प्रथम स्वाधीनता संग्राम के नायक जाट वीर

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किसी भी देश अथवा जाति की संस्कृति की झलक उसके इतिहास से मिलती है। किसी देश अथवा जाति की उन्नति का आधार उसका इतिहास होता है। जिस देश-जाति के लोग अपने इतिहास को भूल जाते हैं, उस देश-जाति की संस्कृति भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है। उस देश-जाति का नैतिक पतन हो जाता है और वे अपना नैसर्गिक चरित्र और आधार खो देते हैं और उनका नैतिक पतन हो जाता है।
जाट कौम सदियों से बाहरी आक्रांताओं पर कहर बनकर टूटती रही है और स्वयं भी बर्बाद होती रही है। जब-जब भी देश पर कोई विपत्ति आयी इसने सबसे आगे बढ़ कर देश की रक्षा की है। ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं जबकि जाट कौम ने देश हित के लिए अपने हजारों-लाखों नौजवानों को हंसते-हंसते कुर्बान कर दिया।
किंतु इतिहासकारों ने जाट कौम के इतिहास को न जाने क्यों कभी भी महत्व नहीं दिया, अपितु इस कौम के इतिहास को छिपाने में ही उन्होंने अपना हित समझा। यह कौम इतिहासकारों के षड्यन्त्रों का कई बार शिकार हुई। सदा इसके गौरवशाली इतिहास को छिपाया गया। किंतु यह गर्व और सन्तोष का विषय है कि इतना होने पर भी जाट कौम ने कभी अपने देशभक्ति के जज्बे में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी।
सोने की चिड़िया लूटने के इरादे से व्यापारी के रूप में देश में घुसे अंग्रेजों ने भारत को अपने शिकंजे में कस, अपना उपनिवेश ही बना लिया। उन्होंने भारत की जनता पर नियंत्रण करने के लिए जो जुल्म ढाने शुरू किये, उनसे चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गयी। आम जन की कौन कहे, नवाब, जमींदार-जागीरदार जैसे प्रभावशाली लोग भी उनके जुल्मों से कांपने लगे। भारत की आत्मा अंग्रेजों के चंगुल से आजाद होने के लिए तड़पने लगी।
इन हालात में 19वीं शताब्दी के मध्य, देश के कई संतों जैसे-स्वामी दयानन्द, स्वामी पूर्णानन्द, संत गंगादास, स्वामी बिरजानन्द आदि ने देश को इन आतताईयों के चंगुल से आजाद कराने का बीड़ा उठाया और उन्होंने सारे देश में घुमघूमकर जनमानस में आततायी अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण तैयार किया। अन्ततः उनके प्रयास रंग लाये और 10 मई 1857 को मेरठ में एक क्रांति की ज्वाला भड़की, जो पूरे देश में धधक उठी।

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क्रांति की इस ज्वाला को चिंगारी देने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया मेरठ स्थित देसी सेना की लम्बोड़ी पलटन के 85 सैनिकों ने, जिनमें 28 सैनिक जाट थे। इन सैनिकों ने गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से ताड़ने से स्पष्ट इंकार कर, पहली बार अंग्रेजी अफसरों के विरुद्ध आदेश उल्लंघन का प्रदर्शन करने का साहस किया था।
