जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई | जाट कौन हैं

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जाट कौन हैं? जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई.

जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई, इस प्रश्न का उत्तर हमें प्राचीनतम साहित्य में मिलता है. जाटों की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न विद्वानों और इतिहासकारों ने सैकड़ों पुस्तकें लिखी हैं. उन्हीं पुस्तकों के आधार पर हमारा मत है कि जाट विशिष्ट वंश न होकर एक प्रकार से प्रजातांत्रिक शक्तियों का संघ ही है। शिव की जटाओं का अर्थ भी पंचायत था। गंगा का शिव की जटाओं से निकलना भी ऐसा ही रूपक है। हरिद्वार का पहाड़ शिवालक है। शिव़आलक = शिवजी की जटाएं। यहां जटाओं का अर्थ तलहटी है। गंगा स्वर्ग (पर्वत कश्मीर) से उतरकर यहीं पर मैदान में आती है। शिवजी का पंचायती संघटन जट-संघ था। इसलिए स्वयं शिवजी भी जाट कहलाते थे। रावण ने शिव-स्त्रेत्र में उन्हें ‘जटाओं वाला जाट’ कहा है। आज के सिख जाटों को कौन शंकर पुत्र नहीं मानेगा? मोने जाट भी अपने संतोषी स्वभाव और मस्तमौलापन के कारण शंकरजी के ही अनुयायी प्रतीत होते हैं।

शंकरजी कृषि-भूमि की तलाश में हरिद्वार के ऊपर के पर्वतीय-क्षेत्र को छोड़कर पश्चिम के मैदानी क्षेत्र में आए। उनके इस आगमन स्थल को ही ‘हरियाणा’ कहा गया। रोहतक में आकर उन्होंने अपनी राजधानी बनायी। उनके ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय राजा बने। गणेश सेनापति थे। उनका हाथ हाथी की सूंड जैसा बड़ा और बलवान था। इसलिए उन्हें करि कहा जाता था। करि का एक अर्थ हाथी होता है। बाद में पौराणिकों ने उनके साथ सूंड वाली कहानी जोड़ दी। वीरभद्र शंकरजी की जटाओं (पंचायतों) का सरदार था। वही जाटों का प्रथम जन नेता था।

महाभारत से पहले भी मिलते हैं जाट जाति के प्रमाण

जाटों की उत्पत्ति कैसे हुई, इसके प्रमाण हमें महाभारत से पहले भी मिलते हैं। 1026 ई॰ में अबुल हसन अली बिन-मुहम्मद उल ने महाभारत का अरबी से फारसी में अनुवाद किया था और फारसी में ही ‘अब शहिल बिन यूप्यब जामीन’ अनुवाद किया था। उनके अनुवादों से पता चलता है कि महाभारत काल में सिन्ध देश में सिन्ध नदी के आसपास जाट जाति के लोगों का निवास था। सिंधु नरेश जयद्रथ का विवाह धृतराष्ट्र की पुत्री दुःशाला से हुआ था। जयद्रथ सिंध के जाटों का राजा हो सकता है, ऐसा अनुमान लगाया जाता है, क्योंकि कौरवों और पाण्डवों के विषय में भी ऐसा ही अनुमान लगाया जाता है। महाभारत के अनुशासन-पर्व में वर्णन मिलता है कि सिंध के अन्दर जाट और मेड़ (वर्तमान में सुनार) दो जातियां निवास करती थीं। इनमें परस्पर द्वंद्व रहता था। जयद्रथ ज्यादातर हस्तिनापुर में रहता था। तब सिंध के नागरिकों के एक शिष्टमंडल ने उनको अराजकता और अशांति की समाप्ति हेतु एक ज्ञापन दिया था। तब जयद्रथ ने इस कार्य हेतु अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए अपनी पत्नि दुःशाला को वहां का प्रशासक नियुक्त किया था। लेकिन महाभारत के बाद जाटों ने मेड क्षत्रियों को वहां से उखाड़ दिया था। तभी उन्होंने बाद में स्वर्णकार का व्यवसाय अपनाया।

हरियाणा के प्रदेश में जाटों के होने का महाभारत में भी प्रमाण है। तब इस क्षेत्र का नाम दशार्ण (दस किलों वाला क्षेत्र) था। दस किलों में रोहीतक (खोखराकोट), महित्थं (महम), कपित्थं (कलायत), शिरीषं (सिरसा), स्वर्णपथ (सोनीपत), प्रलम्बपुर (पलवल) आदि के अवशेष ही आज उपलब्ध हैं। जब महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था तो नकुल इस क्षेत्र को विजित करने आये थे।

