जाट कौन होते हैं | जाट आर्य हैं

Please Share!

जाट कौन होते हैं, इस प्रश्न का पहला उत्तर है कि जाट प्राचीन आर्यों की संतान हैं. हालाँकि इस विषय में बड़ा विवाद है। भारतीय पौराणिक परम्परा एक ओर जाट जाति की उत्पत्ति  भगवान शंकर और भगवान कृष्ण से मानती है,  तो दूसरी ओर उनको हिंदू स्मृतियों में उनको शूद्र अथवा दासीपुत्र लिखा गया है। जबकि विदेशी विद्वान जाटों के शारीरिक गठन और आचार-विचार को देखकर उन्हें शुद्ध आर्य स्वीकार करते हैं। भारतीय पौराणिक परम्परा ने तो जाटों को अनार्य अथवा व्रात्य घोषित किया है।

जाट कौन होते हैं, इस बारे में इतिहासकारों का कथन

मि. हैवल का कथन

मि॰ हैवल जाटों को आर्यों के वंशज तो मानते हैं, किन्तु वह आर्यों को बाहर से आया मानते हैं। वह लिखते हैं-
‘भारतीय आर्य जाति जिसके कि वंशधर राजपूत, खत्री और जाट हैं, पंजाब, राजपूताना और कश्मीर में बसी हुई है। यह जाति उस प्राचीन आर्य जाति से बहुत अधिक मिलती-जुलती है, जो भारत में आकर बसी थी, इसकी शारीरिक बनावट लम्बोदर सुन्दर चेहरा, काली आंखें, चेहरे पर पर्याप्त बाल, लम्बा सिर और ऊंची पतली नाक जो अधिक लम्बी नहीं होती है। यह बात नितान्त सत्य है कि पंजाब और राजपूताना में जो जाट राजपूत जातियां बसती हैं, वे अपने लम्बे सिर, सीधी सुन्दर नाक, लम्बे और पतले चेहरे, अच्छे ऊंचे मस्तिष्क, क्रमबद्ध गठन और ऊंचे घुटनों से पहचानी जाती है। उनका कद लम्बा होता है। उनका साधारण शरीर गठन क्रमबद्ध सुन्दर होता है। जाट कुछ मोटेपन पर और राजपूत कुछ पतलेपन पर होता है।’

मि. नैस्फील्ड का कथन

जाटों को आर्यों के वंशज मानते हुए इतिहासकार मि॰ नैस्फील्ड लिखते हैं-
‘यदि शक्ल-सूरत कुछ समझे जाने वाली चीज है, तो जाट सिवा आर्यों के कुछ नहीं हो सकते।’

सर हेनरी एम॰ इलियट का कथन

सर हेनरी एम॰ इलियट ‘डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ दी रेसेज ऑफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज ऑफ इण्डिया’ में लिखते हैं-
‘बहुत समय हुआ मैंने कराची से पेशावर तक यात्र करके स्वयं अनुभव किया है कि जाट लोग कुछ खास परिस्थितियों के सिवाय अन्य शेष जातियों से अधिक पृथक नहीं हैं। भाषा से जो निष्कर्ष निकाला गया है, जाटों के शुद्ध रूप से आर्य होने के प्रबल पक्ष में है।’ आगे वे तर्क रखते हैं कि यदि जाट सिथियन विजेता थे, तो उनकी सिथियन भाषा कहां चली गयी और ऐसा कैसे हो सकता है कि वे आर्य भाषा जो कि वर्तमान में हिन्दी की एक शाखा है-बोलते हैं तथा शताब्दियों से बोलते चले आये हैं। पेशावर में डेरा जाट और सुलेमान पर्वतमाला के पाल कच्छ-गाेंडवा में यह हिन्दी या जाट की भाषा के नाम से विख्यात है। जाटों के आर्य वंश के होने के सिद्धांत को यदि कतई एक ओर फेंक दिया जाए तो भी इसके पक्ष में बहुत ही जोरदार प्रमाण दिये जा सकते हैं कि जाट आर्य के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकते। शारीरिक गठन और भाषा ऐसी चीज है जो कि केवल क्रियात्मक समानता के आधार पर एक तरफ नहीं रखे जा सकते। खासकर जबकि वे शब्द जिन पर कि समानता अवलम्बित है, हमारे सामने आते हैं तो वे यूनानी या चीनियों से कतई भिन्न पाये जाते हैं।

पं॰ इन्द्र विद्यावाचस्पति का कथन

पं॰ इन्द्र विद्यावाचस्पति ने अपनी पुस्तक ‘मुगल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण’ में लिखा है कि जब से जाटों का वर्णन मिलता है, वह भारतीय ही हैं और यदि भारत के बाहर कहीं भी उनके निशान मिलते हैं, तो वह भी भारत से ही गये हुए हैं।’

