किसान मसीहा दीनबंधु सर छोटूराम

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किसान मसीहा दीनबंधु सर छोटूराम – उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में आधुनिक हरियाणा प्रान्त में बसे लाखों किसानों व खेतिहर मजदूरों का अपना कोई भी अस्तित्व नहीं था। वे राजनीति, विज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र से बिलकुल अनभिज्ञ दिन-रात पेट के लिए सूखी रोटी और शीत व गर्म हवा के झोकों में ठिठुरते-तपते बदन के लिए मोटा कपड़ा जुटाने में आयु-पर्यन्त भटकते रहते थे। वे फसल की बिजाई से लेकर कटाई तक मिट्टी में होकर भूमि के साथ खटते रहते थे। परन्तु उनके परिश्रम का फल सदा जमींदार और साहूकार की झोली में जाता था। गाँव के बनिये का सूद मात्र पाटने के लिए ही उसकी तथा उसके बच्चों की उम्र बीत जाती थी। साहुकारों व जमींदारों द्वारा शोषित कृषक वर्ग रोटी कपड़े से परे की बात सोच भी नहीं सकता था। सुबह तारों की छांव में हल-कुदाली लेकर खेत में निकल जाना व रात के अंधेरे में घर वापस आते ही रूखी-सूखी खाकर खटिया में पड़ जाना, यही दिनचर्या होती थी बेचारे हल के सिपाही की।

कुछेक सभ्रांत जाति वाले लोगों के प्रचलित उपालम्भों व व्यंग्य तीरों से उन किसानों- विशेषकर जाटों का हृदय छलनी हुआ जाता था। ‘जाट रे जाट, तेरे सिर पर खाट’ या ‘जाट का जाट, सोलह दूनी आठ’ आदि कुछ इस तरह के वाक्य लोग बोलते रहते थे, जिससे किसान गलियों में सीना उठाकर नहीं चल पाते थे।

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दीनबंधु छोटूराम का जन्म कब हुआ

इसी तरह के शोषित, दमघोंटू, निर्धनता व अज्ञानता के वातावरण में 24 नवम्बर 1981 के दिन आधुनिक हरियाणा के जिला रोहतक में सांपला के निकट गाँव गढ़ी में चौ. खुशीराम के घर एक गरीब किसान परिवार में माता सिरिया देवी की कोख से, एक होनहार एवं तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जो कालान्तर में गरीब, शोषित व सदियों के सताये हुए कमजोर वर्गों तथा किसानों के हितों का रक्षक बना। किसानों में राजनीति, स्वाभिमान एवं जागृति की लहर फूँकने वाले इस दीनबन्धु का नाम था सर छोटूराम। वे जीवन पर्यन्त किसानों के दिल और दिमाग पर छाये रहे।

छोटूराम के बचपन का नाम क्या था

उनका बचपन का नाम रामरिछपाल था, पर घरवाले प्यार से ‘छोटू’ के नाम से सम्बोधित करते थे। प्रारम्भिक शिक्षा सांपला की पाठशाला से शुरू होकर मिशन हाई स्कूल दिल्ली, पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर तथा लॉ कॉलेज, आगरा से वकालत डिग्री पर समाप्त हुई। अपने विद्यार्थी काल में छोटूराम एक होनहार, निपुण एवं निडर शिक्षार्थी के रूप में अपने अध्यापकों एवं अभिभावकों के समक्ष आये, पांचवी व आठवीं की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके वजीफा प्राप्त किया, ताकि गरीबी के शाप को मिटाते हुए अपनी शिक्षा चालू रख सकें।

छोटूराम की पत्नी का नाम क्या था

उनका विवाह मात्र ग्यारह साल की छोटी सी अवस्था में चौ. नान्हाराम की सुपुत्री ज्ञानोदेवी के साथ हो गया था, जो उनके लिए सारे जीवन प्रेरणा एवं शक्ति की मूक स्रोत बनी रहीं। गरीबी, सुख-दुख व चिंता की घड़ियों में श्रीमती ज्ञानोदेवी ने छोटूराम के दिल को छोटा नहीं होने दिया। उनकी प्रेरणा व सेठ छाजूराम जैसे दयालु हृदय, उदारमना प्रिंसिपल राईट तथा रुद्रा व रघुवरदयाल जैसे सज्जनों के सहयोग से आप अपने आप को भ्रष्टाचार और शोषण व सामाजिक अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए सुदृढ़ बना सके।

