Baba Shahmal | किसान क्रांतिकारी बाबा शाहमल तोमर

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Baba Shahmal Tomar

1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्र संग्राम एक चिंगारी था, जिसने पूरे भारत में अंग्रेजो की दासता के विरुद्द एक भयंकर आग लगा दी. और वह आग तब तक शांत नहीं हुई, जब तक 15 अगस्त को अँगरेज़ भारत छोड़कर चले नहीं गए. 1857 के स्वतंत्र संग्राम में आबाल वृद्ध, नर नारी, अमीर गरीब, सभी जातियों और समुदायों के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. वहीँ भारत के किसानों ने भी अपने नायकों के साथ कंधे से 

बाबा शाहमल का परिचय

इन्हीं जाट वीरों में से एक मेरठ जिले (वर्तमान बागपत) के गांव बिजरौल का रहने वाला नौजवान शाहमल भी था, जिसे आज आदरपूर्वक बाबा शाहमल के नाम से पुकारा जाता है। शाहमल का जन्म 21 जुलाई 1810 में हुआ था। उनके पिता का नाम अमीचंद था। अमीचंद के तीन पुत्र थे-चूडा़मल, शाहमल और मोहनलाल। शाहमल की माता का नाम धन्नो था। शाहमल के दो विवाह हुए थे। उसका पहला विवाह दांदनौर निवासी रामसुख की पुत्री राजवती से हुआ था। उनसे तीन पुत्रियां पैदा हुई थीं। पुत्र की आशा में शाहमल ने दूसरा विवाह लिब्बर हेड़ी निवासी सरजीतो से किया था।

शाहमल किशोरावस्था में ही बन गए थे क्रांतिकारी

शाहमल बहुत ही बाँके वीर नौजवान थे। वे बचपन से ही जुर्म और अत्याचार के विरुद्ध थे. अंग्रेजों के तो वे घोर शत्रु थे। जब स्वामी बिरजानन्द ने स्वाधीनता संग्राम की योजना बनाने हेतु मथुरा में देशभक्तों की एक गुप्त सभा का आयोजन किया, तो शामली से मोहर सिंह व बड़ौत से शाहमल तोमर  को भी सर्वखाप की ओर से इस सभा में आमंत्रित किया था। सभा में इन दोनों वीरों को अपने-अपने क्षेत्र में स्वाधीनता संग्राम की बागड़ोर सम्भालने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।

बाबा शाहमल ने बनाई नौजवानों की सेना

बाबा शाहमल एक छोटे से किसान थे. उनके पास किसी प्रकार का कोई हथियार या सैन्य ताकत नहीं थी, फिर भी उन्होंने  अंग्रेजों से लोहा लेने का प्रण ले लिया। उसने अपने आसपास के युवकों के सीनों में स्वाधीनता की चिंगारी भरनी शुरू कर दी। अनेकों युवक उसके विचारों से प्रभावित हो देश पर प्राण न्यौछावर करने के लिए अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए तैयार हो गये। देखते ही देखते शाहमल की एक छोटी सी सेना बन गयी। शाहमल ने अपनी भूमि बेचकर नेजे, तलवारें और बंदूकें खरीदीं और इन युवकों को हथियार चलाने की शिक्षा दी।

सभी जातियों के युवा थे शाहमल की सेना में

मेरठ में देसी सेना ने सशस्त्र विद्रोह कर दिया, तो बाबा शाहमल 800 युवकों वाली अपनी छोटी सी सेना बनाकर अंग्रेजों पर टूट पड़े थे। उनकी छोटी सी सेना में उसके सजातीय जाट भाईयों के अलावा अन्य जातियों के लोग भी शामिल थे। उसके साथियों में हिलवाड़ी के पं. रूड़ेराम, धीरा कहार, बड़का गांव के अनेक रवा राजपूत आदि शामिल थे। शाहमल अपने साथियों को लेकर अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए निकल पड़ा। उसके साहस की पराकाष्ठा देखिये कि सीमित शस्त्रों व साधनों के बल पर, मुट्ठी भर साथियों को लेकर उसने अंग्रेजों की विशाल सेना से युद्ध छेड़ दिया और उन्हें बागपत और बड़ौत से मारकर भगा दिया।