मि॰ कैम्पबेल का कथन

मि॰ कैम्पबेल के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति जाटों से है न कि जाटों की उत्पत्ति राजपूतों से है। उनके अनुसार जाट शुद्ध आर्य और भारतीय हैं। उनका कहना है-
‘यह सम्भव हो सकता है कि राजपूत की उत्पत्ति जाट से है और राजपूत आगे बढ़ गये हों और उन्होंने अपने प्राचीन बल-वैभव को प्राप्त कर लिया हो। लेकिन यह कि जाट राजपूत हैं और नीचे-ऊंचे दर्जे में बंट गये हैं, यह एक ऐसा सिद्धांत है जिसके लिए बिल्कुल सबूत नहीं हैं। वर्तमान उन्नतिशील जाटों के बाहरी वर्तमान आचरण से यह स्पष्ट तौर से प्रकट होता है।’

मि॰ क्रुक टेलर भी जाटों को आर्य तथा भारतीय मानते हैं।

मि॰ एडवर्ड पीकाक का कथन

मि॰ पोकॉक ‘इंडिया इन ग्रीस’ नामक पुस्तक में लिखते हैं- ‘यूनानी समाज की सारी दशा किसी को भी एशियाई ही दिखेगी और उसमें भी अधिक अंश भारतीय ही मालूम होगा। मैं उन घरानों की बातों का उल्लेख करूँगा जो भारत से तो लुप्त हो गये, पर भारतीय उपनिवेश संस्थापन के चिह्नों के साथ वही अपने धर्म तथा भाषा सहित यूनान में फिर प्रकट हुए थे। ब्राह्मणों और बौद्धों के धर्म एशिया के एक बड़े भारी भाग पर आज भी सिक्का जमाए हुए हैं। इस लम्बे युद्ध में दो बड़े नेता थे। इन दोनों में ब्राह्मण धर्म की विजय हुई। बौद्ध धर्म के नेता खदेड़ दिये गये, जिन्हें अपने उत्पीड़न करने वालों से बचने के लिए उनकी पहुंच से बाहर आश्रय लेना पड़ा था। वे लोग बैक्ट्रिया, फारस, यूनान, फिनीसिया और ग्रेट ब्रिटेन को चले गये और अपने साथ पहले की अपनी ऋषियों की श्रद्धा और विचित्र दर्जे की व्यापारिक शक्ति के साथ ज्योतिष और तंत्र-विद्या की अनोखी योग्यता भी लेते गए।’

स्कैण्डेनेविया की धर्म-पुस्तक ‘एड्डा’ में लिखा हुआ है कि यहां के आदि निवासी जेट्स व जिट्स पहले आर्य कहलाये जाते थे तथा वे असिगढ़ के निवासी थे। मि॰ पिंकाटन कहते हैं, ‘ईसा से 500 वर्ष पूर्व डेरियस के समय में यहां ओडन नाम का एक आदमी आया था जिसका उत्तराधिकारी गौतम था।’

फारसी विद्वान प्रो॰ पी॰ काक का कथन

फारसी विद्वान प्रो॰ पी॰ काक कहते हैं कि कोल चीन और आरमीनिया के प्राचीन नक्शे भारतवासियों के उपनिवेश होने के स्पष्ट और आश्चर्यजनक सबूतों से भरे पड़े हैं।

कर्नल टाड का कथन

कर्नल टाड कहते हैं- ‘जैसलमेर के इतिहास से पता चलता है कि हिन्दू जाति के बाल्हीक खानदान ने महाभारत के पश्चात खुरासान में राज्य किया।’ कर्नल अल्हाक ने लिखा है कि- ‘हमें यह समझने का अधिकार है कि 8000 वर्ष पूर्व भारत से (कुुछ लोग) अपना देश छोड़कर अपने कला कौशल तथा उच्च सभ्यता के साथ उस स्थान पर पहुंचे थे जो कि आज हमें इजिप्ट (मिस्र)के नाम से ज्ञात है।’

निष्कर्ष : जाट निसंदेह आर्य हैं

अंग्रेज इतिहासकारों के द्वारा आर्य को जाति माना गया है, जबकि वैदिक परम्परा के अनुसार आर्य का अर्थ ‘श्रेष्ठ’ है। जो व्यक्ति या व्यक्ति समूह अच्छे आचार-विचार वाला होता था- वही आर्य था। आर्य और दस्यु अथवा देव और असुर एक ही वंश के थे। अंग्रेजों ने आर्य-अनार्यों का आधार सदाचार न मानकर वर्ण-रंग को ही माना है। इसी से आर्य-अनार्यों के विषय में भ्रांति फैली है। आचार-विचार की शुद्धता की दृष्टि से जाट अपने आचरण से वास्तव में आर्य हैं। उनकी लोकतांत्रिक जनवादी परम्परा भी उन्हें आर्य ही सिद्ध करती है। आर्य मान्यताओं-मर्यादाओं के पालन करने वालों को कहा जाता था, एतएव नस्ल के आधार पर आर्य या अनार्य का यह वर्गीकरण अनावश्यक और विभेदकारी है। हां, अपने आचार-विचार, खान-पान, रहन-सहन से जाट शुद्ध आर्य ही हैं।

यह भी पढ़ें :

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.