बचपन से ही निडर थे छोटूराम

निडरता तो बचपन से ही दीनबंधु सर छोटूराम का गहना थी। एक बार वे अपने पिताजी के साथ सांपला के साहूकार से अपनी पढ़ाई के लिए पैसा व सलाह लेने के लिए गये थे, तो साहूकार ने अपना पसीना सुखाने के लिए इनके पिताजी को पंखा खींचने को कहा, तो बालक छोटूराम गरजकर कहने लगा, ‘सेठ, तुझे लज्जा आनी चाहिये। इस काम के लिए मुझे या अपने पुत्र को कह सकता था।’ बालक की इस धमकी मात्र से ही सेठ की मोटी तोंद पसीने से लथपथ हो गयी और वह लज्जित होकर चौ. खुशीराम को कहने लगा कि आप इस बालक को पुलिस का सिपाही या पटवारी बना देना।

पढाई के दिनों से ही समाजसेवा में जुटे दीनबंधु सर छोटूराम

बी.ए. की परीक्षा देकर लाहौर से लौटे तो पिता का साया सिर पर से उठ चुका था। अध्ययन बन्द करके केवल 40 रुपये मासिक वेतन पर उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ जिले में कालाकांकर नरेश राजा रामगोपाल के यहां नौकरी कर ली। परन्तु स्वाभिमानी छोटूराम वहीं अधिक दिनों तक टिक न सके और ग्राम सुधार के लिए गन्दगी, सूद, कर्जा, मुकदमेबाजी, अंधविश्वास, विवाह में दहेज व फिजूलखर्ची, पिछड़ापन, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार आदि के विरोध में अपनी कलम उठा ली और अंग्रेजी साप्ताहिक ‘हिन्दुस्तान’ के सम्पादक के रूप में कार्य करने लगे।

जाटों को मिला ‘जाट गजट’

जाट मुवक्किलों के साथ हुक्का बजाते हुए वकील छोटूराम ने रोहतक की कचहरी में तहलका मचा दिया। जाटों को पहली बार अहसास हुआ कि इनके मर्म को समझने वाला कोई वकील भी इस कचहरी में बैठा हुआ है। इसी दौरान किसानों में शिक्षा के प्रसार के लिए सन् 1913 में जाट एंग्लो संस्कृत हाई स्कूल की स्थापना में युवा वकील छोटूराम ने अपना सक्रिय सहयोग दिया। तत्पश्चात अपनी पुरजोर आवाज  सुनाने के लिए मातनहेल निवासी चौ. कन्हैयालाल की मदद से उर्दू साप्ताहिक ‘जाट गजट’ आरम्भ किया।

राजनीती में भी छाप छोड़ी सर छोटूराम ने

अब छोटूराम प्रदेश की राजनीति में खुलकर आ गये थे . उनके ऊपर एक पक्का आर्य समाजी होने के साथ-साथ कांग्रेस व महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन की गहरी छाप पड़ गयी थी। सन् 1920 में रिसालदार सरूपसिहं के निधन के बाद वे पंजाब विधान परिषद के लिए भारी मतों से उपचुनाव में विजयी हुए. इसके बाद छोटूराम 1923, 1926, 1930 व 1933 के चुनावों में लगातार विजयी होते रहे। उन्होंने इसी दौरान सर फजल हुसैन के साथ मिलकर ‘जमींदार लीग’ पार्टी, जिसका एकमात्र उद्देश्य राजनीति को धर्म से अलग रखकर पिछडे क्षेत्रों की आर्थिक प्रगति के लिए सतत प्रयत्न करते रहना था, का गठन किया।

