विश्व प्रसिद्ध जाट शौर्य | जाट योद्धाओं का इतिहास

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जाट योद्धाओं का इतिहास

आज देश ने भले ही जाट योद्धाओं का इतिहास भुला दिया है. लेकिन यह सर्वमान्य सत्य है कि जाट जाति अत्यंत ही शौर्यवान, देशप्रेमी, स्वावलम्बी, कर्मशील, परिश्रमी, जुझारू, शौर्यवान, दयालु एवं स्वाभिमानी जाति है। भारत का इतिहास बताता है कि जाट जाति ने अपने भुजबल से सभी विदेशी आक्रांताओं से डटकर लोहा लिया। यद्यपि उनका कोई संगठित प्रांत अथवा साम्राज्य न था। उनके पास कोई किला न था। फिर भी उन्होंने केवल छोटे-छोटे कबीलों को मिलाकर ही इन आक्रांताओं को देश से बाहर निकालने में अग्रणी भूमिका निभायी।आइये जाटों की विश्व प्रसिद्ध शौर्य गाथा के बारे में जानते हैं.

हूणों का खात्मा किया जाटों ने 

जाटों की शूरवीरता का प्रमाण सबसे पहले हमें पांचवी सदी में मिलता है। गुप्त साम्राज्य के अंतिम चरण में बर्बर हूणों ने भारतवर्ष पर कई बार विशाल आक्रमण किये थे। उन्होंने भारत में अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना की। इतिहासकार चंद्रगोमिन कृत व्याकरण में ‘अजेय जर्टो हूर्णान’ के अनुसार पांचवीं सदी में भारत की पश्चिमी सीमाओं पर जाट आबाद थे। जाटों ने विदेशी हमलार हूणों को अपने बाहूबल से अनेकों बार परास्त किया और उन्हें लूटकर भगा दिया था। इतिहासकारों का कहना है कि संभव है कि जाटों ने हूणों को अपनी जाति में मिला लिया हो। जिससे उनका वंशबीज ही समाप्त हो गया हो।

जाट नायक साहसीराय शौर्य

प्रसिद्ध चीनी इतिहासकार और सैलानी ह्नेन सांग ने भी अपने यात्रा वृतांतों में जाट योद्धाओं का इतिहास, जाट जाति के शौर्य और उसकी क्षमताओं के विषय में विस्तार से लिखा है। सम्राट दाहिर के समकालीन अरब इतिहासकारों द्वारा लिखित इतिहास से भी जाटों के शौर्य का पता चलता है। अरब इतिहासकारों के अनुसार सन् 712 ई. में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध के अंतिम दाहिर सम्राट साहसीराय के विरुद्ध युद्ध अभियान छेड़ने के निमित्त मिहरान (सिंध नदी) की ओर कूच किया था। उसके साथ चार हजार जाटों की एक शक्तिशाली टुकड़ी भी थी। दूसरी ओर साहसीराय के साथ भी एक विशाल जाट सेना थी। युद्ध क्षेत्र में जाने से पहले ही मुहम्मद बिन कासिम और साहसीराय में शांति समझौता हो गया। मुहम्म्द बिन कासिम ने कर वसूलने के साथ जाट वीरों की वीरता से प्रभावित होकर साहसीराय से कर के रूप में चार हजार जाटों की एक सैनिक टुकड़ी ली थी जिसे उसने सादुसान नगर में बसाया और उन्हें इस नगर की रक्षा का भार सौंपा। इतिहास पुस्तक नुब्हतुल मुस्ताक के लेखक अल इदरीसी के अनुसार जाटों ने इस नगर में अनेकों नहरों तथा जलाशयों का निर्माण कर इस नगर के आसपास की खेती योग्य भूमि को अत्यंत ही उपजाऊ बनाने में अपना महती योगदान दिया।

