया। जब नया डीएसपी डीग में आया, तो लोगों ने उसका घेराव कर दिया। मामला गम्भीर होता देख, पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी। इस गोलीकाण्ड में भी तीन आदमियों की मौत हो गयी थी।

पद छोड़ना पड़ा शिवचरण माथुर को

मामला गम्भीर होता जा रहा था, अतः इस हत्याकाण्ड की जुडीशियल जांच आरम्भ करने के आदेश हो गये। जुडीशियल जांच आरम्भ होने पर आरापित सभी पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया। इस जघन्य हत्याकांड  की तपिश पूरे राजस्थान में ही नहीं, अपितु जयपुर, मथुरा, आगरा और दिल्ली तक महसूस की गई। दिल्ली स्थित कांग्रेस आला कमान ने दिल्ली से माखनलाल फोतेदार को शिवचरण माथुर को अविलम्ब मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने हेतु तथा नया मुख्यमंत्री घोषित करने का सन्देश लेकर जयपुर भेजा। फलस्वरूप 23 फरवरी 1985 को माथुर को अपन पद से इस्तीफा देना पड़ा।

अभियोजन पक्ष ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की, तो जांच सीबीआई के सुपुर्द कर दी गयी। सीबीआई ने इस हत्याकाण्ड की विस्तृत जांच की और सैकड़ों लोगों से पूछताछ की तथा कुल 61 प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान रिकार्ड किये। सीबीआई जांच में डीएसपी कान सिंह भाटी, तत्कालीन थाना डीग थानाध्यक्ष वीरेन्द्र सिंह, चालक महेन्द्र सिंह, कांस्टेबल नेकीराम, सुखराम, कुलदीप, आरएसी कें हैै. कां. जीवाराम, भंवर सिंह, कां. हरी सिंह, शेर सिंह, छत्तर सिंह, पदमाराम, जगमोहन, पुलिस लाइन के हैड कां हरी किशन, इंसपेक्टर कान सिंह सिरबी, एस आई रवि शेखर, एएसआई सीताराम व कां. गोविन्द प्रसाद की राजा मानसिंह की हत्या में संलिप्तता पायी गयी। सीबीआई ने जयपुर की सीबीआई अदालत में 17 जुलाई 1985 को इस मामले का आरोप पत्र दाखिल कर दिया।

राजा मानसिंह की हत्या हो जाने के कारण डीग विधानसभा के चुनाव स्थगित कर दिये गये। बाद में हुए चुनावों में राजा मान सिंह की पुत्री कृष्णेंद्र कौर उर्फ दीपा सिंह विधायक का चुनाव लड़ीं और भारी मतों से उन्होंने इस चुनाव को जीता।

महाराजा सूरजमल के प्रतिनिधि थे राजा  मान सिंह 

राजस्थान का  भरतपुर राज घराना अत्यन्त चर्चित रहा है। भरतपुर महाराजा सूरजमल के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाराजा सूरजमल का पराक्रम और उनकी कूटनीति उनके समय में समस्त संसार में चर्चा का विषय थी। उनको भारत का प्लूटो कहा जाता था। उसी भरतपुर राज घराने और उन्हीं महाराजा सूरजमल के वंशज महाराजा कृष्णबीर सिंह केसीएलआई के घर सन् 1920 में बालक मान सिंह का जन्म हुआ था। मान सिंह चार भाईयों में दूसरे क्रम पर थे। सबसे बड़े थे उनकेे बड़े भाई ब्रजेन्द्र सिंह, दूसरे स्वयं मान सिंह, तीसरे गिरेन्द्र सिंह और चौथे गिरिराजसरण सिंह, जिनको बच्चू सिंह भी कहा जाता है, थे।

जब मान सिंह केवल सात वर्ष के थे, उनको इंग्लैण्ड पढ़ने भेज दिया गया। 1929 में महाराजा कृष्णबीर सिंह की मृत्यु हो गयी। महाराजा कृष्णबीर सिंह के बड़े पुत्र ब्रजेन्द्र सिंह को रियासत का महाराजा और  मान सिंह को रियासत का युवराज घोषित किया गया। मान सिंह 1942 में इंग्लैण्ड से इंजीनियरिंग करने के बाद भारत वापिस आये और सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट चुन लियेे गये।. उनके सेना में भर्ती होने की बात परिवार को किसी को पता नहीं था। लेकिन अग्रेजी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

किसानों के राजा कहे जाते थे राजा मान सिंह

उनका व्यक्तित्व अत्यंत ही प्रभावशाली था. उनके चेहरे की बनावट ठीक महाराजा सूरजमल जैसी थी. यदि राजा मान सिंह  भारी गलमुच्छें रखते होते तो वे ठीक महाराजा सूरजमल  जैसे ही दिखाई देते. राजा  मान सिंह अपने व्यव्हार और वीरोचित व्यवहार से भी  महाराजा सूरजमल के  सच्चे प्रतिनिधि थे. वह निर्भीक और न्याय का साथ देने वाले थे.

स्वाधीनता के बाद 1952 में हुए प्रथम विधानसभा चुनाव में राजा मान सिंह ने डीग विधानसभा क्षेत्रा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पहला चुनाव लड़ा जिसमें वे भारी मतों से विजयी हुए। राजा मान सिंह ने विधायक बनने के बाद क्षेत्र के गरीबों और किसानों की दिल लगाकर सेवा की। जाट  समाज के लिए वे पूर्ण रूप से समर्पित थे।राजा मान गरीबों और बेसहारा के सहारा बन गए थे. लोग उनको किसानों का राजा बुलाते थे. अपने इस व्यवहार के कारण राजा साहब नित्य लोकप्रियता के शिखर पर चढ़ते गये.

लगातार ७ बार चुनाव जीते राजा मान सिंह

राजा  मान सिंह की लोकप्रियता को देखते हुए कई राजनैतिक दलों ने उनकों अपने साथ मिलाना चाहा, किन्तु उन्होंने किसी भी दल से हाथ नहीं मिलाया। राजा मान सिंह लगातार 7 बार इस क्षेत्रा से निर्दलीय विधायक चुने गये।. उनके सामने तरह-तरह के अनेकों लुभावने प्रलोभन दिये गये, किन्तु वेे किसी भी राजनीतिक दल के प्रलोभन में नहीं आये। वह 1984 तक लगातार निर्दलीय चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। यहां तक कि 1977 की जनता पार्टी लहर और 1980 की इंदिरा लहर में भी राजा साहब साहब को काई प्रत्याशी पराजित नहीं कर पाया। कांग्रेस पार्टी के लिए राजा मान सिंह एक बड़ी चुनौती बन गये थे। सभी प्रमुख राजनीतिक दल, विशेषतः कांग्रेस पार्टी डीग में हर चुनाव में पूरी शक्ति और अपने सारे हथियार आजमा कर देख चुकी थी, किन्तु वह राजा मान सिंह के वोट बैंक के मजबूत किले को नहीं तोड़ पायी थी।

 

 

 

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