अब्दाली और हिंदुत्व के लिए एकजुट सर्वखाप पंचायत के योद्धा

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अब्दाली के विरुद्ध युद्ध के लिए सर्वखाप पंचायत के नाम सन्देश

वि. सम्वत 1817 में अहमदशाह अब्दाली के भारत पर आक्रमण करने पर भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने सर्वखाप के मंत्री चौधरी सौलाल को अब्दाली का मुकाबला करने के लिए सर्वखाप पंचायत के योद्धाओं को तैयार करने का संदेश भेजा था। उन्हीं दिनों महाराष्ट्र मण्डल की ओर से भी अब्दाली के विरुद्ध सैन्य सहायता पाने के लिए एक निमंत्रण पत्र मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ द्वारा भेजा गया एक पत्र सर्वखाप पंचायत के नाम आया था। एम. सी. प्रधान द्वारा लिखित ‘द पोलिटिकल सिस्टम ऑफ द जाट्स ऑफ  नोरदर्न इण्डिया’ पृष्ठ 180 पर प्रकाशित उक्त पत्र इस प्रकार है-letter of bahadurshah zafar in urdu
‘सब हिन्दु धर्म के नेताओं के नाम जाट, गूजर, तगा, राजपूत और सब हिंदुओं के नाम। महाराजा सूरजमल ने 25 हजार सेना देने का वचन दिया। हरि हर महादेव, हरि भगती की जय हो। पवित्र गंगा जमना के बीच के जाट और जाटों की सभी 18 खापों या पालों, कुलपतियों, सर्वखाप पंचायत, गूजरों, अहीरों को मेरा नमस्कार। धर्म, देश, जाति और हर हिन्दु को इस धर्म की लड़ाई में मिलकर मेरा साथ देना है। हिन्दु धर्म के एक-एक बच्चे को इस समर जो कि होने वाला है, में सम्मिलित मोर्चा लेना होगा। 9 सौ साल से विधर्माी अपना अड्डा भारत में जमाकर शासक बना है। ऐसा समय फिर नहीं मिलेगा।’
आप सब का सदाशिवराय भाऊ
वि. सं 1816 चैत सुदि तीज

सर्वखाप पंचायत के सभी योद्धा और क्रन्तिकारी हुए एकत्र

चौधरी सोलाल तथा सिसौली के चौधरी बाबा दानत राय ने सारे हरियाणा की पंचायत बुलाकर अहमदशाह अब्दाली का मुकाबला करने का संकल्प लिया और पूरे हरियाणा में घूम-घूमकर 14 हजार योद्धा एकत्र किये और उन्हें मराठा-अब्दाली युद्ध में मराठा सेना की सहायता के लिए भेजा था।
अंग्रेजों की गुलामी के शिकंजे में कसा भारत आजाद हवा में सांस लेने के लिए कसमसा रहा था। बिठूर के पेशवा नाना साहेब व उनका सेनापति तात्या टोपे पूरे देश में आजादी के लिए वातावरण तैयार करने के लिए भ्रमण कर रहे थे। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद व उनके गुरु स्वामी बिरजानंद भी भारत की आजादी के लिए प्राण प्रण एक किये हुए थे। स्वामी बिरजानंद ने सर्वखाप पंचायत के सभी मुख्य व्यक्तियों से शौरम जाकर सम्पर्क किया और आजादी प्राप्त करने की दिशा में किये जा रहे प्रयत्नों के सम्बन्ध में उनसे विस्तारपूर्वक विचार विमर्श किया।

बादशाह बहादुरशाह जफर का सर्वखाप को निमन्त्रण

बादशाह बहादुरशाह जफर अंग्रेजों से देश को आजादी दिलाने हेतु प्रयत्नशील थे। उन्हें पता था कि दिल्ली के आसपास के क्षेत्र में देश की खातिर अपने प्राणों की बाजी लगाने वाली जाति यदि कोई है तो, वह केवल जाट जाति ही है, जो देश हित के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में कदापि नहीं हिचकती। इसीलिए बादशाह ने सर्वखाप पंचायत के नाम आजादी के संग्राम में सैन्य सहायता देने हेतु एक पत्र लिखा। बादशाह के इस पत्र पर विचार करने के लिए सौरम के चौधरी हुकमचंद की अध्यक्षता में बैशाख बदी तीज को सौरम में एक सभा हुई। इस सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के बादशाह के प्रयास का सर्वखाप पंचायत समर्थन करती है और उनके इस सपने को साकार करने के लिए सर्वखाप पंचायत अपनी जान लगा देगी और बादशाह को मल्ल व अन्य सहायता उपलब्ध कराने के साथ हर प्रकार की सहायता देगी।

