महात्मा संत गंगा दास (Mahatma Gangadas) जिन्होंने रानी लक्ष्मी बाई को युद्ध की प्रेरणा दी

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Sant Gangadas महाकवि संत गंगादास ने रानी लक्ष्मी बाई को युद्ध लड़ने की प्रेरणा देकर अमर किया। महान देशभक्त और उच्चकोटि के कवि महात्मा गंगादास का हिंदी काव्य और 1857 के स्वाधीनता संग्राम में अतुलनीय योगदान है. संत गंगादस खड़ी  बोली के प्रथम कवि हैं.

साधारण किसान पविार में जन्मे थे संत गंगादास

महान दार्शनिक, भावुक भक्त, उदासी संत, खड़ी बोली के प्रथम कवि और 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महान रणनीतिज्ञ, संत गंगादास का जन्म दिल्ली-मुरादाबाद मार्ग पर स्थित गाजियाबाद जनपद के रसूलपुर नामक ग्राम में सन् 1823 ई. को बसंत पंचमी के दिन एक साधारण जाट परिवार में हुआ था। इनका बचपन का नाम गंगाबख्श था। इनके पिता चौ. सुखीराम मुंडेर गोत्रीय पंजाबी जाट जमींदार व माता का नाम दाखा था। उनके पिता साधारण किसान थे। साहित्य आदि से पूरे परिवार का कोई सम्पर्क नहीं था।

11 वर्ष की आयु में सन्यासी बन गए संत गंगादास

बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने से गंगाबख्श को संसार से विरक्ति हो गयी और केवल 11 वर्ष की आयु में ही वे सन्यासी बनकर घर से निकल गये। उन्होंने विष्णुदास उदासीन से दीक्षा लेकर अपना नाम गंगादास रख लिया। उस समय किसी को यह अनुमान नहीं था कि यह साधारण सा बालक एक दिन हिन्दी साहित्य के सितारे के रूप में चमकेगा और खड़ी बोली में विशद् साहित्य की रचना कर हिन्दी साहित्य को अमूल्य भेंट देगा।

संत गंगादास को कहा जाता है खड़ी बोली का प्रथम महाकवि

संत गंगादास अनेक स्थानों का भ्रमण करने के बाद काशी पहुंचे और 20 वर्षों तक काशी में रहकर उन्होंने संस्कृत साहित्य, विशेषकर वेदांत ग्रन्थों का अध्ययन किया। गंगादास ने सर्वप्रथम मेरठ क्षेत्र में बोली जाने वाली कौरवी भाषा जिसे खड़ी बोली की जाता है, में साहित्य रचना आरम्भ की। उस समय कोई भी कवि इस क्षेत्र की बोली में रचना नहीं करता था। इसीलिए गंगादास को खड़ी बोली का प्रथम कवि या खड़ी बोली का पितामह कवि कहा गया। वे अंग्रेजों से बहुत घृणा करते थे और भारत को गुलामी से मुक्त करने के उपायों पर विचार किया करते थे। उन्होंने अपने क्रांतिकारी काव्य के माध्यम से पूरे देश में घूम-घूमकर जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध भावनाएं उभारने का महती कार्य करते हुए सम्पूर्ण भारत में स्वाधीनता की अलख जगायी।

संत गंगादास 1857 के स्वाधीनता संग्राम के समय ग्वालियर में प्रवास कर रहे थे। सारे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह के झण्डे बुलन्द किये जा रहे थे। एक वर्ष पूर्व झांसी राज्य को अंग्रेजों द्वारा विश्वासघात के बल पर अपने कब्जे में कर लिया गया था। रानी को केवल 5 हजार रुपया मासिक की पेंशन मिलती थी। वे एक साधारण स्त्री की भांति अपना समय गुजार रही थीं।

संत गंगादास ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को दी अंग्रेजों से युद्ध की प्रेरणा

जैसे ही मेरठ में विद्रोह हुआ, झांसी और उसके आसपास के सभी क्षेत्रों में भी उसकी प्रतिक्रिया हुई। उस समय झांसी में लगभग 70-80 अंग्रेज परिवार रहते थे। आम जनता और अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अफसरों को मारना-काटना शुरू कर दिया, तो अंग्रेज सिर पर पैर रखकर वहां से भाग गये। जब झांसी में कम्पनी का राज्य समाप्त हो गया और वहां अंग्रेजों का कोई राज्य प्रबन्धकर्ता न रहा, तो रानी ने झांसी का राज सम्भाल लिया। रानी ने विद्रोह में भाग नहीं लिया था। बल्कि वह अंग्रेजों के राज्य को उन्हीं के नाम पर संभाल रही थीं। इस पर भी अंग्रेजों ने रानी को विद्रोही करार दे दिया और दिल्ली पर अधिकार कर लेने के बाद, उन्होंने सर ह्यूरोज को भारी सेना के साथ झांसी फतह करने के लिए भेजा गया। रानी को इसकी भनक लग गयी। वह चिंतित हो उठी। उस समय रानी के पास कोई ऐसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं था, जिससे वे उचित राय ले सकतीं।