कई सदियों से अपमान का दंश झेलता आ रहा भारतीय जनमानस अंग्रेजों के आतंक के साये से निकलने के लिए छटपटा रहा था। दूसरे भारत की आजादी के लिए संघरर्षरत साधु-संतों की वाणियों ने उनमें देश की अस्मिता को बचाने की भावना को कुछ इस प्रकार उकेरा था कि वे भारत के ‘भाग्य विधाता’ क्रूरता के प्रतिरूप, अंग्रेज अधिकारियों के गुलामी रूपी जुए को उतार फेंकने के लिए बेताब हो उठे और अपने अधिकारियों के आदेश की अवहेलना करने का साहस कर बैठे, जिनके सामने बड़े-बड़े राजा-नवाब कांपते-थर्राते थे। अंग्रेजों की दृष्टि में आदेश की अवहेलना करना अति भयानक दण्डनीय अपराध था। इस अपराध की सजा उन सैनिकों को हाथों हाथ दी गयी। उनको ‘बागी’ करार देकर उनके हथियार छीन लिये गये और उनको बुरी तरह अपमानित करते हुए, उनकी वर्दियां उतरवाकर उनका कोर्ट मार्शल कर जेल भेज दिया गया।
अंग्रेजों के आतंक से मुक्ति पाने के लिए मचलते भारतीय जवान अपने साथियों के इस अपमान से तिलमिला उठे। उन्होंने तुरन्त करो या मरो का निर्णय लिया और अपने साथी सिपाहियों को जेल से मुक्त कराने के लिए अपनी बैरकों से निकल पड़े।
इन विद्रोही सैनिकों को डरा-धमकाकर वापिस बैरकों में भेजने के लिए देसी सेनाओं में आतंक के रूप में प्रसिद्ध कैप्टेन हैनरी कैडीगन, कै. मैकेन्जो, लेफ्रटीनेन्ट मेलबिन क्लार्क, ले. डेविड रूम, ले. अलफ्र्रेड जैसे अंग्रेज अधिकारियों को भेजा गया। किंतु अपने दिलों से अंग्रेजां के आतंक के साये को उतारकर फेंक चुके देसी जवानों ने उन अधिकारियों को धमकाते हुए आड़े हाथों लिया, तो वे डरकर सिर पर पैर रखकर भाग गये। ऐसा प्रथम बार हुआ था कि भारतीय सैनिकों ने अपने अंग्रेज अधिकारियों को यूं धमकाया था। वरना तो देसी सैनिकों का इन अधिकारियों की तरफ आंख उठाकर देखने तक का साहस न होता था।
विद्रोही सैनिकों की धमकी से भयभीत होकर भागते अंग्रेज अधिकारियों को देखकर देसी सेना के सैनिकों का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। उन्हें उस दिन पहली बार अपने अस्तित्व का बोध हुआ। उस दिन पहली बार उन्हें लगा कि अंग्रेज अधिकारी, जो उन्हें सदा आतंकित किये रहते थे, कितने डरपोक और कायर हैं। उस दिन उन सैनिकों को पहली बार एहसास हुआ कि उनका भी कुछ अस्तित्व है, वे भी अंग्रेजों की तरह ही भावनाएं रखते हैं, वे भी अंग्रेजों की तरह ही हाड़-मांस के इंसान हैं और उनसे अधिक साहसी और वीर हैं।
और इस भावना ने देसी सैनिकों के दिलों में एक ऐसे अनोखे उत्साह एक ऐसी अनोखी उमंग का संचार किया, जिसकी वे कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अंग्रेज अधिकरियों के आतंक के साये में जीना उन सैनिकों की नियति बन चुका था। वे सब उन अंग्रेज अधिकरियों के बिना खरीदे गुलाम थे, जो उनकी पुतलियों के संकेतों पर जीते थे, मरते थे। वे सैनिक जो कभी अपने आकाओं की ओर आंख उठाकर भी नहीं देख पाते थे, जो उनके आदेश की अवहेलना करने की सपने में तक में नहीं सोच सकते थे, अचानक ही अपने दिलों से अपने आकाओं के आतंक का साया उतार फेंकने में कामयाब हुए, तो उन्हें पता चला कि गुलामी की जंजीरों को उतारकर फेंकना कितना आसान है। उन्होंने पहली बार स्वयं को स्वाधीन अनुभव किया, तो उन्हें लगा कि आजादी की हवा में सांस लेना कितना रोमांचकारी और सुखद एहसास है। आजादी की उस सांस ने उन्हें एहसास कराया कि वे अपने साहस और अपने बाहुबल से पूरे मुल्क को गुलामी की जंजीरों से आजाद करा अंग्रेजों को आसानी से देश से भगा सकते हैं।