खेती करना जाटों का मूल स्वाभाव है

जाट ज्यादातर उस भूमि पर रहना पसन्द करते हैं, जो इलाके जरखेज हैं। भारत की अधिकांश उपजाऊ भूमि पर जाट बसते हैं। अगर जाट ऊबड़-खाबड़ जमीन पर भी बसे तो उसे भी उन्होंने उपजाऊ बनाया। जाट नदियों के अति निकट रहना भी पसन्द नहीं करता है और न ही पहाड़ की तलहटी में।

जाट स्वामिभक्त नहीं देशभक्त होते हैं

जाटों का मूल चरित्र सत्ता विरोधी है। क्योंकि वे लोकतांत्रिक ढंग की पंचायती-व्यवस्था के हिमायती हैं। राजपूत और जाटों के चरित्र का यही मौलिक अन्तर है। राजपूतों ने अकबर, बाबर, मुहम्मद गौरी को जहां भारत पर आमंत्रण देकर उनकी अधीनता स्वीकार कर सुरक्षात्मक नीति अपनायी, वहीं पर जाटों ने सदैव आक्रामक नीति से काम लिया। एक कहावत प्रचलित है कि जाट स्वामीभक्त नहीं देशभक्त है जबकि राजपूत देशभक्त नहीं स्वामीभक्त है। दिल्ली और आगरा के मुगल साम्राज्य पर जाटों के अनेक आक्रमण इस बात के जीवन्त प्रमाण हैं। (क्रमशः)

पाखण्डवाद और कर्मकांड विरोधी होते हैं जाट

जाटों को कभी भी ब्राह्मणों का पाखण्डवाद अथवा मूर्तिपूजा अथवा अन्य जटिल कर्मकाण्ड स्वीकार्य नहीं था। कर्मकाण्ड तथा यज्ञ के नाम पर निरीह पशुओं तथा मनुष्यों की बलि दी जाती थी। अश्वमेघ के नाम पर घोड़े और नरमेध के नाम पर मनुष्यों की बलि भी मध्यकाल (बौद्धकाल) में दी जाने लगी थी। महात्मा बुद्ध ने धर्म के इसी हिंसक स्वरूप के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजाया था और अहिंसा को धर्म का ही हिस्सा बताया था। इसी कारण तत्कालीन ब्राह्मण वर्ग ने महात्मा बुद्ध को वेद विरोधी और नास्तिक ठहरा दिया। उनके मतानुयायियों को भी उन्होंने शूद्र और दासीपुत्र घोषित कर दिया। जो विदेशी जातियां आक्रमणकारियों के रूप में यहां आकर शासक बन गयीं थीं, उनकी कोई स्थायी सभ्यता और संस्कृति नहीं थी। ब्राह्मणों ने अपने आस्तित्व की रक्षा के लिए इन विदेशी जातियों को ‘राजपुत्र’ घोषित कर दिया और बौद्धमत ग्रहण करने वाले अधिकांश यदुवंशियों व अन्य क्षत्रियों को दासीपुत्र लिख दिया। क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणों का अनुकरण करना बन्द कर दिया था। चन्द्रबरदाई भाट के ‘पृथ्वीराज-रासो’ ग्रंथ में राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो आबू पर्वत पर वृहद्-यज्ञ की कथा और उससे अग्नि-कुल के क्षत्रियों के उद्भव का वर्णन है, वह उपरोक्त कथन को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।

इतिहासकार जाटों को आर्य मानते हैं

मि॰ हैवल जाटों को प्राचीन आर्यों के ही वंशज मानते हैं। हैवल साहब उन इतिहासकारों से सहमत नहीं हैं जो जाटों को इण्डोसीथियन मानते हैं. वे लिखते हैं कि ‘मानव तत्व-विज्ञान की खोज बतलाती है कि भारतीय आर्य जाति जिसको कि हिन्दू ग्रन्थों में लम्बे कद, सुन्दर चेहरा, पतली लम्बी नाक, चौड़े कंधे, लम्बी भुजाएं, शेर की सी कमर और हिरण की-सी पतली टांगों वाली जाति बतलाया है (जैसी कि यह प्राचीन समय में थी), आधुनिक समय पंजाब, राजपूताना, उत्तर भारत के अधिकांश भागों (हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में पायी जाती है।’

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