जाट बने मुगल सल्तनत के पतन का कारण

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मुगल साम्राज्य के पतन में जाटों की जो महती भूमिका रही, उसकी ओर इतिहाकारों ने ध्यान ही नहीं दिया। जवाहरलाल नेहरु ने तो अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में महाराजा सूरजमल और उनके पूर्ववर्ती जाट सरदारों का जिक्र तक नहीं किया।  जबकि उसने दूसरी जातियों के छोटे से छोटे और मामूली आदमियों का जिक्र किया। इसी तरह इतिहासकार के. एम. पणिक्कर ने भी सूरजमल का कहीं जिक्र नहीं किया है। कर्नल टाॅड ने जाटों के इतिहास के बारे में अधिकांश भ्रामक बातें लिखी हैं। जबकि उस काल में महाराजा सूरजमल भारत के राजाओं के, यहां तक कि वह मुगल सम्राट तक से शक्तिशाली और धनी थे। इसके उपरान्त भी इन इतिहासकारों ने उनका कहीं जिक्र करना उचित नहीं समझा। उन्होंने जाटों को केवल लुटेरे ही साबित करने का प्रयास किया।

जाट वीर गोकुला सिंह ने मुगलों की औकात दिखाई

मुगल साम्राज्य के पतन करने वाले जाट वीर गोकल सिंह का भी किसी इतिहासकार ने कहीं जिक्र नहीं किया, जबकि उस वीर ने बिना किसी राज्य अथवा संगठन के इतनी बड़ी सेना का गठन किया था कि मुगल सल्तनत के बड़े से बडे़ सेनापति भी उसके सामने बौने साबित हो रहे थे। अंततः औरंगजेब को ही उसका दमन करने के लिए दो लाख सैनिकों वाली विशाल सेना तथा बीस तोपें लेकर स्वयं युद्ध क्षेत्र में उतरना पड़ा था। हो सकता है कि भारतीय इतिहासकारों की दृष्टि में गोकल राम महत्वपूर्ण तत्व ना रहा हो, लेकिन उसने मुगल सल्तनत की औकात को ललकारा था और बता दिया था कि आने वाले समय में जाट लोग मुगल सल्तनत की ईंट से ईंट भिड़ायेंगे।

राजाराम जाट ने अकबर की हड्डियों को जला दिया था

इसी प्रकार इतिहासकारों की दृष्टि में शायद जाट वीर राजाराम भी महत्वपूर्ण नहीं था, जिसने मुगल सल्तनत के एक बड़े स्तम्भ अकबर के मकबरे को तोड़ कर उसकी हड़्डियों को उसकी कब्र से निकाल कर उनको जला डाला था और फिर उनको यमुना नदी में प्रवाहित कर दिया था। क्या राजाराम का यह कृत्य कोई मामूली कृत्य था? क्या कोई मामूली व्यक्ति उस काल में इस तरह का घनघोर कार्य कर सकता था? और क्या इस तरह का कार्य करने वाला व्यक्ति एक दिन भी जीवित रह सकता था? लेकिन राजाराम ने डंके की चोट पर अकबर की हड्डियों को उसकी कब्रसे निकाला और उनको जलाकर यमुना नदी में बहाया। और उस पर तुर्रा यह कि मुगल सल्तनत उसका बाल तक बांका न कर सकी।

जाटों को लुटेरा क्यों कहा जाता है?

क्या औरंगजेब जैसे सम्राट के होते  कोई मामूली घटना थी? क्या राजाराम कोई वीर पुरुष नहीं था? क्या केेवल वे मुगल ही वीर थे जो अपनी सत्ता के नशे में अंधे होकर आम लोगों पर अत्याचार करते थे और उनकी स्त्रियों का हरण करते थे, उनको प्रताड़ित कर उनका धर्म नष्ट करते और उनका धर्मांतरण कराते थे? भारत के इतिहासकारों की दृष्टि में जाट लुटेरे थे क्योंकि वे लुटेरों को लूटते थे, वे उनको लूटते थे जो उन कथित इतिहासकारों अथवा चाटुकारों को अपने मन माफिक इतिहास लिखवाने के लिए धन देते थे और आज भी देते हैं।

विश्व प्रसिद्ध है जाटों का शौर्य 

जाटो की स्मृति तो बहुत अच्छी है, लेकिन उनमें इतिहास-बुद्धि कम है। वे राष्ट्रीय मंच पर देर से आये और जवाहर सिंह की मृृत्यु (1768) के बाद 1805 में भरतपुर को जीतने में लार्ड लेक की असफलता तक उनका वैभव तेजी से घटता गया। उसके बाद ह्नाइट हाॅल और कोलकाता में भरतपुर की मनोग्रन्थि बननी शुरू हो गयी। लेक की असफलता पर पर्दा डाला गया और सन् 1815 के बाद, जबकि अंततः भरतपुर जीत लिया गया, लेक के असफल अभियान की चर्चा करना तक वर्जित था। मुस्लिम इतिहासकार भला जाटों की प्रशंसा के गीत क्यों गाते? ब्र्राह्मण और कायस्थ लेखक जाटों के इतिहास से कतराकर चलने में ही अपना भला समझते थे। उन्हें चिंता थी कि कहीं नये अंग्रेज शासक उनसे अप्रसन्न न हो जाएं।

इसमें प्रमुख दोष जाटों का ही है। उनका इतिहास तो अभिमान और स्तुति योग्य था, राष्ट्रीय शौर्य में उनका कोई सानी न था, लेकिन उनका कोई अपना इतिहासकार न था, जो उनके कार्यों को भावी पीढ़ियों को बता सकता।

मुगल साम्राज्य को झकझोर दिया था जाटों ने

इतिहासकार फादर वैदेल लिखता है-‘जाटों ने भारत में कुछ वर्षों से इतना तहलका मचाया हुआ है और उनका राज्य-विस्तार इतना अधिक है तथा उनका वैभव इतने थोड़े समय में इतना बढ़ गया है कि मुगल साम्राज्य की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उन लोगों के विषय में जान लेना आवश्यक है, जिन्होंने इतनी ख्याति प्राप्त कर ली है…यदि कोई उन विप्लवों पर विचार करे, जिन्होंने इस शताब्दी में साम्राज्य को इतने प्रचंड रूप से झकझोर दिया है, तो वह अवश्य ही इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि जाट, यदि वे इनके एकमात्र कारण न भी हों, तो भी कम-से-कम महत्वपूर्ण अवश्य हैं।’

 

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