हिंदी खड़ी बोली के प्रथम कवि महात्मा गंगादास

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संत गंगादास ने खड़ी बोली में विशाल साहित्य की रचना की है। उनके द्वारा रचित विशद् साहित्य के आधार पर ही उनको हिंदी खड़ी बोली का प्रथम कवि, खड़ी बोली का आदि कवि या खड़ी बोली का पितामह कवि कहा जाता है।

हिंदी खड़ी बोली के प्रथम कवि थे महात्मा गंगादास

संत गंगादास उच्च कोटि के देशभक्त होने के साथ उच्च कोटि के कवि भी थे। उनके व्यक्तित्व तथा उनके साहित्य पर दिल्ली शाहदरा निवासी डा. जगन्नाथ शर्मा ‘हंस’ ने अपने शोधग्रंथ महाकवि गंगादासः व्यक्तित्व एवं कृतित्व में उनके जीवन के तमाम पक्षों पर विस्तृत प्रकाश डाला है। उन्होंने अपने शोध ग्रन्थ में सिद्ध किया है कि खड़ी बोली के प्रथम कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र नहीं, अपितु संत गंगादास हैं। भारतेन्दु तो खड़ी बोली में काव्य रचना को असम्भव मानते थे। महाकवि गंगादास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के पिता से आयु में दस वर्ष बड़े थे. भारतेन्दु तो खड़ी बोली में काव्य रचना को असम्भव मानते थे। श्री हंस के अनुसार जिस समय भारतेंदु का जन्म हुआ था, उस समय तक संत गंगादास हिंदी साहित्य जगत को खड़ी बोली में सहस्रों पद दे चुके थे।

 भारतेंदु हरिश्चंद्र के जन्म से पहले खड़ी बोली में सहस्रों पद लिख चुके थे गंगादास

विख्यात साहित्यकार डा. गोपीनाथ तिवारी का कथन है कि संत गंगादास ने उस समय से पूर्व ही खड़ी बोली में काव्य-सृजन कर दिया था, जब हिन्दी के कई मूर्धन्य साहित्यकार जैसे ग्रियर्सन, प्रताप नारायण मिश्र व भारतेंदु आदि यह घोषण कर चुके थे कि खड़ी बोली में पद्य-रचना असम्भव है। देखें श्री अयोध्या प्रसाद खत्री के पत्र के उत्तर में साहित्यकार ग्रियर्सन का निम्न पत्र-

Dear Sir,

I have received “Khari Boli ka padya’ and your letter for an opinion of it. I regret no criticism of mine can be, as I am of the opinion that all attempts at writing poetry in Khari Boli must be unsuccessful. The matter was fully discussed with me some years ago by Babu Harish Chandra of Banaras and consider his arguments convincing.

Sdèk-G. A. Grierson

  1. 5. 1889

ग्रियर्सन महोदय के उपर्युक्त पत्र से यह सिद्ध होता है कि हिन्दी साहित्य के जाने-माने विद्वान जब सभा करके यह निश्चय कर चुके थे कि खड़ी बोली में हिन्दी पद्य-रचना असम्भव है, उस समय से लगभग 30-40 वर्ष पूर्व से संत गंगादास खड़ी बोली में विशद ग्रंथों की रचना कर रहे थे। इससे यह सिद्ध होता है कि संत गंगादास ही हिंदी खड़ी बोली के प्रथम कवि थे.

डा. शर्मा के इस शोध ग्रंथ को पढ़कर मूर्धन्य साहित्यकार डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस ग्रंथ के सम्बन्ध में लिखा-‘डा. जगन्नाथ शर्मा हंस का शोध प्रबंध शोध विषय और अनुसंधान पद्धति की दृष्टि से एक उपयोगी कृति है। जो हिन्दी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली की महत्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौंदर्य दृष्टि और कला पर संत गंगादास का काव्य सुंदर प्रकाश डालता है।’

