किसान क्रन्तिकारी बाबा शाहमल

Please Share!

1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्र संग्राम एक चिंगारी था, जिसने पूरे भारत में अंग्रेजो की दासता के विरुद्द एक भयंकर आग लगा दी. और वह आग तब तक शांत नहीं हुई, जब तक 15 अगस्त को अँगरेज़ भारत छोड़कर चले नहीं गए. 1857 के स्वतंत्र संग्राम में आबाल वृद्ध, नर नारी, अमीर गरीब, सभी जातियों और समुदायों के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. वहीँ भारत के किसानों ने भी अपने नायकों के साथ कंधे से कन्धा मिलकर अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष किया.

ऐसे ही एक किसान नेता थे बाबा शाहमल जिन्होंने किसानों की ही एक सेना बनाई और अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए. 10 मई 1857 को मेरठ के सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। क्रांति की इस लहर के चलते भारत के वीरों की बाहें अंग्रेजों से भिड़ने के लिए मचल उठीं। विद्रोही सैनिकों में लगभग हर जाति के लोग थे। लेकिन क्रांति के लिए सबसे अधिक उतावले जाट थे। उनके दिलों में अंग्रेजों से लोहा लेने का जोश ठाठें मार रहा था। जिस लम्बोड़ी पलटन के 85 सैनिकों को मुंह से कारतूस तौड़ने की अवज्ञा का दोषी करार दिया था, उनमें 28 जाट थे। मेरठ, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, भरतपुर, रोहतक, गुड़गांवा, पानीपत, फरीदाबाद आदि के जाट बाहुल्य क्षेत्रों के हजारों जाट वीर सिर पर कफन बांधकर अंग्रेजों से जा भिड़े।

इन्हीं जाट वीरों में से एक मेरठ जिले (वर्तमान बागपत) के गांव बिजरौल का रहने वाला नौजवान शाहमल भी था, जिसे आज आदरपूर्वक बाबा शाहमल के नाम से पुकारा जाता है। शाहमल बहुत ही बाँका वीर था। वह बचपन से ही जुर्म और अत्याचार के विरुद्ध था। अंग्रेजों का तो वह घोर शत्रु था।

शाहमल का जन्म 21 जुलाई 1810 में हुआ था। उसके पिता का नाम अमीचंद था। अमीचंद के तीन पुत्र थे-चूडा़मल, शाहमल और मोहनलाल। शाहमल की माता का नाम धन्नो था। शाहमल के दो विवाह हुए थे। उसका पहला विवाह दांदनौर निवासी रामसुख की पुत्री राजवती से हुआ था। उनसे तीन पुत्रियां पैदा हुई थीं। पुत्र की आशा में शाहमल ने दूसरा विवाह लिब्बर हेड़ी निवासी सरजीतो से किया था।

जब स्वामी बिरजानन्द ने स्वाधीनता संग्राम की योजना बनाने हेतु मथुरा में देशभक्तों की एक गुप्त सभा का आयोजन किया, तो शामली से मोहर सिंह व बड़ौत से शाहमल को भी सर्वखाप की ओर से इस सभा में आमंत्रित किया था। सभा में इन दोनों वीरों को अपने-अपने क्षेत्र में स्वाधीनता संग्राम की बागड़ोर सम्भालने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।

