राजाराम जाट जिन्होंने मुग़लों के विरुद्ध हिन्दू समाज को एकत्र किया

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महान योद्धा राजराम जाट (Rajaram Jat) सिनसिनवार के सरदार थे। वे वीर भज्जा जाट के पुत्र थे। गोकुला की मृत्यु के पश्चात ब्रज प्रदेश के वीर किसानों का सामूहिक आन्दोलन शान्त हो गया, किन्तु उसके बलिदान ने नवीन क्रान्ति का पौधा लगाया। उस समय जाट शक्ति का ध्रुवीकरण राष्ट्रीय या सैद्धान्तिक नहीं था, अपितु सामंतीय और धार्मिक था। परम्परा से लोकतंत्रीय किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र जाट नेता अपनी शक्ति राजदरबारों से नहीं अपितु ग्रामीण क्षेत्र से प्राप्त करते रहे। वे किसी संगठन विशेष से नहीं, अपितु एक विशेष मनोदशा की उपज थे।

मथुरा में मुस्लिम शासकों के अत्याचार

तिलपत के युद्ध के बाद फौजदार हसनअली खाँ क्रान्तिकारियों के गाँवों को घेर कर विद्रोह जाल को समाप्त करने में व्यस्त रहा। आलमगीर ने 27 जनवरी 1670 को आज्ञा दी कि मथुरा के देहरा केशोराय जी के मन्दिर को गिराकर उसके खण्डहरों पर एक विशाल मस्जिद बनवा दी जाये। हसन अली ने इस राजाज्ञा का अक्षरशः पालन किया। साथ ही उसने मथुरा की संस्कृत तथा हिन्दी भाषा भाषी पाठशालाओं को भी गिराया और मथुरा का नाम इस्लामाबाद रखा। इसी वर्ष गोवर्धन पर्वत पर बने मन्दिर को गिराने का उसको आदेश मिला। गोस्वामी दामोदर भगवान कृष्ण की प्रतिमा को लेकर तिहाड़ नामक गाँव में चले गये और उसे नाथद्वारा (उदयपुर) जाकर प्रतिस्थापित किया।
औरंगजेब की कठोरता के कारण दोआब परगनों के जाट पालों की एकजुटता और संघर्ष की शक्ति जैसे बिखर गयी। परन्तु कुछ काल पश्चात जाटों में पुनः जोश का संचार हुआ और जाटों के संगठन फिर पुनर्जीवित होने लगे। इस बार जाट संगठनों ने औरंगजेब की आक्रामक नीति जजिया कर की घोषणा का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए खम ठोंक लिये थे।
13 फरवरी 1670 ई. के दिन आलमगीर ने थानेदार हसन अली खाँ को 500 सवारों का इजाफा कर उसे नक्कारा प्रदान किया। उसके पेशकार शेख राजउद्दीन भागलपुरी को भी एक सदी का मनसब, अमीरी तथा खानी का दर्जा दिया गया। मार्च के महीने में हसन अली खाँ क्रान्तिकारियों को दबाने, बन्दी बनाने, मजबूत गढ़ियों को तोड़ने, घरों को लूटने तथा उनके परिवारों को गाँवों से निकालने में सक्रिय रहा। उसने हिन्दू जमीदारों को बेदखल करके बन्दी बनाया और शाह मोहम्मद नवाज, सीदन बलूच, पेशकार शेख राजउद्दीन, लाल मुहम्मद तथा नजर मुहम्मद आदि को विभिन्न गाँवोंं की जमींदारी देकर जमाया। उनके साथ में सिपाही दल तैनात किये। इस कठोर नियन्त्रण से ब्रज मण्डल में व्याप्त अराजकता का अन्त हो गया। 6 मई को हसन अली खाँ आगरा दरबार में उपस्थित हुआ, जहाँ सम्राट ने उसे शाबासी दी और डंका देकर सम्मानित किया।