प्रसिद्ध समालोचक डा. रामकुमार वर्मा कहते हैं, ‘ज्ञान भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगादास विशेष प्रतिभावान हैं। इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका। डा. जगन्नाथ शर्मा ने मनोयोग से उस कवि की रचनाएं खोजकर और उनकी सुंदर समालोचना प्रस्तुत करके एक महत्वपूर्ण शोध कार्य किया है। यह शोधग्रन्थ हिन्दी साहित्य के इतिहास की कई पुरानी मान्यताओं के परिवर्तन का स्पष्ट उद्घोष करता है।’

ग्रामीण लोकोक्तियों और मुहावरों से सुसज्जित है महात्मा गंगादास का काव्य

संत गंगादास के काव्य में लोकोक्तियों, मुहावरों व अन्य तत्वों का ऐसा सुंदर समावेश हुआ है जो कि कामायनी जैसी उत्कृष्ट रचना की भाषा में भी अलभ्य है। संत गंगादास की भाषा में कुरु प्रदेशीय माटी की भीनी-भीनी सुगंध और यहां की सुंदर संस्कृति का समावेश है। यहां का लोकजीवन इनकी कविताओं में मुखर हो उठा है। संत गंगादास ने ज्ञान-भक्ति, निराकार-साकार साधना का सुंदर समन्वय किया है।

महाकवि गंगादास रचित साहित्य

महाकवि गंगादास ने 25 काव्य ग्रंथों और कई सहस्र निर्गुण पदों की खड़ी बोली में रचना की थी। उनके खड़ी बोली कथा काव्यों में-होली पूरण भक्त, नरसी भक्त, धु्रव भक्त, निर्गुण पदावली, कृष्ण जन्म, श्रवण कुमार (पद), होली नल पुराण, रामकथा, लंका चढ़ाई (अंगद रावण संवाद), लक्ष्मण मूर्छा, भरत मिलाप, गिरिराज पूजा, होली सत्यवादी हरिश्चंद्र, तत्वज्ञान-प्रकाश, ब्रह्मज्ञान चिन्तामणि, गुरु चेला संवाद, सिया स्वयंवर, ब्रह्म ज्ञान चेतावनी, ज्ञानमाला, गंगा विलास, गंगासागर, भजन महाभारत (उद्योग पर्व), द्रौपदी चीर, अमर कथा, महाभारत पदावली, बलि के पद, रुक्मणि मंगल, प्रहलाद भक्त, चन्द्रवती-नासिकेत, भ्रमर गीत मंजरी, कुण्डलियां, पद हरिश्चंद्र, निर्गुण लावनी आदि सम्मिलित हैं।

महाकवि गंगादास रचित प्रकाशित पुस्तकें

खड़ी बोली के आदि कवि संत गंगादास द्वारा रचित पुस्तकें-सुदामा चरित्र, अंगद रावण संवाद, लक्ष्मण मू्र्छा, भरत मिलाप, गिरिराज पूजा, होली सत्यवादी हरिश्चंद्र, होली भक्त पूर्णमल, तत्वज्ञान-प्रकाश, ब्रह्मज्ञान चिन्तामणि, गुरु चेला संवाद, सिया स्वयंवर, ब्रह्म ज्ञान चेतावनी, ज्ञानमाला, गंगासागर, भजन महाभारत (उद्योग पर्व), अमर कथा और अनुभव शब्दावली प्रकाशित हो चुकी हैं।
संत गंगादास के खड़ी बोली में रचित साहित्य ने उनको हिन्दी साहिम्य जगत में सदा-सदा के लिए अमर कर दिया है। हिन्दी के समस्त साहित्य में उनके मुकाबले का कोई और आचार्य, संत, कवि नहीं मिलता जिसने उत्कृष्ट काव्य के साथ-साथ स्वाधीनता के लिए भी खुलकर अलख जगायी हो। जाट समाज को संत गंगादास पर गर्व है।

सरस्वती के वरद पुत्र संत गंगादास एक ओर अपने समय के महान देशभक्त क्रांतिकारी थे, तो दूसरी ओर वे एक आचार्य कवि थे। हिन्दी के समस्त साहित्य में उनके मुकाबले का कोई और आचार्य, संत, कवि नहीं मिलता जिसने उत्कृष्ट काव्य के साथ-साथ स्वाधीनता के लिए भी खुलकर अलख जगायी हो। जाट समाज को संत गंगादास पर गर्व है।

 

 

 

Virendra Chattha

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