रानी लक्ष्मीबाई के गुरु की भूमिका में महात्मा गंगादास

उसी समय रानी को पता चला कि ग्वालियर के निकट कालपी में में गंगादास नामक एक संत गंगादास प्रवास कर रहे हैं, जो देश भर में अपने काव्य के माध्यम से क्रांति की संजीवनी प्रवाहित करते फिर रहे हैं। रानी अपनी एक सखी को लेकर महात्मा से मिलने के लिए कालपी पहुंची और उनसे मिलकर झांसी को अंग्रेजों से मुक्त कराने का रास्ता पूछा। संत गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई को गुरु के रूप में दीक्षा प्रदान की। संत गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई से कहा, ‘‘पुत्री, जिस प्रकार एक-एक धागे से वस्त्र तैयार होता है, उसी प्रकार भारत के एक-एक जन को एक सूत्र में बांधना होगा। जब तक भारत के सभी लोग एक सूत्र में नहीं बंधेंगे, आजादी पाने का सपना पूरा नहीं होगा। तुम रणचण्डी बनकर अपने हाथों में तलवार लेकर उठ खड़ी हो जाओ और आतताई अंग्रेजों का सर्वनाश कर दो। तुम्हारा नाम युगों-युगों तक श्रद्धा के साथ लिया जायेगा।’’ रानी लक्ष्मीबाई में संत गंगादास के वचन सुनकर साहस उमड़ आया और वे अंग्रेजों से युद्ध लड़ने के लिए तैयार हो गयीं।

संत गंगादास ने अपने 700 शिष्यों को रानी लक्ष्मीबाई को सौंप दिया 

उस समय झांसी राज्य के पास अंग्रेजी नीतियों के कारण अपनी कोई सेना नहीं थी। रानी ने अपने गुरु गंगादास को यह समस्या बतायी, तो संत गंगादास ने एक ही दिन में कालपी के आसपास निवास करने वाले अपने सात सौ के लगभग शिष्यों कों अपने घरेलू पारम्परिक हथियारों के साथ बुलाया और उनको सैनिकों के रूप में बुलाया और उनको झांसी की रक्षा की शपथ देकर रानी के हवाले कर दिया। सर ह्यूरोज ने अपनी विशाल सेना के साथ झांसी को चारों ओर से घेर लिया और रानी को आदेश भेजा कि वह अपने सभी प्रधान सरदारों के साथ बिना हथियार उनसे आकर मिलें। रानी समझ गयी कि यह अंग्रेजों की उन्हें गिरफ्तार करने की एक चाल थी। तब रानी ने निश्चय किया कि वे अंग्रेजी सेना के साथ युद्ध करेंगी।

मार्च सन् 1858 में अंग्रेजी सेना ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। अतः रानी ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया। भीषण युद्ध हुआ। बिना उचित हथियारों और बिना सैन्य प्रशिक्षण वाले साधारण ग्रामीणों ने अंग्रेजी सेना से डटकर लोहा लिया। किन्तु आधुनिक हथियारों से युक्त अंग्रेजी सेना का सामना वे कब तक कर सकते थे। रानी लक्ष्मीबाई अंततः अंग्रेजों की भारी सेना के सामने क्षीण पड़ गयीं। वे अपने दत्तक पुत्र दामोदर को लेकर अंतिम संग्राम पर निकल गयीं।

संत गंगादास ने किया शहीद रानी लक्ष्मीबाई का अन्तिम संस्कार

18 जून 1858 को वे अंग्रेजों से लोहा लेते हुए बुरी तरह घायल हो गयीं। लेफ्टीनेंट बाॅकर घायल रानी को पकड़ने आ पहुंचा। बुरी तरह से घायल रानी अपने सेवक रामचन्द्र देशमुख की सहायता से किसी प्रकार संत गंगादास की कुटिया में पहुंची। रानी बुरी तरह घायल थीं। उनका सिर तलवारों के प्रहारों से लगभग दो भागों में बंट गया था। उनकी एक आंख बाहर लटक रही थी। इस स्थिति में भी रानी का जीवट देखने योग्य था। उन्होंने संत गंगादास के चरणों में सिर रखते हुए कहा, ‘‘बाबा मैं झांसी की रक्षा नहीं कर सकी। मेरे बेटे का क्या होगा’’ और यह कहते हुए रानी ने संत गंगादास की गोद में अपने प्राण त्याग दिये। संत गंगादास जानते थे कि अंग्रेजी सेना कभी भी रानी को खोजती हुई वहां पहुुंच सकती थी। अतः उन्होंने अपनी कुटिया को तोड़कर अविलम्ब चिता बनायी और रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार कर दिया। अग्रेज सैनिकों ने रानी के शरीर को चिता में से निकाला चाहा, किन्तु संत गंगादास के शिष्यों ने उनको आश्रम में नहीं घुसने दिया।

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