शाहमल एक छोटा सा किसान था। उसके पास किसी प्रकार का कोई हथियार या सैन्य ताकत नहीं थी, फिर भी उसने अंग्रेजों से लोहा लेने का प्रण ले लिया। उसने अपने आसपास के युवकों के सीनों में स्वाधीनता की चिंगारी भरनी शुरू कर दी। अनेकों युवक उसके विचारों से प्रभावित हो देश पर प्राण न्यौछावर करने के लिए अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए तैयार हो गये। देखते ही देखते शाहमल की एक छोटी सी सेना बन गयी। शाहमल ने अपनी भूमि बेचकर नेजे, तलवारें और बंदूकें खरीदीं और इन युवकों को हथियार चलाने की शिक्षा दी। मेरठ में देसी सेना ने सशस्त्र विद्रोह कर दिया, तो शाहमल 800 युवकों वाली अपनी छोटी सी सेना बनाकर अंग्रेजों पर टूट पड़ा था। उसकी छोटी सी सेना में उसके सजातीय जाट भाईयों के अलावा अन्य जातियों के लोग भी शामिल थे। उसके साथियों में हिलवाड़ी के पं. रूड़ेराम, धीरा कहार, बड़का गांव के अनेक रवा राजपूत आदि शामिल थे। शाहमल अपने साथियों को लेकर अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए निकल पड़ा। उसके साहस की पराकाष्ठा देखिये कि सीमित शस्त्रों व साधनों के बल पर, मुट्ठी भर साथियों को लेकर उसने अंग्रेजों की विशाल सेना से युद्ध छेड़ दिया और उन्हें बागपत और बड़ौत से मारकर भगा दिया। उसने बड़ौत तहसील पर कब्जा कर लिया और तहसील का सारा कोष लूट लिया। उसने बागपत से होकर जाने वाले राजमार्ग को अपने कब्जे में कर अंग्रेजों को लूटना शुरू कर दिया। उसने मेरठ जाकर अंग्रेजों की संचार सेवा को ध्वस्त कर दिया। उसने अनेकों अंग्रेजों का वध किया और जहां कहीं भी अंग्रेजी राज्य का चिन्ह मिला, उसने उसे ध्वस्त कर दिया। सहारनपुर से दिल्ली तक यमुना के किनारे का क्षेत्र उसके आधिपत्य में था। उसने यमुना नदी पर बने नावों के पुल को तोड़ दिया। जिससे अंग्रेजों का इस मार्ग से आवागमन बिल्कुल अवरुद्ध हो गया। उसने अंग्रेजों पर अपने आतंक का सिक्का बैठा दिया। अंग्रेजों को लूटने से मिले धन से शाहमल ने अत्याधुनिक हथियार खरीदने शुरू कर दिये। अब उसके पास अंग्रेजों से मुकाबला करने की शक्ति संचय होने लगी थी।

एक बार अंग्रेजों की एक बड़ी टुकड़ी शाहमल को पकड़ने के लिए बड़ौत आयी, तो शाहमल ने उस टुकड़ी को यमुना के किनारे घेर लिया। दोनों ओर से गोलियां चलने लगीं। शाहमल ने अंग्रेजी टुकड़ी का आठ दिन तक मुकाबला किया। अंत में अंग्रेजी पलटन को मैदान छोड़कर भाग जाना पड़ा।

शाहमल की शक्ति इतनी बढ़ चुकी थी कि अंग्रेजी साम्राज्य उसके नाम से थर्राने लगा था। अंग्रेजी सेना शाहमल को गिरफ्रतार करने के लिए जी जान एक किये हुए थी, लेकिन शाहमल उसके हाथ नहीं आ रहा था। तब अंग्रेज सेना ने शाहमल के साथियों के गांवों-बिजरौल, सिरसली, जोहड़ी, खेड़ी, बिजवाड़ा, अट्टा और आधे रंछाड़ को बागी करार दिया और उन गांवों को जला दिया और शाहमल के परिजनों को कष्ट देना शुरू कर दिया।

अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर दोबारा से अधिकार कर विद्रोह को पूरी तरह से दबा दिया। किंतु वह शाहमल को पकड़ने में सफल नहीं हो सकी थी। पूरे आठ माह तक शाहमल ने अंग्रेजी सेना को नाकों चने चबवाये। किंतु अंत में वह अपने ही देशवासी, बागपत के एक राष्ट्रदोही  शौकत अली के विश्वासघात का शिकार हो गया। उसकी सूचना पर अंग्रेजी सेना ने पूरी शक्ति के साथ उसे जंगल में एक स्थान पर जा घेरा। उस समय शाहमल के साथ लगभग 200 वीर जाट सिपाही थे। अंग्रेजी सेना से मुठभेड़ में उन सबने परम वीरता के साथ युद्ध किया। पूरे तीन दिन तक अंग्रेजी सेना और शाहमल की छोटी सी सेना में भयंकर युद्ध हुआ। शाहमल की सेना तीन दिन तक भूखी-प्यासी विशाल अंग्रेजी सेना से युद्ध करती रही।

