राजाराम जाट का इतिहास | राजाराम जाट जिन्होंने अकबर की हड्डियों को जला दिया

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राजाराम जाट का इतिहास जाट समाज की नयी पीढ़ी के लिए धरोहर है. राजाराम जाट का सम्पूर्ण जीवन एक प्रेरणा देता है. राजाराम जाट ने अपने देश और संस्कृती को बचाने के लिए मुग़ल शासक औरंगजेब से लोहा लिया. एक समय औरंगजेब भी राजाराम जाट के सामने झुक गया और उसको राजाराम जाट से समझौता करना पड़ा

राजाराम जाट का उदय

गोकुला जाट की मृत्यु के पश्चात ब्रज प्रदेश के वीर किसानों का सामूहिक आन्दोलन शान्त हो गया, किन्तु उसके बलिदान ने नवीन क्रान्ति का पौधा लगाया। उस समय जाट शक्ति का ध्रुवीकरण राष्ट्रीय या सैद्धान्तिक नहीं था, अपितु सामंतीय और धार्मिक था। परम्परा से लोकतंत्रीय किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र जाट नेता अपनी शक्ति राजदरबारों से नहीं अपितु ग्रामीण क्षेत्र से प्राप्त करते रहे। वे किसी संगठन विशेष से नहीं, अपितु एक विशेष मनोदशा की उपज थे। औरंगजेब की कठोरता के कारण दोआब परगनों के जाट पालों की एकजुटता और संघर्ष की शक्ति जैसे बिखर गयी। परन्तु कुछ काल पश्चात जाटों में पुनः जोश का संचार हुआ और जाटों के संगठन फिर पुनर्जीवित होने लगे। इस बार जाट संगठनों ने औरंगजेब की आक्रामक नीति जजिया कर की घोषणा का मुँहतोड़ जवाब देने के लिए खम ठोंक लिये थे। शीघ्र ही यमुना नदी का पश्चिमी भूखण्ड (काथेड़ जनपद) क्रान्तिकारी संगठन से निनादित हो उठा। इस भूखण्ड में आबाद सिनसिनवार, सोगरिया, कुन्तल (खूँटेल) तथा चाहर डूँगों के नवयुवक संगठित होकर साहसी सैनिक बन गये, जिनका नेतृत्व भज्जा के सुयोग्य पुत्र राजाराम जाट ने सम्भाला।

राजाराम जाट का इतिहास

पृथ्वीराज (गोकुला का चचेरा भाई) के पौत्र खानचंद ने उत्तराधिकार में सिनसिनी गाँव की सरदारी सम्भाली। खानचंद एक साहसी, वीर तथा योग्य सरदार था। उसने अपनी तलवार के बल पर सिनसिनी तथा उसके आस-पास आबाद अनेकों नगलों तथा गाँवों की जमींदारी प्राप्त कर ली थी। खानचंद के जैन खाँ, जूझा, ब्रजराज तथा भज्जा नामक चार पुत्र थे। जैन खाँ तथा उसकी संतानें नगला जाटौली, गांगरोजी में जाकर बसीं और यह वंश गढ़वालिया कहलाने लगा, जबकि जूझा की सन्तानों ने सिकरौदा, हींगोली, सौंख गूजर (परगना कठूमर) गाँवों में जमींदारियां उपार्जित कीं।

राजाराम के पूर्वज ब्रजराज और भज्जा

ब्रजराज तथा भज्जा ने सिनसिनी ग्राम की जमींदारी प्राप्त की। दोनों भ्राता अति उदार और दानवीर थे। पारिवारिक सद्भावना, प्रेम तथा एकता ने उनको प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। एक मजेदार कहानी सिनसिनवारों के आख्यान का अंग बन गयी है। ब्रजराज और भज्जा दोनों के पास मिलाकर एक जोड़ी बैल थे। उनके घर घास-फूस का एक छप्पर पड़ा हुआ था। एक दिन एक भट्ट भिक्षुक उनके द्वार पर आ गया, तो दोनां भाईयों ने उसे प्यार से खाना खिलाया और उसकी खूब आवभगत की। जब वह भिक्षुक जाने लगा तो भज्जासिहं उससे बोला, हम दक्षिणा दिये बगैर आपको नहीं जाने देंगे। यह हमारे धर्म के विरुद्ध है। हमारे पास देने के लिए और तो कुछ नहीं है, बैलों का ये जोड़ा ही है। आप दक्षिणा के रूप में इसको स्वीकार करें। भज्जा के इन वचनों को सुनकर वह भिक्षुक बहुत प्रसन्न हुआ और उसने दोनों भाईयों को आशीर्वाद प्रदान किया। उस दिन से भज्जा तथा ब्रजराज का भाग्य चमकने लगा।

ब्रजराज और भज्जा ने बनाई अपनी सैनिक टुकड़ी

ब्रजराज तथा भज्जा ने दो हजार सवारों की तथा भज्जा ने अपने निकटतम रिश्तेदारों से संयुक्त एक हजार सवारों की धार (टुकड़ी) तैयार की और सिनसिनवार डूँग को इस योग्य बनाया कि वह अपने स्वाधीन भविष्य तथा भाग्य का निर्माण कर सकें। यद्यपि दोनों भाई अधिक प्रभावशाली, गुरिल्ला जीवन के अभ्यस्त सरदार, लुटेरे अथवा योद्धा नहीं थे, फिर भी उनमें संगठन की क्षमता और स्वाधीनता की भावना थी, ब्रजराज, भज्जा तथा उसके पुत्र राजाराम ने परिस्थितियों से बाध्य होकर सिनसिनवार डूँग को अपनी पैतृक भूमियों पर संगठित किया और एक सफल सरदार के रूप में अकबराबाद सरकार में क्रांति की ज्वाला जलायी। अल्पकाल में राजाराम अपनी बन्धुत्व एकता के कारण प्रसिद्ध हो गया।