किसानों को साहूकारों से मुक्त कराया सर छोटूराम ने

छोटूराम ने 1924 से 1926 तक उस समय के पंजाब में कृषि व शिक्षा मंत्रालय का भार सम्भाला। उन्हांने अपने मंत्रित्व काल में किसानों के हितों को सदा अपनी आँखों के सामने रखा। वे कहा करते थे कि एक भारतीय होने के साथ-साथ में पक्का खेतिहर हूँ, और इनके हक के लिए लड़ना मैं अपना सर्वप्रथम कर्त्तव्य समझता हूँ। उन्होंने अपने ‘जाट गजट’ में लेखों के माध्यम से समस्त पंजाब प्रदेश में एक सामाजिक चेतना व किसान वर्ग में वैचारिक क्रान्ति सी लाकर खड़ी कर दी थी। उन्होंने गरीब किसानों को साहूकारों के चंगुल से छुड़ाने, उनकी भूमि को भूमि कर से मुक्त कराने, लगान हटाने और उनके आर्थिक विकास के लिए मंत्रिमण्डल में सदा आवाज उठायी, जिसने कई बार अंग्रेज शासकों को हिलाकर रख दिया था। उन्होंने 1932 की सर्वजातीय काँफ्रेंस में किसान का राज स्थापित करने कि लिए मंडी बिल, कर कानून, भूमि सुधार व कर्मचारी कानून आदि का परिचय देकर अपने आपको किसानों का सच्चा हितैषी सिद्ध कर दिया। उन्होंने यह भी अनुभव किया कि पर्याप्त सिंचाई साधनों व भूमि सुधार कानूनों के बिना किसानों का विकास असम्भव है। इसीलिए 8 जनवरी 1945 को भाखड़ा बांध योजना पर अपने अन्तिम हस्ताक्षर किये और छोटे किसानों का लगान माफ कराने के लिए एक लम्बी सैद्धान्तिक लड़ाई लड़ी।

किसान-मजदूर विरोधी ब्रिटिश कानूनों से लड़ते रहे सर छोटूराम

एक बार जब वे अपनी वकालत का काम रोहतक कोर्ट में करते थे, तो समरगोपालपुर की एक राजपूत विधवा का केस उनके पास आया। उन्होंने उसकी निःशुल्क पैरवी की। उस महिला पर किसी साहूकार का कुछ रुपया बकाया था, पर वह अबला स्त्री उस कर्ज को चुकाने में असमर्थ थी। साहूकार ने डिक्री का दावा कर दिया था। वादी वकील ने उस असहाय अबला के घर-जमीन सभी कुछ की कुर्की कराकर कर्ज चुकवाने की दलील रखी। चौ. साहब ने इसका डटकर प्रतिवाद किया।  उन्होंने कहा कि ‘जब किसान के उत्पादन का उपकरण या साधन ही नहीं रहेंगे तो वह अपने कर्जे कहां से चुकायेगा और कहां से वह अपने परिवार का निर्वाह करेगा? यह तो उसके साथ सरासर अन्याय और उनके हितों की सरासर अनदेखी है।’ इस पर जज साहब ने उनकी दलीलों पर सहमति व्यक्त की, पर कानून की सीमा में रहते हुए ऐसा न करने में अपनी असमर्थता प्रकट की। उसी से चौ. साहब ने प्रतिज्ञा की कि मुझे यह अन्धा-बहरा कानून ही बदल डालना है। इस कानून को बदलने के लिए ही उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। जीवन-भर वे इन्हीं लूले-लंगड़े और बौने कानूनों के विरुद्ध लड़ते रहे और अन्ततः उनको बदलवाया और उनको मानवीय धरातल पर किसान व मजदूर के हित में मोड़ा।

किसानों के हित में कई कानून बनवाए

ब्रिटिश काल में किसान से 36 प्रतिशत ब्याज पर कर्जा वसूला जाता था, जिसकी देनदारी में  उस बेचारे की सारी जमीन चली जाती थी। कानून के अन्तर्गत वह जमीन हमेशा-हमेशा के लिए किसान से छीन ली जाती थी। वह सर्वथा के लिए साधनहीन हो जाता था। चौ. छोटूराम ने कर्जा-एक्ट पास कराके किसानों को अत्यंत दमघोंटू कर्ज भार से मुक्त किया।