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आजादी की सांस ने देसी सैनिकों के अंतस में ऐसे साहस का ऐसा संचार किया कि उनके दिलों में भारत माता को अंग्रेजों के जाल से मुक्त कराने की भावना बलवती हो उठी। इसी भावना से अभिभूत हो वे सैनिक ऐसा कल्पनातीत कार्य कर गुजरे, जिसकी कल्पना न उन्होंने की थी और न कभी अंग्रेजों ने ही की होगी।
वतनपरस्ती के जज्बे और उत्साह से लबरेज देसी सैनिकों ने मेरठ भर में मौजूद अंग्रेजों का कत्ले आम करना शुरू कर दिया। उन्होंने जेल पर हमला कर अपने सभी 85 साथी सिपाहियों को भी जेल से मुक्त करा लिया। कुछ ही देर में इन क्रांतिकारियों ने मेरठ को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। देखते ही देखते मेरठ को अंग्रेजां के कब्जे से मुक्त कराने से उत्साहित सैनिकों ने तुरंत दिल्ली कूच कर दिया।
क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर लाल किले में प्रवेश किया और बादशाह बहादुरशा जफर को भारत का स्वतंत्र सम्राट घोषित कर लाल किले पर केसरिया झण्डा लहरा दिया और नारा दिया, ‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का’ वहां मौजूद अंग्रेज अधिकारी फ्रेजर, डगलस, जेनिंग्स, हचिन्सन और जेनिंग्स को मार डाला। यही नहीं बंदीगृह में बंद 50 अंग्रेजों की भी क्रांतिकारियों ने खुले मैदान में ले जाकर इहलीला समाप्त कर दी। स्वयं को अजेय कहने वाली अंग्रेज कौम इन वीरों के सामने पस्त हो गयी। अंग्रेज अपने मुंह पर कालिख पोतकर दिल्ली से सिर पर पैर रखकर भाग गये। उन्हें छिपने का कोई ठोर दिखाई नहीं मिला। विद्रोही सैनिकों और भारत की जनता ने उन स्वयंभू ‘महाप्रभुओं’ को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और मौत के घाट उतारा। भारत की जनता ने अंग्रेजों का गरूर उतार फेंका।
अंग्रेजों को उनकी औकात बताने वालों में सबसे आगे थे उत्तरी भारत के जाट और मुसलमान। इस क्रांति युद्ध में मुसलमान केवल अपने खोये हुए मुगल साम्राज्य को वापिस पाने के लिए युद्धरत हुए थे, जबकि जाट विशुद्ध देशभक्ति की भावना से इस युद्ध में शामिल हुए थे।
दिल्ली और निकटवर्ती क्षेत्र के जाटों ने भारी संख्या में इस क्रांति में अपने प्राणों की आहुतियां दीं। दिल्ली, सहारनपुर, मुजफ्रफरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, शामली, बड़ौत, बिजनौर, बागपत, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मुरादाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, हिसार, रोहतक, हांसी, सोनीपत, पानीपत, अम्बाला आदि स्थानों पर जाटों ने परम्परागत हथियारों से ही अनगिनत अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर उत्तरी भारत के एक बड़े भूभाग को स्वतन्त्र करा लिया था। जाट अपने परम्परागत देशभक्ति के जज्बे के कारण अंग्रेजों का काल बन गये थे।
किंतु राजपूताने और पंजाब की सिख सेनाओं के सहयोग से अंग्रेज क्रांति को कुचलने में कामयाब हो गये। भारत के अनेकों युवकों की शहादत निरर्थक गयीं। मेरठ के वीर सैनिकों के जज्बे को राजपूतों और सिख राजाओं ने नहीं पहचाना। ये राजा परतन्त्रता की बेड़ियों में जीने के आदी हो चुके थे। अतः वे स्वाधीनता के मूल्य को नहीं आंक सके। उन्होंने अपने निहित स्वार्थों के चलते अंग्रेजों का साथ दिया। इसका परिणाम यह निकला कि क्रांति की वह ज्वाला जो भारत के महान संतों और मेरठ के वीर सैनिकों ने जलायी थी, थोड़ी से प्रज्वलित होते ही बुझ गयी। क्रांति की विफलता के बाद अंग्रेजों ने चौगुनी शक्ति के साथ भारतवासियों पर दमन चक्र चलाया। विद्रोह काल में वर्तमान हरियाणा के जाटों का क्रांति में सबसे अधिक योगदान रहा और विद्रोह के बाद सबसे अधिक दण्ड भी इन्हीं जाटों को दिया गया।