31 दिसम्बर 1857 के दिन, शाहमल और उसकी छोटी सी सेना के पास न कारतूस बचे थे, न खाने-पीने की सामग्री ही। इतने पर भी शाहमल और उसके साथियों ने हौसला नहीं खोया और वे खाली हाथ ही अंग्रेजी सेना से जा भिड़े। उन्हें पता था कि वे साक्षात् मौत के मुंह में जा रहे हैं, किंतु उन्हें मौत का जरा बराबर भी भय न था। वे अंग्रेजी सेना को दिखा देना चाहते थे कि जाट उस जीवट का नाम है, जिसके सामने मौत का भी अनायास आने का साहस नहीं होता। वे निहत्थे ही अपनी खाली बंदूकें लेकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े और जितना सम्भव हुआ शत्रुओं का सफाया कर मौत की गोद में जा सोये। शाहमल अंग्रेजों से लड़ते हुए दलदल में फंस गया था। इसका लाभ उठाकर अंग्रेजी सेना ने उसका शीश काट लिया। इस प्रकार एक परम पराक्रमी जाट योद्धा और उसकी परम साहसी सेना का अंत हो गया।  

शाहमल को जिस देशद्रोही ने अंग्रेजी सेना के हाथों मरवाया, उस शौकत अली ने शाहमल के 30 कुटम्बियों तथा साथियों को भी पकड़वा दिया। उन सभी 30 व्यक्तियों को अंग्रेजों द्वारा बड़ौत के एक बाग में सामूहिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। शाहमल के साथियों के सम्बन्धियों में से 40 व्यक्तियों को गिरफ्रतार कर लकड़ी के कोल्हू में पेर कर मारा गया। शाहमल और उसके साथियों का सफाया कराने के एवज में शौकत अली को अंग्रेजों ने पुरस्कार स्वरूप बड़ौत तहसील की मालगुजारी उगाहने का अधिकार दिया था। शाहमल के दो पोतों भगता व लीजाराम ने शाहमल की शहादत के दो साल बाद शौकत अली को उसका सिर काटकर उसकी गद्दारी का पुरस्कार दिया।

शाहमल की वीरता व पराक्रम के किस्से आज भी बड़ौत क्षेत्र के बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। लोग उन्हें सम्मान से बाबा शाहमल कहकर पुकारते हैं। बाबा शाहमल ने अपने अतुल्य शौर्य से जाटों का जो मान बढ़ाया, उसे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। किंतु यह जाटों का दुर्भाग्य है कि जाटों के इन वीरों को, जो वास्तव में भारत के इतिहास के गौरव हैं, इतिहास में आज तक उचित स्थान नहीं दिया गया है।

ज्ञातव्य है कि बाबा शाहमल से प्रेरित होकर इस क्षेत्र की कई जाट क्षत्राणियों ने भी अंग्रेजों से डटकर लोहा लिया था और उन्होंने 88 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था। सिसौली निवासी बीरो ने बिजवाड़ा गांव में उस समय 34 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था जब उन्हांने उसे बीच रास्ते घेरकर उसके साथ बदतमीजी करनी चाही थी। इस संघर्ष में हालांकि बीरो शहीद हो गयी, किंतु वह इतिहास में अपना नाम अमर कर गयी। इसी प्रकार गठवाला खाप की जाट पुत्री धर्मबीरी ने बड़ौत में अकेले दम पर 18 अंग्रेजों के सिर कलम किये थे।

Related Posts