सिंध प्रान्त पर जाटों का कब्ज़ा 

सिंध प्रांत पर अरबों का शासन बना रहा। किंतु यहां के राज्यपाल सूबेदार तथा विजेता सरदारों के व्यक्तिगत मतभेदों के कारण खलीफा की शक्ति को 812 ई. में उस समय गहरा धक्का लगा जब सिंध प्रांत के शासकों ने स्वयं को स्वतंत्र कहना आरम्भ कर दिया। इस समय कैंकन (वर्तमान किलात) और समीपवर्ती भूखण्डों पर जाटों का स्वतंत्र राज्य स्थापित हो चुका था। जाट सिपाहियों ने अरल नदी (सक्सर के पास) के आसपास तक के क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था। इन जाट सैनिकों का सेनापति समलू नामक जाट सरदार था। कैंकन के जाट लूटमार करके शक्ति संचय कर रहे थे। अतः खलीफा अल मुत्सिम ने जाटों को दबाने का निश्चय किया और उसने 834 ई. में अजीफ बिन ईसा के नेतृत्व में विशाल सेना रवाना की। जाट सैनिकों ने हजारा की सड़क को घेरकर पड़ोसी जिलों तक अपना घेरा बढ़ा दिया। उन्होंने कासगर के किले और शहर के संचित अन्न भंडारों को लूट लिया।
समस्त जिलों में बुरी तरह से भय व्याप्त हो गया। तत्पश्चात जाट मरुभूमि के चारों ओर बिना किसी विशेष अवरोध के अपनी सैनिक चैकियां स्थापित करने में सफल हो गये।

जाटों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सबक सिखाया 

भारत के अंतिम सम्राट पृथ्वीराज की पराजय के बाद जाटों ने सन् 1192 में सुलतान कुतुबुद्दीन एबक के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजाया था। उन्होंने देश की मान मर्यादा की रक्षा के लिए कभी अपने प्राणों का मोह नहीं किया। जाटों ने इसी प्रकार सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक को भी नाकों चने चबाये थे।

मुहम्मद बिन कासिम से जाटों ने लोहा लिया 

सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक ने जानबूझकर हिंदू किसानों पर जब अनावश्यक कर बढ़ा दिये, तो जाटों ने ही उसकी इस नीति का जमकर विरोध किया था और सैनिक संघों का गठन कर सुलतान के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया था। यद्यपि सुलतान की विशाल सेना के सामने जाट कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सके, लेकिन इसके बावजूद भी उनका हौंसला नहीं टूटा और वे निरंतर कई वर्षों तक सुलतान की सेना के साथ छद्म युद्ध करते रहे और सुल्तान की सेना को छकाते रहे।

बाबर से जाटों की हुई टक्कर

मुगलिया सल्तनत के संस्थापक बाबर को भी जाटों से कई बार टक्कर लेनी पड़ी थी। बाबर को इन जाटों ने इस बुरी तरह से छकाया था कि उसे जाटों का सफाया करने के लिए भारी सेना भेजनी पड़ी थी। दिसम्बर 29, सन् 1525 ई. को लिखे बाबरनामा में वह अपने संस्मरण में लिखता है-‘यदि कोई हिंदोस्तान जाए, तो उसे असंख्य घुमक्कड़ जत्थों के रूप में जाट और गूजर पहाड़ी तथा मैदानी भागों में बैल और भैंस लूटने के लिए भीड़ के रूप में इकट्ठे मिलेंगे। वे अभागे बड़े ही मूर्ख और निष्ठुर होते हैं।…’

शेरशाह सूरी को भी चुनौती दी जाटों ने 

जब शेर शाह सूरी गद्दीनशीन हुआ, तो उसके क्षेत्र के जाटों ने विद्रोह कर, कई जगह अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया और स्वयं ही लगान आदि संग्रह करने लगे। उन्होंने शेरशाह सूरी के खजानों को लूट लिया और अपनी स्थिति काफी सुदृढ़ कर ली। शेरशाह ने भारी सैन्य दल भेजकर इन जाटों को दबाने का प्रयास किया। हिंदु जाट सरदार सीड़ू के नेतृत्व में जाटों ने शेरशाह की सेना से जबर्दस्त टक्कर ली। जाटों और शाही सेना में भयंकर युद्ध हुआ। जाट सरदार अपने परिवारों को बलिदान कर स्वयं हथियार लेकर अपने प्राण हथेली पर रखकर आर-पार की जंग करने के लिए शत्रु की सेना पर टूट पड़ेे। शेरशाह सूरी की भारी शाही सेना के सामने इन कुछ सौ वीरों की कोई गिनती न थी, किंतु उन्होंने अपने शत्रुओं को भरसक गाजर मूली कर तरह काट डाला और फिर स्वयं भी आजादी की बलिवेदी पर शहीद हो गये।

 

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