चौ. साहब ने दारुण व दयनीय दुरावस्था से भारतीय दरिद्रनारायण को उबारने के लिए दूसरा बिल ‘जरई एक्ट आराजी’ बनवाया, जिसके अन्तर्गत यह प्रावधान कर दिया गया कि एक किसान की भूमि को कोई गैर-किसान गिरवी नहीं रख सकता था। इससे उसकी भूमि स्थायी रूप से अपनी हो गयी। ये थे उनके द्वारा बनाये गये वे सुनहरी कानून जो उन्होंने उजड़े हुए अन्नदाता किसान को फिर से बसाने के लिए बनाये थे, जिनको उस समय के तथाकथित हिन्दूवादी राष्ट्रवादी लोगों ने ‘काले कानूनों’ की संज्ञा प्रदान की थी।

महात्मा गाँधी के स्वराज्य के लिए काम किया

तथाकथित राष्ट्रवादी नेताओं की दृष्टि में किसान की इस शोषणमुक्ति की अपेक्षा राष्ट्रमुक्ति की चिन्ता अधिक थी। मानो जैसे कि किसान और मजदूर राष्ट्र के अंग ही न हों। उनकी मुक्ति कदाचित राष्ट्र मुक्ति का अंग ही नहीं थी। जब चौ. साहब से यह पूछा जाता था कि आप आने वाले स्वराज्य के लिए इतने तत्पर होकर क्यों नहीं उतरने का प्रयत्न करते, जितना किसानों को उठाने का कर रहे हो? चौ. साहब का उत्तर होता था कि यदि आने वाले स्वराज्य में यदि इन मजदूरों-किसानों का ही कोई भाग नहीं होगा, तो ये उस वायवी स्वराज्य का क्या करेंगे? मैं उसी में इनकी सक्रिय भागीदारी के लिए इन्हें जगा रहा हूँ। यही थी उनकी स्वराज्य परिकल्पना, जो गांधी जी के स्वराज्य परिकल्पना से कतई भिन्न नहीं थी। गांधीजी भी गांव के किसान मजदूरों को शोषण से मुक्ति को ही सच्चा स्वराज्य कहा करते थे। इस सबके बावजूद भी उन्हें राजनीतिक ईर्ष्यावश बदनाम करने के लिए अंग्रेजों का पिछलग्गू या एजेंट तक बताया गया और स्वराज्य का विरोधी तथा जाति प्रतिक्रियावादी तक कहा गया।

प्रखर राष्ट्रवादी थे सर छोटूराम

उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध लिखे लेखों व भाषणों के माध्यम से अपना संघर्ष जारी रखा। उन्होंने अंग्रेज अधिकारियों के विरुद्ध ‘जाट-गजट’ में ऐसे-ऐसे संगीन आरोप लगाये थे कि सरकार को लेने के देने पड़ जाते थे। गवर्नर जैसे सर्वोच्च अधिकारियों की भी वे अपने लेखों में खुलकर खबर लेते थे। अंग्रेजी अफसरों और शासकों से वे भारतीय नागरिक को कहीं बढ़कर महत्व देते थे। दो ही दृष्टान्त उनकी इस भावना को समझने के लिए पर्याप्त होंगे। एक बार एक अंग्रेज सैक्रेटरी मिú कैसल तत्कालीन विधान परिषद का अध्यक्ष बनना चाहता था। राज्यपाल ने भी उसे वचन दे रखा था और वे इसके लिए विधान परिषद के मनोनीत सदस्यों को आदेश भी दे चुके थे। परन्तु चौ. छोटूराम ने इसको अपने वैधानिक अधिकारों पर खुली डकैती समझकर एक भारतीय श्री अब्दुल कादिर को अध्यक्ष बनवाया था। चौ. साहब के साथ प्रबल बहुमत को देखकर मि. कैसल को हारने के भय से बैठना पड़ा था। दूसरी ओर हमारे तथाकथित राष्ट्रीय नेता डॉ. गोकुलचन्द नारंग और सर मोहनलाल जैसे लोग मि. कैसल को इस पद को तश्तरी में रखकर परोस रहे थे। यही थी उनकी तथाकथित राष्ट्रवादी मनोवृत्ति।