राजाराम जाट का उदय

आलमगीर की सजगता, फौजी प्रबन्ध तथा निष्ठुरता के कारण दुआब परगनों के जाट पालों की एकता कुछ वर्षों के लिए पुनः कुण्ठित हो गयी, परन्तु इसके शीघ्र बाद ही यमुना नदी का पश्चिमी भूखण्ड (काथेड़ जनपद) क्रान्तिकारी संगठन से निनादित हो उठा। इस भूखण्ड में आबाद सिनसिनवार, सोगरिया, कुन्तल (खूँटेल) तथा चाहर डूँगों के नवयुवक संगठित होकर साहसी सैनिक बन गये, जिनका नेतृत्व भज्जा के सुयोग्य पुत्र राजाराम जाट ने सम्भाला। मथुरा तथा अकबराबाद (आगरा) में चौबीस महीने तक रुकने के बाद आलमगीर स्वयं दिल्ली वापिस चला गया, लेकिन जाट भूखण्ड में एक दशाब्दी तक शान्ति नहीं रह सकी।
पृथ्वीराज (गोकुला का चचेरा भाई) के पौत्र खानचंद ने उत्तराधिकार में सिनसिनी गाँव की सरदारी सम्भाली। खानचंद एक साहसी, वीर तथा योग्य सरदार था। उसने अपनी तलवार के बल पर सिनसिनी तथा उसके आस-पास आबाद अनेकों नगलों तथा गाँवों की जमींदारी प्राप्त कर ली थी। खानचंद के जैन खाँ, जूझा, ब्रजराज तथा भज्जा नामक चार पुत्र थे। जैन खाँ तथा उसकी संतानें नगला जाटौली, गांगरोजी में जाकर बसीं और यह वंश गढ़वालिया कहलाने लगा, जबकि जूझा की सन्तानों ने सिकरौदा, हींगोली, सौंख गूजर (परगना कठूमर) गाँवों में जमींदारियां उपार्जित कीं। ब्रजराज तथा भज्जा ने सिनसिनी ग्राम की जमींदारी प्राप्त की। दोनों भ्राता अति उदार और दानवीर थे। पारिवारिक सद्भावना, प्रेम तथा एकता ने उनको प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। एक मजेदार कहानी सिनसिनवारों के आख्यान का अंग बन गयी है। ब्रजराज और भज्जा दोनों के पास मिलाकर एक जोड़ी बैल थे। उनके घर घास-फूस का एक छप्पर पड़ा हुआ था। एक दिन एक भट्ट भिक्षुक उनके द्वार पर आ गया, तो दोनां भाईयों ने उसे प्यार से खाना खिलाया और उसकी खूब आवभगत की।
जब वह भिक्षुक जाने लगा तो भज्जासिहं उससे बोला, हम दक्षिणा दिये बगैर आपको नहीं जाने देंगे। यह हमारे धर्म के विरुद्ध है। हमारे पास देने के लिए और तो कुछ नहीं है, बैलों का ये जोड़ा ही है। आप दक्षिणा के रूप में इसको स्वीकार करें।
भज्जा के इन वचनों को सुनकर वह भिक्षुक बहुत प्रसन्न हुआ और उसने दोनों भाईयों को आशीर्वाद प्रदान किया। उस दिन से भज्जा तथा ब्रजराज का भाग्य चमकने लगा। ब्रजराज तथा भज्जा ने दो हजार सवारों की तथा भज्जा ने अपने निकटतम रिश्तेदारों से संयुक्त एक हजार सवारों की धार (टुकड़ी) तैयार की और सिनसिनवार डूँग को इस योग्य बनाया कि वह अपने स्वाधीन भविष्य तथा भाग्य का निर्माण कर सकें। यद्यपि दोनों भाई अधिक प्रभावशाली, गुरिल्ला जीवन के अभ्यस्त सरदार, लुटेरे अथवा योद्धा नहीं थे, फिर भी उनमें संगठन की क्षमता और स्वाधीनता की भावना थी, जिसका नेतृत्व बाद में भज्जा के साहसी पुत्र राजाराम ने सम्भाला। ब्रजराज, भज्जा तथा उसके पुत्र राजाराम ने परिस्थितियों से बाध्य होकर सिनसिनवार डूँग को अपनी पैतृक भूमियों पर संगठित किया और एक सफल सरदार के रूप में अकबराबाद सरकार में क्रांति की ज्वाला जलायी। अल्पकाल में राजाराम अपनी बन्धुत्व एकता के कारण प्रसिद्ध हो गया।
