Forgotten Jat History

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Forgotten Jat History

जाट कौम सदियों से बाहरी आक्रांताओं पर कहर बनकर टूटती रही है और स्वयं भी बर्बाद होती रही है। जब-जब भी देश पर कोई विपत्ति आयी जाटों ने सबसे आगे बढ़ कर देश की रक्षा की है। ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं, जबकि जाट कौम ने देश हित के लिए अपने हजारों-लाखों नौजवानों को हंसते-हंसते कुर्बान कर दिया। किंतु इतिहासकारों ने जाट कौम के इतिहास को न जाने क्यों कभी भी महत्व नहीं दिया, अपितु इस कौम के इतिहास को छिपाने में ही उन्होंने अपना हित समझा। जाट जाति इतिहासकारों के षड्यन्त्रों का सदा शिकार हुई। 10 मई 1857 को मेरठ में क्रांति को चिंगारी देने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य जाट क्षेत्र ( हरियाणा)  में ही हुआ। हरियाणा के सबसे महत्वपूर्ण स्थान मेरठ स्थित सैनिक छावनी के देसी सेना की लम्बोड़ी पलटन के 85 सैनिकों ने, जिनमें 28 सैनिक जाट थे, गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से तोड़ने से इंकार कर, पहली बार अंग्रेजी अफसरों के आदेश के उल्लंघन का साहस किया था।
वतनपरस्ती के जज्बे और उत्साह से लबरेज देसी सैनिकों ने अनेकों अँगरेज़ अधिकारीयों को  मौत के घाट उतार दिया गया। सरकारी कार्यालयों और अंग्रेजों के बंगलों को जला दिया गया। बचे हुए अंग्रेज अधिकारी अपने मुंह पर कालिख पोत कर और कुछ साधुओं का वेश धरकर मेरठ से भाग गये। क्रांतिकारियों ने मेरठ को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। मेरठ को अंग्रेजां के कब्जे से मुक्त कराने से उत्साहित सैनिकों ने दिल्ली को आजाद कराने के लिए दिल्ली की ओर कूच कर दिया।