स्वाधीनता संग्राम में दिल्ली के आसपास के क्षेत्र के लगभग 12 हजार जाट वीरों ने अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए अपने प्राणों की आहुतियां दी थीं। इसके अलावा अंग्रेजों ने जाटों को बागी करार दे कर उनके कई गांवों जैसे हरियाणा के रोहनात, छतरियां, खैरा तथा असंध गांव को पूरी तरह से तोपों से उड़ा दिया था। उन्होंने इन गांवों में एक बच्चे तक को जीवित नहीं छोड़ा था और बड़ौत, शामली, पुरकाजी, रोहतक, करनाल, कैथल, थानेसर, पलवल, फरीदाबाद, गुड़गांव आदि स्थानों पर बागों, सड़कों के किनारे खड़े पेड़ों पर जाट वीरों को फांसी पर लटकाया और हफ्रतों तक उन शहीदों के शवों को पेड़ों से नहीं उतरने दिया।

Baba Shahmal
बाबा शाहमल

बागपत जिले के बड़ौत कस्बे के निकटवर्ती गांव बिजरौल निवासी बाबा शाहमल तथा मुजफ्फरनगर के कस्बा शामली के चौ. मोहर सिंह, ने अंग्रेजों के साथ इतना भयंकर युद्ध किया था कि अंग्रेज लम्बे समय तक पूरा प्रयास करने के बावजूद भी उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सके थे। एक मुसलमान देशद्रोही जासूस शौकत अली ने धोखे से शाहमल को मरवा दिया। शाहमल के साथियों को गिरफ्तार कर बड़ौत के एक बाग में फांसी पर लटकाया गया, तो कुछ को भारी पत्थरों से कुचलकर मार डाला गया था। इसी प्रकार मोहर सिंह व उनके साथियों को भी फांसी पर लटकाया गया। कई विद्रोही जाट वीरों को पत्थर की भारी घिरड़ी के नीचे कुचलकर मार डाला गया। अंग्रेजों ने इन शहीदों के शवों को हफ्रतों तक फांसी से उतारने की अनुमति नहीं दी थी। इसी प्रकार मुजफ्रफरनगर जिले के पुरकाजी कस्बे में 28 जाटों को भी एक बाग में फांसी पर लटकाया गया था। उन शहीदों को भी पूरे एक सप्ताह तक फांसी के फंदां से नीचे नहीं उतारने दिया गया था।
अंग्रजों से हुए युद्ध और दमन चक्र में लगभग 30 हजार जाट स्त्री-पुरुषों को मौत के घाट उतारा गया। जाटों के इस महाविनाश से पूरे हरियाणा क्षेत्र में भयानक दहशत का माहौल बन गया था। जाटों की कई हजार औरतें विधवा हो गयीं। कितनी ही मांएं निपूती हो गयीं। हजारों बच्चे अनाथ हो गये और लाखों बेघर हो गये। अंग्रेजों द्वारा गांव के गांव फूंक डाले गये। कई गांवों में तो कोई नाम लेवा तक न बचा। सबसे अधिक जन हानि वर्तमान हरियाणा को उठानी पड़ी। अंग्रेजों ने जाटों की शक्तिशाली पंचायत हरियाणा सर्वखाप पंचायत को भंग कर, पंचायत के सारे अधिकार छीन लिये। जाटों पर कई तरह के कर थोप दिये गये। कर न दे पाने की स्थिति में उनसे उनकी सम्पत्तियां छीनी जाती रहीं। बागी करार दिये जाट गांवों की चल-अचल सम्पत्तियों को दूसरे गांवों के उन लोगों को दे दिया गया, जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था।
इसका परिणाम यह हुआ कि जाट कौम आर्थिक और सामाजिक रूप से बुरी तरह से पिछड़ गयी। और फिर पिछड़ती ही चली गयी।