सिनसिनी की गढ़ी तथा आसपास के गाँव पूर्व में 4 मील दूर स्थित अऊ नामक परगने के अन्तर्गत थे। आईने अकबरी के अनुसार अऊ परगने में 1,53,377 बीघा 9 बिस्वा भूमि का रकबा शामिल था, जिससे 1,37,738 रुपया वार्षिक राजस्व मिलता था। परन्तु शाहजहाँ के शासन काल में भू-राजस्व में की गयी अतिवृद्धि के कारण अनुमानतः इस परगने का वार्षिक भू-राजस्व 2.8 लाख रुपया था। इसके अलावा 2038 रुपये की पुण्यार्थ जागीरें शामिल थीं। अऊ आमिल के नेतृत्व में गढ़ी तथा मुहाल (परगने) की सुरक्षा तथा भू-राजस्व वसूल करने के लिए जमींदारों की कमान में एक सहस्र अश्वारोही और एक सहस्र बन्दूकची, तीरन्दाज पैदल तैनात थे। इसके अतिरिक्त औरंगजेब ने जाट क्रांतिकारियों के दमन के लिए अऊ में एक थाना स्थापित कर दिया था। थानेदार के पास अतिरिक्त सिपाही थे।
ब्रजराज और भज्जा धर्मनिष्ठ सरदार थे। अन्य समीपस्थ गाँवों के मजदूर-किसान अऊ की गढ़ी में घोड़ा, ऊँट तथा खच्चरों के लिए नियमित दाना और घास पहुँचाते थे। रैयत तथा आमिल में किसी भी प्रकार का मनोमालिन्य नहीं था। फिर भी अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए राजा राम को इस बात की आवश्यकता थी कि साम्राज्य की सेनाओं पर कोई ऐसी बड़ी चढ़ायी या मुठभेड़ की जाये, जो देखने लायक हो। शीघ्र ही एक ऐसा अवसर राजाराम के हाथ आ गया।
जनश्रुति के अनुसार अऊ के थानेदार का नाम लालबेग था। यह अति कपटी, दुराचारी तथा लम्पट अधिकारी था और सैनिक बल से भारतीय परिवारों की ललनाओं का अपहरण करता रहता था। कहा जाता है कि एक अहीर अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ जा रहा था। दोपहर की तेज धूप के कारण वह अऊ कस्बे के समीप कुँआ तथा छायादार वृक्षों के नीचे भोजन तथा विश्राम के लिए रुका। उसी समय लालबेग खाँ थानेदार का एक भिश्ती कुएं पर पानी भर रहा था। वह उस स्त्री के रूप-लावण्य को देखकर चकित रह गया। उसने लालबेग खां को इसकी सूचना दी। थानेदार ने शीघ्र ही कुछ सिपाही भेजकर दम्पत्ति को बन्दी बनाकर मंगवा लिया और पति को जबरन बन्दीखाने में डालकर यातनाएं दीं।
जब यह समाचार भज्जा तथा उसके पुत्र राजाराम तक पहुँचा, उन्होंने भारतीय सतीत्व की रक्षा करने का संकल्प कर लिया। कार्तिक का महीना था। पूर्णिमा के दिन गोवर्धन में भारतीय परम्परा के अनुसार एक विशाल सांस्कृतिक पर्व मनाया जाता था। समीपस्थ गाँवों के सरदारों से मिलकर भज्जा तथा राजाराम ने निश्चय किया कि गोवर्धन मेले की आड़ में अऊ थानेदार की अनुमति लेकर गढ़ी के चारों