क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर बादशाह बहादुरशाह जफर को भारत का स्वतंत्र सम्राट घोषित कर लाल किले पर केसरिया झण्डा लहरा दिया और नारा दिया, ‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का’। अंग्रेजों को उनकी औकात बताने वालों में सबसे आगे थे उत्तरी भारत के जाट और मुसलमान। इस क्रांति युद्ध में मुसलमान जहां अपने खोये हुए मुगल साम्राज्य को वापिस पाने के लिए इस युद्ध में शामिल हुए थे, जबकि जाट विशुद्ध देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो इस क्रांति युद्ध में सम्मिलित हुए थे।
दिल्ली और निकटवर्ती क्षेत्र के जाटों ने भारी संख्या में इस क्रांति में भाग लिया। दिल्ली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, शामली, बड़ौत, बिजनौर, बागपत, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मुरादाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, हिसार, रोहतक, हांसी, सोनीपत, पानीपत, अम्बाला आदि स्थानों पर जाटों ने परम्परागत हथियारों से ही अनगिनत अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर उत्तरी भारत के एक बड़े भूभाग को स्वतन्त्र करा लिया। जाट अपने परम्परागत देशभक्ति के जज्बे के कारण अंग्रेजों का काल बन गये थे।
विद्रोह काल में वर्तमान हरियाणा के जाटों का क्रांति में सबसे अधिक योगदान रहा। स्वाधीनता संग्राम में दिल्ली के आसपास के जाट क्षेत्र के लगभग 12 हजार से अधिक जाट वीरों ने अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए अपने प्राणों की आहुतियां दी थीं। और विद्रोह के बाद सबसे अधिक दण्ड भी इन्हीं जाटों को दिया गया। विद्रोह से गुस्साये और खिसियाये अंग्रेजों ने पूरी शक्ति के साथ विद्रोह क्षेत्र के निवासियों पर दमन चक्र चलाया। विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने जाटों को बागी करार दे कर उनके कई गांवों जैसे हरियाणा के रोहनात, छतरियां, खैरा तथा असंध गांव को पूरी तरह से तोपों से उड़ा दिया था। उन्होंने इन गांवों में एक बच्चे तक को जीवित नहीं छोड़ा और बड़ौत, शामली, पुरकाजी, रोहतक, करनाल, कैथल, थानेसर, पलवल, फरीदाबाद, गुड़गांव, हापुड़ आदि स्थानों पर बागों, सड़कों के किनारे खड़े पेड़ों पर बड़ी संख्या में क्रांति वीरों को फांसी पर लटकाया और हफ्रतों तक उन शहीदों के शवों को पेड़ों से नहीं उतरने दिया।
बागपत जिले के बड़ौत कस्बे के निकटवर्ती गांव बिजरौल निवासी बाबा शाहमल तथा मुजफ्फरनगर के कस्बा शामली के चौ. मोहर सिंह, ने अंग्रेजों के साथ इतना भयंकर युद्ध किया था कि अंग्रेज लम्बे समय तक पूरा प्रयास करने के बावजूद भी उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सके थे। एक मुसलमान देशद्रोही जासूस शौकत अली ने धोखे से शाहमल और उसके साथियों को गिरफ्तार करा दिया। बड़ौत के एक बाग में शाहमल के सभी साथियों को फांसी पर लटकाया गया, तो कुछ को भारी पत्थरों से कुचलकर मार डाला गया था। इसी प्रकार मोहर सिंह व उनके साथियों को भी फांसी पर लटकाया गया। मुजफफरनगर जिले के पुरकाजी कस्बे में 28 जाटों को भी एक बाग में फांसी पर लटकाया गया था।
अंग्रजों से हुए युद्ध और दमन चक्र में लगभग 20 हजार जाट क्रांतिकारी देश पर बलिदान हुए। जाटों के इस महाविनाश से जाटों की कई हजार औरतें विधवा हो गयीं। कितनी ही मांएं निपूती हो गयीं। हजारों बच्चे अनाथ हो गये और लाखों बेघर हो गये। अंग्रेजों द्वारा गांव के गांव फूंक डाले गये। कई गांवों में तो कोई नाम लेवा तक न बचा। सबसे अधिक जन हानि वर्तमान हरियाणा को उठानी पड़ी। अंग्रेजों ने जाटों की शक्तिशाली पंचायत हरियाणा सर्वखाप पंचायत को भंग कर, पंचायत के सारे अधिकार छीन लिये। जाटों पर कई तरह के कर थोप दिये गये। कर न दे पाने की स्थिति में उनसे उनकी सम्पत्तियां छीनी जाती रहीं। बागी करार दिये जाट गांवों की चल-अचल सम्पत्तियों को उन लोगों को दे दिया गया, जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि जाट कौम आर्थिक और सामाजिक रूप से बुरी तरह से पिछड़ गयी।
हरियाणा सर्वखाप पंचायत के प्रधान कार्यालय सौरम के अभिलेखागार में तत्कालीन बादशाह बहादुरशाह जपफर द्वारा हरियाणा सर्वखाप पंचायत को सैन्य सहायता तथा खाद्य सामग्री मांगने और हरियाणा सर्वखाप पंचायत के वीरों की प्रशंसा आदि में लिखे 6 पत्र मौजूद हैं। इस अभिलेखागार में मौजूद एक पत्र से पता चलता है कि बादशाह जफर हरियाणा सर्वखाप पंचायत के जाट वीरों और पंचायत की कार्यप्रणाली से इस कदर प्रभावित हुए थे कि वे देश का शासन तक सर्वखाप पंचायत को सौंपने के लिए तैयार थे।