बाबा शाहमल तोमर ने अंग्रेजों को लूटकर शक्ति बढाई

उसने बड़ौत तहसील पर कब्जा कर लिया और तहसील का सारा कोष लूट लिया। उसने बागपत से होकर जाने वाले राजमार्ग को अपने कब्जे में कर अंग्रेजों को लूटना शुरू कर दिया। उसने मेरठ जाकर अंग्रेजों की संचार सेवा को ध्वस्त कर दिया। उसने अनेकों अंग्रेजों का वध किया और जहां कहीं भी अंग्रेजी राज्य का चिन्ह मिला, उसने उसे ध्वस्त कर दिया। सहारनपुर से दिल्ली तक यमुना के किनारे का क्षेत्र उसके आधिपत्य में था। उसने यमुना नदी पर बने नावों के पुल को तोड़ दिया। जिससे अंग्रेजों का इस मार्ग से आवागमन बिल्कुल अवरुद्ध हो गया। उसने अंग्रेजों पर अपने आतंक का सिक्का बैठा दिया। अंग्रेजों को लूटने से मिले धन से शाहमल ने अत्याधुनिक हथियार खरीदने शुरू कर दिये। अब उसके पास अंग्रेजों से मुकाबला करने की शक्ति संचय होने लगी थी।

10 मई को अंग्रेजों पर टूट पड़े बाबा शाहमल के लड़ाके

10 मई 1857 को मेरठ के सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। क्रांति की इस लहर के चलते भारत के वीरों की बाहें अंग्रेजों से भिड़ने के लिए मचल उठीं। विद्रोही सैनिकों में लगभग हर जाति के लोग थे। लेकिन क्रांति के लिए सबसे अधिक उतावले शाहमल के लड़ाके  थे। उनके दिलों में अंग्रेजों से लोहा लेने का जोश ठाठें मार रहा था। जिस लम्बोड़ी पलटन के 85 सैनिकों को मुंह से कारतूस तौड़ने की अवज्ञा का दोषी करार दिया था, उनमें 28 जाट थे। मेरठ, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, भरतपुर, रोहतक, गुड़गांवा, पानीपत, फरीदाबाद आदि के जाट बाहुल्य क्षेत्रों के हजारों जाट वीर सिर पर कफन बांधकर अंग्रेजों से जा भिड़े।

बाबा शाहमल बने अंग्रेजों के लिए आतंक का पर्याय

शाहमल की शक्ति इतनी बढ़ चुकी थी कि अंग्रेजी साम्राज्य उसके नाम से थर्राने लगा था। अंग्रेजी सेना शाहमल को गिरफ्रतार करने के लिए जी जान एक किये हुए थी, लेकिन शाहमल उसके हाथ नहीं आ रहा था। तब अंग्रेज सेना ने शाहमल के साथियों के गांवों-बिजरौल, सिरसली, जोहड़ी, खेड़ी, बिजवाड़ा, अट्टा और आधे रंछाड़ को बागी करार दिया और उन गांवों को जला दिया और शाहमल के परिजनों को कष्ट देना शुरू कर दिया।

विश्वासघात का शिकार हुए बाबा शाहमल

अंग्रेजी सेना ने दिल्ली पर दोबारा से अधिकार कर विद्रोह को पूरी तरह से दबा दिया। किंतु वह शाहमल को पकड़ने में सफल नहीं हो सकी थी। पूरे आठ माह तक शाहमल ने अंग्रेजी सेना को नाकों चने चबवाये। किंतु अंत में वह अपने ही देशवासी, बागपत के एक राष्ट्रदोही  शौकत अली के विश्वासघात का शिकार हो गया। उसकी सूचना पर अंग्रेजी सेना ने पूरी शक्ति के साथ उसे जंगल में एक स्थान पर जा घेरा। उस समय शाहमल के साथ लगभग 200 वीर जाट सिपाही थे। अंग्रेजी सेना से मुठभेड़ में उन सबने परम वीरता के साथ युद्ध किया। पूरे तीन दिन तक अंग्रेजी सेना और शाहमल की छोटी सी सेना में भयंकर युद्ध हुआ। शाहमल की सेना तीन दिन तक भूखी-प्यासी विशाल अंग्रेजी सेना से युद्ध करती रही।