तात्या टोपे के अनुरोध पर सभी खापों की सभा को निमंत्रण

लगभग 6 माह बाद इसी मुद्दे पर सर्वखाप पंचायत की एक सभा कांधला में भी आयोजित की गयी। इस सभा में सर्वखाप पंचायत के सभी अधिकारियों और क्षेत्र के सभी प्रमुख चौधरियों ने भाग लिया और सर्वसम्मति से बादशाह बहादुरशाह जफर को युद्ध लड़ने के लिए मल्लों के साथ अन्य सम्पूर्ण सहायता उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। भारत को स्वाधीन कराने के उपाय खोजने के लिए बिठूर के पेशवा नाना साहब व उनके सेनापति तात्या टोपे के अनुरोध पर देश की समस्त जागीरों और खापों की एक विशाल सभा मथुरा के जंगलों में आहूत करने का निर्णय लिया गया था। इस सभा में आने के लिए सभी राजे-रजवाड़ों तथा नवाबों को आमंत्रित किया गया था।

सर्वखाप पंचायत द्वारा क्रांति का दिन निश्चित

लेकिन सभा में बहादुरशाह के पोते तथा बल्लभगढ़ नरेश राजा नाहर सिंह के अतिरिक्त किसी अन्य राजा, जागीरदार या नवाब ने उस सभा में भाग नहीं लिया। यहां तक कि स्वयं नाना और तात्या ने भी नहीं। उल्लेखनीय है कि इस सभा में हरियाणा सर्वखाप पंचायत के अनेकों जाट वीरों ने भाग लिया था और अपनी-अपनी सम्मति दी थी। इन जाट वीरों ने संकल्प लिया कि वे देश के लिए हर प्रकार की कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं। इस सभा में बल्लभगढ़ नरेश नाहर सिंह, शामली के चै. मोहर सिंह और बिजरौल के बाबा शाहमल ने अत्यंत क्रांतिकारी विचार रखे। चार दिन तक चली उस सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए भारत के लोगों को एक साथ ही विद्रोह करना होगा। और सभा ने एक प्रस्ताव द्वारा 31 मई 1857 को सम्पूर्ण विद्रोह करने का दिन निश्चित किया गया।

क्रांति की योजना असफल होने के बाद सर्वखाप पंचायत ने संभाला मोर्चा

किंतु निर्धारित दिन से पहले ही मेरठ से विद्रोह की चिंगारी फूट पड़ी। मेरठ से स्वाधीनता संग्राम की उठने वाली इस चिंगारी को दिल्ली के आसपास के जाटों ने ज्वाला के रूप में भड़काने का महती कार्य किया था। सर्वखाप पंचायत ने इस अवसर पर अपने लगभग बीस हजार मल्लों को स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों से युद्ध लड़ने हेतु दिल्ली भेजकर बहादुरशाह जफर की शक्ति बढ़ायी।
सर्वखाप पंचायत के उपलब्ध इतिहास के अनुसार वि. सं. 1455 में तैमूर लंग द्वारा भारत पर आक्रमण के समय पंचायत के 80 हजार मल्लों और 10 हजार स्त्रियों ने तैमूर की सेना का डटकर मुकाबला किया था। उस काल में पंचायत के मंत्री 92 वर्षीय चै. धर्मपाल थे, जिन्होंने स्वयं भी इस युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने रात-दिन भागदौड़ कर समस्त हरियाणा क्षेत्र से नौजवानों को एकत्र कर युद्ध क्षेत्र में भेजा था।

सर्वखाप पंचायत के हजारों योद्धाओं ने पाई वीरगति

प्रथम स्वाधीनता संग्राम में प. उत्तर प्रदेश और वर्तमान हरियाणा से सभी जातियों के लगभग 25 हजार नौजवान, अंग्रेजों से युद्ध लड़ने के लिए दिल्ली पहुंचे थे, जिनमें से लगभग 20 हजार जाट थे और उनमें से भी आठ हजार जाट अकेले वर्तमान हरियाणा के थे। सम्पूर्ण हरियाणा क्षेत्र (वर्तमान हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का भाग) के जाटों ने बादशाह के आग्रह पर दिल्ली में अंग्रेजों से लोहा ले रहे क्रांतिकारियों व शाही और विद्रोही सैनिकोें को लगातार तीन माह से भी अधिक समय तक पर्याप्त रसद और खाने-पीने की भरपूर सामग्री पहुंचायी थी।

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