ओर घास की पुँजें एकत्रित करदी जावें। शीघ्र ही गढ़ी के चारों ओर घास का पहाड़ लग गया। इन गट्ठरों के साथ राजाराम के कई नवयुवक सैनिक हथियार छिपाकर गढ़ी में चले गये। एक ओर से घास में आग लगा दी गयी। इससे आमिल, थानेदार तथा उसके सिपाहियों में भगदड़ मच गयी। राजाराम के साथी मुगल सैनिकों पर टूट पड़े और अनेक मुगलिया सैनिक खेत रहे। थानेदार लालबेग खाँ को घेरकर मार डाला गया। इस प्रकार राजाराम ने प्रथम बार अऊ पर आक्रमण करके ख्याति उपलब्ध की। उसकी धाक आस-पास के परगनों में द्रुतगति से फैल गयी।
आधुनिक भरतपुर शहर के उत्तर-पश्चिम में चार मील भयंकर जंगल तथा बाणगंगा और गम्भीर नदी के संगम से कुछ दूर खादरों से लगी सोगर नामक कच्ची मिट्टी की एक साधारण गढ़ी सोगरवार जाटों का प्रमुख स्थान था। सोगरिया जाटों ने भी अनेकों गाँवों की जमीदारियां प्राप्त कर ली थीं और ओल तथा हेलक परगने में अपना प्रभुत्व तथा प्रभाव बढ़ाया था। ये लोग भी लड़ाकू तथा लूटमार करने में निपुण थे। इन जाटों का नेतृत्व उस समय रामकी चाहर नाम नवयुवक ने सम्भाल रखा था और सोगर तथा आस-पास के कई गाँवों को गढ़ियों से सुरक्षित किया हुआ था। राजाराम ने सर्वप्रथम रामकी चाहर से मित्रता की। रामकी चाहर ने जीवन भर राजाराम का साथ दिया और उसकी कमान में उसकी सभी आज्ञाओं का पालन किया। इस एकता ने पश्चिम तटवर्ती (काठेड़) जाट शक्ति को एक माला में पिरो दिया। जाट किसान नवयुवकों ने अपने बुजुर्गों के आदेश पर जाट जमींदार सरदारों के नेतृत्व में स्वाधीनता की विजय पताका फहरायी और साम्राज्य की महान शक्ति को चुनौती दी। प्रत्येक जमींदार हलधर किसान अपने परिवार तथा तलवार की शक्ति संचय करने में लग गया।
गोकुला जाट के बलिदान के बाद आगरा सूबे के सूबेदारों का जल्दी-जल्दी स्थानान्तरण होने लगा था। मई 1672 ई. में नामदार खाँ को हटाकर सरबुलन्द खाँ और अक्टूबर 9, 1672 के दिन हिम्मत खाँ को सूबेदार नियुक्त किया गया। जाट आन्दोलन सम्राट की अस्थिर नीति का परिणाम था और वह आन्दोलन की जड़ों को उखाड़ने के लिए आगरा सूबे में स्थाई मुगल सेना रखने में असमर्थ था। अतः सूबेदार हिम्मत खाँ के कहने पर औरंगजेब ने जाटों को दबाने के लिए कड़ाई की अपेक्षा नम्रता का सहारा लिया। राजाराम ने सिनसिनी को छोड़कर परगना कठूमर में जाटौली थून नामक गाँव की जमींदारी सम्भाली और कुछ समय में ही उसने जाटौली थून में रहकर 40 गाँवों की जमींदारी प्राप्त की। इस प्रकार राजाराम अपरोक्ष रूप से इन गाँवों का शक्ति सम्पन्न सरदार हो गया था। सम्राट ने राजाराम को वफादारी जाहिर करने के लिए दिल्ली आमन्त्रित किया। एम. एफ. ओडायर का कहना है कि मुगल दरबार में उपस्थित होने से पूर्व राजाराम ने सिसिनवार डूँग तथा विभिन्न पालों की एक पंचायत की। बुजुर्ग सरदार जमींदार तथा चौधरियों ने एक स्वर