अंग्रेजों से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए बाबा शाहमल

31 दिसम्बर 1857 के दिन, शाहमल और उसकी छोटी सी सेना के पास न कारतूस बचे थे, न खाने-पीने की सामग्री ही। इतने पर भी शाहमल और उसके साथियों ने हौसला नहीं खोया और वे खाली हाथ ही अंग्रेजी सेना से जा भिड़े। उन्हें पता था कि वे साक्षात् मौत के मुंह में जा रहे हैं, किंतु उन्हें मौत का जरा बराबर भी भय न था। वे अंग्रेजी सेना को दिखा देना चाहते थे कि जाट उस जीवट का नाम है, जिसके सामने मौत का भी अनायास आने का साहस नहीं होता। वे निहत्थे ही अपनी खाली बंदूकें लेकर अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े और जितना सम्भव हुआ शत्रुओं का सफाया कर मौत की गोद में जा सोये। शाहमल अंग्रेजों से लड़ते हुए दलदल में फंस गया था। इसका लाभ उठाकर अंग्रेजी सेना ने उसका शीश काट लिया। इस प्रकार एक परम पराक्रमी जाट योद्धा और उसकी परम साहसी सेना का अंत हो गया।

गद्दार शौकत अली का शीश काटकर बाबा शाहमल के पोतों ने लिया बदला

शाहमल को जिस देशद्रोही ने अंग्रेजी सेना के हाथों मरवाया, उस शौकत अली ने शाहमल के 30 कुटम्बियों तथा साथियों को भी पकड़वा दिया। उन सभी 30 व्यक्तियों को अंग्रेजों द्वारा बड़ौत के एक बाग में सामूहिक रूप से फांसी पर लटकाया गया। शाहमल के साथियों के सम्बन्धियों में से 40 व्यक्तियों को गिरफ्रतार कर लकड़ी के कोल्हू में पेर कर मारा गया। शाहमल और उसके साथियों का सफाया कराने के एवज में शौकत अली को अंग्रेजों ने पुरस्कार स्वरूप बड़ौत तहसील की मालगुजारी उगाहने का अधिकार दिया था। शाहमल के दो पोतों भगता व लीजाराम ने शाहमल की शहादत के दो साल बाद शौकत अली को उसका सिर काटकर उसकी गद्दारी का पुरस्कार दिया।

महिलाओं ने भी बाबा शाहमल की प्रेरणा से अंग्रेजों से युद्ध किया

बाबा शाहमल से प्रेरित होकर इस क्षेत्र की कई जाट क्षत्राणियों ने भी अंग्रेजों से डटकर लोहा लिया था और उन्होंने 88 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था। सिसौली निवासी बीरो ने बिजवाड़ा गांव में उस समय 34 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा था जब उन्हांने उसे बीच रास्ते घेरकर उसके साथ बदतमीजी करनी चाही थी। इस संघर्ष में हालांकि बीरो शहीद हो गयी, किंतु वह इतिहास में अपना नाम अमर कर गयी। इसी प्रकार गठवाला खाप की जाट पुत्री धर्मबीरी ने बड़ौत में अकेले दम पर 18 अंग्रेजों के सिर कलम किये थे।

बडौत के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है बाबा शाहमल का नाम

शाहमल की वीरता व पराक्रम के किस्से आज भी बड़ौत क्षेत्र के बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। लोग उन्हें सम्मान से बाबा शाहमल कहकर पुकारते हैं। बाबा शाहमल ने अपने अतुल्य शौर्य से जाटों का जो मान बढ़ाया, उसे इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए। किंतु यह जाटों का दुर्भाग्य है कि जाटों के इन वीरों को, जो वास्तव में भारत के इतिहास के गौरव हैं, इतिहास में आज तक उचित स्थान नहीं दिया गया है।

 

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