हमें चौ. छोटूराम वास्तव में दो ही स्वरूपों में मिलते हैं। पहला स्वरूप उनका क्रान्तिकारी किसानवादी का है, दूसरा प्रखर राष्ट्रवादी का। किसानवाद को उन्होंने प्राथमिकता दी है। उन्होंने इसे राष्ट्र की रीढ़ समझा था, क्योंकि यही राष्ट्र का बहुसंख्यक वर्ग है। वही अन्नदाता और रक्षक (सैनिक)  के रूप में प्राणदाता भी है। जब वही बहुसंख्यक वर्ग दीन-हीन विपन्न होगा तो राष्ट्र कहां से समृद्ध होगा? उनके लिए यही 90 प्रतिशत की विराट बहुसंख्या ही राष्ट्र थी। चन्द चमकते-दमकते नगरों की अत्यल्प दस प्रतिशत जनसंख्या को ही वे राष्ट्र मानकर नहीं चलते थे। सच्चा लोकतंत्र भी यही है जिसमें बहुमत की सुख सुविधाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखकर चला जाये। इस प्रकार वे जहां उग्र किसानवादी थे, वहीं पर उदार जनवादी भी। लेकिन उनका जनतंत्रवाद जनवाद पर आधारित था। यही उनकी विशेषता थी।

चौधरी साहब का राष्ट्रवादी स्वरूप तब निखरकर आया, जब मुस्लिम-लीग की लगायी गयी साम्प्रदायिक आग पंजाब में फैलने लग गयी थी। उन्होंने उसका डटकर मुकाबला किया। ऐसा भी समय आया, जबकि उनकी पार्टी के मुख्यमंत्री (प्रधानमंत्री) स्वयं अंतरंग रूप से मोहम्मद अली जिन्ना से प्रभावित थे-उन्होंने ऐसे विषम और विकट समय में भी मुस्लिम बहुल जमींदार लीग पार्टी को संगठित रखा। जिन्ना कई बार पंजाब में पाकिस्तान के पैगाम को लेकर आये थे, लेकिन चौ. छोटूराम की दृढ़ता और शक्ति के सामने उसे बैरंग लौटना पड़ा था। इस बात के लिए उनके घोर विरोधी पत्रों ने भी उनकी दृढ़ता की प्रशंसा की थी। एक पत्र ने लिखा था-‘चौधरी साहब मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक आंधी के सामने जिब्राल्टर की चट्टान की तरह दृढ़ रहे।’ यह था उनका प्रखर राष्ट्रवादी लौह पुरुषत्व।

साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे सर छोटूराम

साम्प्रदायिकता चाहे कैसी भी हो-वे इसके कट्टर विरोधी थे। क्योंकि वे धर्म को आत्मिक उत्थान का साधन समझते थे, इसीलिए उसे व्यक्तिगत जीवन की चीज ठहराते थे। सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन से वे इसका कोई लेना-देना नहीं समझते थे। व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने कट्टर आर्यसमाजी (वैदिक धर्मी) होते हुए भी किसी भी इतर धर्म-सम्प्रदाय से कभी भी भेदभाव या विद्वेष नहीं किया। उनकी राजनीति आर्थिक सिद्धान्तों पर आधारित थी। वे उसी आधार पर संगठन करते थे। वे किसानों के हिमायती थे। उस समय पंजाब मुस्लिम बहुल क्षेत्र था। जिसमें किसान भी अधिसंख्य वही थे। तब उनके साथ चौधरी छोटूराम का सम्पर्क और लगाव होना स्वाभाविक ही था। वहां साम्प्रदायिकता के लिए स्थान ही कहां था? हमारे शहरी पूँजीपति उन्हें मुसलमानों का समर्थक कहकर इसी आधार पर बदनाम किया करते थे। जबकि वे स्वयं मुसलमान व्यापारियों और पूँजीपतियों के दुमछल्ले बने हुए थे। इसके बावजूद हिन्दू-हितों के हिमायती बनते थे। इनकी यह दोमुंही दुरंगी नीति यहां तक रंग लायी कि 1926 के विधान परिषद के चुनावों के बाद चौधरी छोटूराम का पूर्ण बहुमत होते हुए भी हिन्दुवादियों ने उनको मिनिस्ट्री में सम्मिलित नहीं होने दिया और उनके स्थान पर सर फिरोज खाँ नून नामक मुसलमान को मंत्री रखवाया। यह था तत्कालीन तथाकथित हिन्दुवादी नेताओं का दोगला चरित्र। चौधरी साहब को चौधरी छोटू खाँ कहकर बदनाम किया जाता था। आश्चर्य का विषय तो यह है कि आज भी लोग उन्हीं लोगों के आधार पर उनके बारे में गलत धारणाएं बनाए हुए हैं, यह खेद का ही विषय है।