हरियाणा सर्वखाप पंचायत के प्रधान कार्यालय सौरम के अभिलेखागार में तत्कालीन बादशाह बहादुरशाह जफर द्वारा हरियाणा सर्वखाप पंचायत को सैन्य सहायता, खाद्य सामग्री तथा हरियाणा सर्वखाप पंचायत के वीरों की प्रशंसा आदि में लिखे 6 पत्र मौजूद हैं। इस अभिलेखागार में मौजूद एक पत्र से पता चलता है कि बादशाह जफर हरियाणा सर्वखाप पंचायत के जाट वीरों और पंचायत की कार्यप्रणाली से इस कदर प्रभावित हुए थे कि वे देश का शासन तक सर्वखाप पंचायत को सौंपने के लिए तैयार थे। (विस्तृत विवरण हेतु पढ़ें महाराजा सूरजमल टाइम्स का मई 2008 अंक)
महान दुख की बात यह है कि भारत के इतिहासकारों को जाटों की वीरता, उनका त्याग- बलिदान दिखाई नहीं देता। उन्होंने 1857 के स्वाधीनता संग्राम में जाटों के योगदान को कभी भी महत्व नहीं दिया और जाटों के योगदान और उनके बलिदान को जानबूझकर छिपा गये। जबकि वे उन राजाओं को महिमामण्डित करते रहे, जिन्होंने 1857 में न केवल अंग्रेजों का साथ देकर महान पाप कार्य ही किया, वरन् जिन्होंने अपने लाखों देसी भाईयों को मौत के मुंह में धकेला और न जाने कितने गांवों को श्मशान में बदलने में अपना योगदान दिया।
इन चापलूस इतिहासकारों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों तक को महान स्वाधीनता सेनानी और शहीद घोषित कर दिया, जिन्होंने अंग्रेजों को अपनी वफादारी प्रकट करने के लिए हस्त लिखित माफीनामे तक दिये थे।
उस महान देशभक्त बल्लभगढ़ नरेश राजा नाहर सिंह के महान बलिदान पर इतिहासकार मौन साध जाते हैं जिन्होंने अपने शौर्य के प्रदर्शन से दिल्ली को अंग्रेजों से छीना और अंग्रेजों के भारी आक्रमणों के बावजूद भी लगभग सवा तीन माह तक दिल्ली को आजाद रखा। उनके अप्रतिम शौर्य, उनकी देशभक्ति की भावना, देश के लिए बलिदान हो जाने की उनकी भावना को इतिहासकार पर्दे के पीछे करने का कुचक्र चला रहे हैं, जबकि बादशाह बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों के हाथ गिरफ्रतार कराने वाले उनके अति विश्वासपात्र दरबारी मिर्जा इलाहीबख्श के पापों को छिपाने के लिए उनके दुष्कर्म पर पर्दा डालने के उपक्रम किये जा रहे हैं।
यही नहीं इन ओछे इतिहासकारों के दुस्साहस की परकाष्ठा तो देखिये कि ये लोग पाठ्य पुस्तकों तक में जाटों को लुटेरा, विश्वासघाती और न जाने क्या-क्या कहने लगे हैं। लगभग 13 वर्ष पूर्व दूरदर्शन पर प्रसारित एक धारावाहिक नाटक ‘द ग्रेट मराठा’ में षड्यन्त्रवश जाट हृदय सम्राट महाराजा सूरजमल पर ऐसी ही तोहमत लगायी गयी थी।
आज इस ज्वलंत प्रश्न पर विचार करने का समय है कि 1857 के महा संग्राम में जाटों के द्वारा किये गये महान बलिदानों और उनके महाविनाश पर इतिहासकार मौन क्यों हैं? क्या यह जाटों के विरुद्ध कोई सोची-समझी साजिश तो नहीं है? अब प्रश्न पर भी विशेष ध्यान देने का समय आ गया है कि क्या इस साजिश में इन ओछे इतिहासकारों के साथ कुटिल राजनीति भी तो शामिल नहीं हो गयी है?
कहीं ऐसा तो नहीं है कि कुछ कुटिल राजनीतिज्ञ इस मुहिम में इतिहासकारों को अपने पक्ष में कर, उनका जाट कौम के विरुद्ध इस्तेमाल कर रहे हों। जैसा कि वर्ष 1995 में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक नाटक ‘द ग्रेट मराठा’ के माध्यम से महान जाटा योद्धा भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल के विरुद्ध एक कुटिल राजनीतिज्ञ ने अनर्गल प्रचार कराकर महाराजा सूरजमल और जाटों का भारी अपमान किया था?