में सम्राट के आमन्त्रण को स्वीकार कर लिया औरंगजेब द्वारा राजाराम का दिल्ली में सत्कार किया गया और लूटमार बन्द करने के आश्वासन पर उसे मथुरा की गद्दी तथा 575 गाँवों की जागीर दी गयी। राजाराम ने इस जागीर से सामयिक लाभ उठाया और यह जागीर जाटों के लिए वरदान और मुगल साम्राज्य के लिए काँटों का ताज साबित हुई। राजाराम ने नियमित बन्दूकची सवार की शर्त पर इनाम के रूप में अपने भाई-बन्धु तथा अन्य किसानों में इन गाँवों की धरती को बाँट दिया। भरतपुर राज्य की पट्टा प्रणाली अथवा सैनिक जागीर के विकास का यह प्रथम चरण था। इससे राजाराम तथा परवर्ती सिनसिनवार सरदारों को मात्र सम्मान ही नहीं मिला, अपितु उनको सैनिक शक्ति भी प्राप्त हुई, जिससे क्रान्ति, विकास तथा स्वाधीनता की परम्परा का मार्ग खुल गया।
‘सैनिक सेवावृत्ति’ के कारण राजाराम को स्थाई बन्दूकची तथा सवार सेना रखने का अधिकार मिला। अन्य जाट सरदार तथा कुन्तल (खूँटेल) आगरा, धौलपुर, फतेहपुर सीकरी के जाट पाल सिनसिनवारों के साथ मिलकर एक संगठन में आबद्ध हो गये। राजाराम और रामकी चाहर ने अल्हड़ जाट नवयुवकों की एक नियमित सेना तैयार की और उनके हाथों में आग्नेय अस्त्र, बन्दूक आदि देकर उन्हें पूरा सिपाही बनाया। इनको गुरिल्ला युद्ध एवं दलनायक की आज्ञा में रहने की शिक्षा-दीक्षा दी। कुछ समय में ही उसके नेतृत्व में लगभग 20000 नवयुवक आकर एकत्रित हो गये। जाट अभियान छापामार प्रणाली तथा हिस्सेदारी पर आधारित था। इस प्रणाली के अनुसार पराजय के बाद सैनिकों को अपने अधिनायक की कमान में पुनः लौट आने का आदेश दिया जाता था। मुगल परगनों की लूट के माल असबाब तथा युद्ध सज्जा को सुरक्षित रखने के लिए उसने मार्गहीन बीहड़ जंगलों के बीच में स्थान-स्थान पर अनेकों छोटी-छोटी गढ़ियों का निर्माण कार्य शुरू हुआ और मुगल तोपखाने की पंक्ति से बचाने के लिए स्थायी प्रबन्ध किये। धीरे-धीरे सिनसिनी, पैंघोर, सोघर, सौंख, अवार, पींगोरा, इन्दौली, इकरन, अधापुर, अडीग, अछनेरा, गूजर-सौंख आदि अनेकों ग्राम एवं गढ़ियां इस क्रान्ति के प्रमुख गढ़ बन गयीं।
1681 ई. में आगरा के समीप ग्रामीण किसानों ने रबी की फसल कट जाने के बाद लगान रोककर मुगल साम्राज्य का शक्तिशाली विरोध किया। आलमगीर ने मीर अबुदुल्हादी असालत खाँ के पुत्र इब्राहीम हुसैन को ढाई हजारी जात का मनसब तथा मुल्तफत खाँ की उपाधि देकर गाजीपुर का फौजदार नियुक्त किया। किन्तु ‘राजभक्ति की भावना’ के प्रति सन्देह होते ही उसको आगरा परगने की फौजदारी दी गयी और उसकी कमान में किसानों से लगान वसूल करने के लिए शाही सेना रवाना की। मुल्तफत खाँ स्वयं योग्य सैनिक अथवा सेनानायक नहीं था। वह शान्ति वार्ता करके किसान विद्रोह अग्नि को दबाना चाहता था।