सर छोटूराम राष्ट्रीय हितों को जातीय हितों से ऊपर रखते थे

चौ0 छोटूराम साम्प्रदायिक की अपेक्षा सिद्धान्तवादी तथा राष्ट्रवादी थे। 1928 में जब साईमन कमीशन पंजाब आया, तो पंजाब से रिपोर्ट मांगी गयी थी कि मुसलमानों को कितना प्रतिनिधित्व मिले और अम्बाला डिवीजन (वर्तमान हरियाणा) को दिल्ली और मेरठ मण्डल से मिलाकर अलग से दिल्ली प्रदेश बनाया जाये-ये विचार माँगे गये थे। चौ. साहब की यूनियनिस्ट पार्टी सत्ता में थी। उसकी ओर से चौधरी साहब ने ही रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें उनके व्यक्तिगत और जातीय हितों के समाहित होने का पूरा-पूरा अवसर था, क्योंकि वह प्रदेश निश्चित ही जाट बहुल होता। जाट-शक्ति का एकीकरण होता और उनके प्रभाव क्षेत्र की परिधि में वृद्धि होती और वे इस क्षेत्र में एकाधिपति भी होते। परन्तु उन्होंने राष्ट्रीय हितों को व्यक्तिगत और जातीय हितों से ऊपर रखा और और यह रिपोर्ट दी कि ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पंजाब और भी मुस्लिम बहुल हो जायेगा और उसके विभाजन की संभावनाएं और भी अधिक बढ़ जायेंगी। यह था उनका राष्ट्रीय चरित्र। इसके बावजूद लोग उन्हें बजाय किसान और राष्ट्र के, मात्र जाटों के नेता और हितैषी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह उनकी उनके बारे में संकुचित साम्प्रदायिक दृष्टि ही कही जायेगी।

भारत के बंटवारे के विरोधी थे सर छोटूराम

चौधरी साहब ने अपने जीते जी पाकिस्तान न बनने देने का भीषण व्रत लिया था। वह भी ऐसे समय में जबकि जिन्ना और उसकी मुस्लिम लीग की तूती बोलती थी। उन्होंने जिन्ना को जिन्ह (भूत) कहकर जूत दिखाया था। यह उन्हीं का साहसिक कार्य था। गांधी जी और नेहरू जी भी जिस जिन्ना से आतंकित थे, उसको उन्होंने धता बतायी थी। चुनावों में  उन्होंने मुस्लिम-लीग को करारी मात दी और उसे केवल दो ही स्थान मिलने दिये। थे मुस्लिम बहुल क्षेत्र होते हुए भी उन्होंने अपनी पार्टी को सबल रखा। उनके दम में दम रहते हुए मुस्लिम-लीग और जिन्ना की एक न चली। लेकिन विधि का विधान  विचित्र है। भारत के भाग्य में अखण्डता नहीं लिखी थी। उसने भारत से उसका वीर सपूत ऐसे विषम समय में छीन लिया, जबकि उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी। क्योंकि पंजाब का विभाजन ही भारत-विभाजन था। उनके जाते ही पंजाब नेतृत्वविहीन हो गया और मुस्लिम-लीग की साम्प्रदायिक आग ने उसको लील लिया। चौधरी साहब के देहावसान के समय पर उनके विरोधी से विरोधी व्यक्ति ने भी उनके लिए आठ-आठ आँसू बहाये थे क्योंकि अब वे एक प्रान्तीय या जातीय या वर्गीय नेता न होकर, राष्ट्रनायक की भूमिका निभा रहे थे। अब सबको जंच गया था कि कांग्रेसी नेता भारत विभाजन को रोक नहीं सकेंगे, और हुआ भी यही। इस प्रकार से चौधरी छोटूराम जहां कृषक क्रांति के सूत्रधार थे, वहीं पर सशक्त राष्ट्र प्रहरी भी थे।

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