देश-जाति की रक्षा के लिए मर मिटने वाला प्रत्येक व्यक्ति देश-जाति की संयुक्त धरोहर हो जाता है। क्या देश की अखण्डता, उसकी आजादी की खातिर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले जाट इतने बेगाने और नफरत योग्य हैं कि उनके बलिदानों पर पर्दा डाला जा रहा है। वे लोग कौन हैं जो महान बलिदानी राजा नाहर सिंह, बड़ौत के महान सैनानी बाबा शाहमल, शामली के जाट वीर चौ. मोहर सिंह, झाड़सा के जाट वीर चौ. गालम सिंह और बख्तावर सिंह, हरियाणा के रोहनात, छतरियां, असंध और खैरा गांव के शहीदों से वैमनस्य मान रहे हैं? क्या ये हजारों जाट वीर इस देश की अस्मत बचाने के लिए कुर्बान नहीं हुए थे? क्या उनका अंग्रेजों से कोई व्यक्तिगत विवाद था या वे अंग्रेजों की सम्पत्ति या उनका राज्य हथियाना चाहते थे?
जाट कौम के इन दीवानों को किसी सम्पति का लालच नहीं था, उन्हें किसी पुरुस्कार की दरकार नही थी, उन्हें किसी अंग्रेज से कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। वे तो केवल भारत मां को गुलामी की जंजीरों से आजाद करना चाहते थे। बस इसी भावना ने उन्हांने स्वयं को क्रांति की आग में झोंक दिया।
उन आजादी के दीवानों ने कभी यह कामना नहीं की थी कि देश की भावी पीढ़ियां उन्हें सम्मानित करें या उन्हें पुरुस्कार दें। लेकिन उन्हें यह भी आभास न था कि देश के भावी इतिहासकार उनके योगदान पर खाक डालने का षड्यन्त्र कर उनके बलिदानों की गाथाओं को न सिर्फ इतिहास के पन्नों से गायब करने की साजिश करेंंगे, वरन् उनको लुटेरा, विश्वासघाती तथा ऐसे ही दूसरे अपमानजनक शब्दों से लज्जित करेंगे।
जाट समाज के दीवानों ने न केवल 1857 के स्वाधीनता संग्राम में ही शौर्य का परचम फहराया था, अपितु उन्होंने आजादी के सभी आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। जाट वीरों ने आजादी के बाद के बाद पाकिस्तानी और चीनी आक्रमणों के दौरान जितनी शहादत जाट सैनिकों की हुई, उससे आधी भी दूसरे सैनिकों की नहीं हुई थी। इसके बावजूद भी इतिहासकार जाट वीरों के पराक्रम को नकारने का षड्यन्त्र करते आ रहे हैं।
यदि जाट कौम के साथ इतिहासकारों और क्षुद्र राजनीतिज्ञों का ऐसा ही रवैया रहा, तो जाटों के दिलों से देशभक्ति का जज्बा उठ जायेगा। वे देश पर अपनी जान कुर्बान करने के लिए सबसे आगे रहने की भावना को त्याग देंगे। यदि ऐसा हुआ, तो देश को भारी क्षति उठानी पड़ेगी। क्योंकि यह निर्विवाद सत्य है कि जाट कौम ही वह वीर कौम है जो देश की आजादी के लिए हुए हर संघर्ष में सबसे आगे रहती आयी है। यदि जाटों के दिलों से देशभक्ति की भावना उठ गयी, तो तय है कि भारत फिर किसी कारगिल जैसे युद्ध में विजेता की भावना से गर्वित न हो सकेगा। भारत फिर सन् 1971 जैसे भारत-पाक युद्ध में विजेता की पदवी न पा सकेगा, फिर कोई कभी अहमदशाह अब्दाली और महमूद गजनवी जैसे दुर्दांत लुटेरों का मान मर्दन नहीं कर सकेगा।
यदि वोट हथियाने के लिए यूं ही ओछे हथकण्डे आजमाये जाते रहे, तो एक दिन पूरी जाट कौम इन ओछे राजनीतिज्ञों और इतिहासकारों से अपने अपमान का बदला लेने के लिए उठ खड़ी होगी। और शायद उस दिन ये ओछे इतिहासकार और राजनीतिज्ञ जाट कौम की वीरता को आंक पायेंगे। लेकिन डर यह है कि तब तक इतनी देर न हो जाए, कि हालात काबू से बाहर ही हो जाएं।

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