मुल्तफत खां ने जून 1681 ई. में एक विद्रोही गाँव की घेराबन्दी की और गाँव के एक प्रभावशाली मुखिया को अपनी छावनी में बुलाकर लगान अदा करने के लिए फुसलाया। मुखिया ने शान्तिपूर्वक लगान अदायगी की अपेक्षा स्वाधीनता की वेदी पर प्राण न्यौछावर करना श्रेयस्कर समझा। उसने नवयुवक ग्रामीण किसानों को अपने पूर्वजों की शान तथा जातीय सम्मान की रक्षा के लिए ललकारा। गाँव के समस्त निवासी गाँव को छोड़कर बाहर आ गये। उन्हांंने अदम्य उत्साह, साहस तथा लगन के साथ शाही सेना का मुकाबला किया तथा उसे बुरी तरह कुचल कर खदेड़ दिया।
किसान सैनिक फौजदार मुल्तफत खाँ को बन्दी बनाकर अपनी गढ़ी में ले गये। उसकी जूतियों से अच्छी तरह पिटाई की गयी और अन्त में सैनिक की अपेक्षा हिजड़ा समझकर छोड़ दिया। जब यह समाचार आलमगीर के पास पहुँचा, उसने मुल्तफत खाँ के पास ‘जहर की पुड़िया’ भेजी। मुल्तफत खाँ ने निराश होकर जुलाई 1681 ई. को जहर खा लिया।
सम्राट औरंगजेब के गद्दी पर आसीन होने के इक्कीस वर्ष बाद तक हिन्दुस्तान क्षेत्रीय क्रान्तियों में बुरी तरह फंसा रहा। महाराष्ट्र केसरी शिवाजी की मृत्यु के बाद स्वाधीन मराठों के शासन की बागडोर उनके पुत्र शम्भाजी ने सम्भाली। 1679 ई. में आलमगीर ने दिल्ली से राजपूताना की ओर कूच किया और दो वर्ष बाद वह दक्षिण भारत के अभियानों पर काबू पाने के लिए चल दिया। उसने शासन के पिछले पच्चीस वर्ष दक्षिण में व्यतीत किये थे। इस काल में हिन्दुस्तान(उत्तर भारत) प्रकट उत्तराधिकारी, नायब या सैनिक सत्ताहीन था और इस क्षेत्र में शाही सेना की पराजय, मराठों की विजय, शहजादा अकबर के विद्रोही होने के समाचार आते रहे और पड़ौस में पहुँचकर अतिरंजित होकर फैलने लगे। मुगल प्रशासन का सम्पूर्ण खजाना, उत्तर भारत के अनुभवी सैनिक अथवा नवीन भरती को दक्षिण की सूखी पहाड़ियों पर छितराया गया, लेकिन उसको सूखी पहाड़ी, स्वराज्य तथा स्वाधीनता प्रेमी मराठों पर विजय नहीं मिल सकी। हिन्दुस्तान के सम्पन्न सूबों का प्रशासन छोटे तथा सामान्य अनुभवहीन सूबेदारों तथा फौजदारों के हाथों में था। उनके पास न यथेष्ठ धन था और न प्रशासन की व्यवस्था तथा साम्राज्य की स्थिरता के योग्य सैनिक शक्ति ही थी। आलसी सूबेदारों तथा फौजदारों ने अपने सिर पर आनन्दरूपी साफा बांध लिया और पैरों में निरुत्साह की मेहंदी लगा ली। वह आमोद-प्रमोद, भ्रष्टाचार तथा व्यक्तिगत लाभ के लिए के लिए शाही खजाने की लूट के लिए सक्रिय हो गये। सूबों की शासन व्यवस्था पर आवश्यक धनराशि खर्च नहीं हो सकी। उससे सुरक्षा तथा शान्ति व्यवस्था के समुचित प्रबन्ध के लिए वांछित सिपाहियों का अभाव रहने लगा।
आलमगीर की क्रूरता, आतंक, कट्टर राज्यनीति विशाल साम्राज्य की स्थिरता के लिए पर्याप्त नहीं थी। फलतः ब्रज मण्डल के जमींदारों, जागीरदारों ने एक बार पुनः स्वराज्य आन्दोलन छेड़ दिया।

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