इस पर भी भारत के इतिहासकारों को जाटों की वीरता, उनका त्याग और बलिदान दिखाई नहीं देता। इतिहासकार जाटों के योगदान और उनके महान बलिदान को जानबूझकर छिपा गये। जबकि वे उन राजाओं को महिमामण्डित करते रहे, जिन्होंने 1857 में न केवल अंग्रेजों का साथ देकर देश के साथ विश्वासघात का पाप कार्य किया, वरन् जिन्होंने अपने लाखों देसी भाईयों को मौत के मुंह में धकेला और न जाने कितने गांवों को श्मशान में बदलने में अपना योगदान दिया।
इन चापलूस इतिहासकारों ने राजा नाहर सिंह, जिन्होंने अपने शौर्य के प्रदर्शन से दिल्ली को अंग्रेजों से छीना और अंग्रेजों के भारी आक्रमणों के बावजूद भी लगभग सवा तीन माह तक दिल्ली को आजाद रखा, उनके अप्रतिम शौर्य, उनकी देशभक्ति की भावना, देश के लिए बलिदान  को नगण्य सिद्ध कर रहे हैं,  बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों के हाथ गिरफतार कराने वाले उनके अति विश्वासपात्र दरबारी मिर्जा इलाहीबख्श के पापों को छिपाने के लिए उनके दुष्कर्म पर पर्दा डालने के उपक्रम किये जा रहे हैं। इन ओछे इतिहासकारों के दुस्साहस की परकाष्ठा तो देखिये कि ये पाठ्य पुस्तकों तक में जाटों को लुटेरा, विश्वासघाती और न जाने क्या-क्या कहने लगे हैं।
आज इस ज्वलंत प्रश्न पर विचार करने का समय है कि 1857 के महासंग्राम में जाटों के द्वारा किये गये महान बलिदानों और उनके महाविनाश पर इतिहासकार मौन क्यों हैं? क्या यह जाटों के विरुद्ध कोई सोची-समझी साजिश तो नहीं है? अब इस प्रश्न पर भी विशेष ध्यान देने का समय आ गया है कि क्या इस साजिश में इन ओछे इतिहासकारों के साथ कुछ कुटिल राजनीतिज्ञ भी तो शामिल नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि कुछ कुटिल राजनीतिज्ञ इस मुहिम में इतिहासकारों को अपने पक्ष में कर, उनका जाट कौम के विरुद्ध इस्तेमाल कर रहे हों, जैसा कि वर्ष 1995 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक नाटक ‘द ग्रेट मराठा’ के माध्यम से महान जाटा योद्धा भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल के विरुद्ध एक कुटिल राजनीतिज्ञ ने अनर्गल प्रचार कराकर महाराजा सूरजमल और जाटों का भारी अपमान किया था?
देश-जाति की रक्षा के लिए मर मिटने वाला प्रत्येक व्यक्ति देश-जाति की संयुक्त धरोहर हो जाता है। क्या देश की अखण्डता, उसकी आजादी की खातिर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले जाट इतने बेगाने और नपफरत योग्य हो गये हैं कि उनके बलिदानों पर पर्दा डाला जा रहा है? वे लोग कौन हैं जो महान बलिदानी राजा नाहर सिंह, बड़ौत के महान सैनानी बाबा शाहमल, शामली के जाट वीर चौ. मोहर सिंह, झाड़सा के जाट वीर चौ. गालम सिंह और बख्तावर सिंह, हरियाणा के रोहनात, छतरियां, असंध और खैरा गांव के शहीदों से वैमनस्य मान रहे हैं? क्या ये हजारों जाट वीर इस देश की अस्मत बचाने के लिए कुर्बान नहीं हुए थे? क्या उनका अंग्रेजों से कोई व्यक्तिगत विवाद था या वे अंग्रेजों की सम्पत्ति या उनका राज्य हथियाना चाहते थे?
जाट कौम के इन दीवानों को किसी सम्पति का लालच नहीं था, उन्हें किसी पुरुस्कार की दरकार नही थी, उन्हें किसी अंग्रेज से कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। वे तो केवल भारत मां को गुलामी की जंजीरों से आजाद करना चाहते थे। बस इसी भावना ने उन्हांने स्वयं को क्रांति की आग में झोंक दिया।
उन आजादी के दीवानों ने कभी यह कामना नहीं की थी कि देश की भावी पीढ़ियां उन्हें सम्मानित करें या उन्हें पुरुस्कार दें। लेकिन उन्हें यह भी आभास न था कि देश के भावी इतिहासकार उनके योगदान पर खाक डालने का षड्यन्त्र कर उनके बलिदानों की गाथाओं को न सिपर्फ इतिहास के पन्नों से गायब करने की साजिश करेंगे, वरन् उनको लुटेरा, विश्वासघाती तथा ऐसे ही दूसरे अपमानजनक शब्दों से लज्जित करेंगे।

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