बहादुरी ने बढाई राजाराम जाट की ख्याति

जनश्रुति के अनुसार सिनसिनी के पास अऊ तहसील के थानेदार का नाम लालबेग था। यह अति कपटी, दुराचारी तथा लम्पट अधिकारी था। कहा जाता है कि एक अहीर अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ जा रहा था। दोपहर की तेज धूप के कारण वह अऊ कस्बे के समीप कुँआ तथा छायादार वृक्षों के नीचे भोजन तथा विश्राम के लिए रुका। उसी समय लालबेग खाँ थानेदार का एक भिश्ती कुएं पर पानी भर रहा था। वह उस स्त्री के रूप-लावण्य को देखकर चकित रह गया। उसने लालबेग खां को इसकी सूचना दी। थानेदार ने शीघ्र ही कुछ सिपाही भेजकर दम्पत्ति को बन्दी बनाकर मंगवा लिया और पति को जबरन बन्दीखाने में डालकर यातनाएं दीं।
जब यह समाचार भज्जा तथा उसके पुत्र राजाराम तक पहुँचा, उन्होंने भारतीय सतीत्व की रक्षा करने का संकल्प कर लिया। कार्तिक का महीना था। पूर्णिमा के दिन गोवर्धन में भारतीय परम्परा के अनुसार एक विशाल सांस्कृतिक पर्व मनाया जाता था। समीपस्थ गाँवों के सरदारों से मिलकर भज्जा तथा राजाराम ने निश्चय किया कि गोवर्धन मेले की आड़ में अऊ थानेदार की अनुमति लेकर गढ़ी के चारों ओर घास की पुँजें एकत्रित करदी जावें। शीघ्र ही गढ़ी के चारों ओर घास का पहाड़ लग गया। इन गट्ठरों के साथ राजाराम के कई नवयुवक सैनिक हथियार छिपाकर गढ़ी में चले गये। एक ओर से घास में आग लगा दी गयी। इससे आमिल, थानेदार तथा उसके सिपाहियों में भगदड़ मच गयी। राजाराम के साथी मुगल सैनिकों पर टूट पड़े और अनेक मुगलिया सैनिक खेत रहे। थानेदार लालबेग खाँ को घेरकर मार डाला गया। इस प्रकार राजाराम ने प्रथम बार अऊ पर आक्रमण करके ख्याति उपलब्ध की। उसकी धाक आस-पास के परगनों में द्रुतगति से फैल गयी।

जाट नायक रामकी चाहर ने दिया राजाराम जाट का जीवन भर साथ

आधुनिक भरतपुर शहर के उत्तर-पश्चिम में चार मील भयंकर जंगल तथा बाणगंगा और गम्भीर नदी के संगम से कुछ दूर खादरों से लगी सोगर नामक कच्ची मिट्टी की एक साधारण गढ़ी सोगरवार जाटों का प्रमुख स्थान था। सोगरिया जाटों ने भी अनेकों गाँवों की जमीदारियां प्राप्त कर ली थीं और ओल तथा हेलक परगने में अपना प्रभुत्व तथा प्रभाव बढ़ाया था। ये लोग भी लड़ाकू तथा लूटमार करने में निपुण थे। इन जाटों का नेतृत्व उस समय रामकी चाहर नाम नवयुवक ने सम्भाल रखा था और सोगर तथा आस-पास के कई गाँवों को गढ़ियों से सुरक्षित किया हुआ था। राजाराम ने सर्वप्रथम रामकी चाहर से मित्रता की। रामकी चाहर ने जीवन भर राजाराम का साथ दिया और उसकी कमान में उसकी सभी आज्ञाओं का पालन किया। इस एकता ने पश्चिम तटवर्ती (काठेड़) जाट शक्ति को एक माला में पिरो दिया। जाट किसान नवयुवकों ने अपने बुजुर्गों के आदेश पर जाट जमींदार सरदारों के नेतृत्व में स्वाधीनता की विजय पताका फहरायी और साम्राज्य की महान शक्ति को चुनौती दी। प्रत्येक जमींदार हलधर किसान अपने परिवार तथा तलवार की शक्ति संचय करने में लग गया।

राजाराम जाट के सामने झुके मुग़ल सम्राट

राजाराम जाट के नेतृत्व में जाट शक्ति काफी बढ़ गयी थी. मुग़ल सम्राट औरंगजेब जाटों को उखाड़ने के लिए आगरा सूबे में स्थाई मुगल सेना रखने में असमर्थ था। इसलिए औरंगजेब ने नम्रता का सहारा लिया। औरंगजेब ने राजाराम को वफादारी जाहिर करने के लिए दिल्ली आमन्त्रित किया। मुगल दरबार में उपस्थित होने से पूर्व राजाराम ने सिसिनवार डूँग तथा विभिन्न पालों की एक पंचायत की। बुजुर्ग सरदार जमींदार तथा चौधरियों ने एक स्वर में सम्राट के आमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। औरंगजेब द्वारा राजाराम का दिल्ली में सत्कार किया गया और लूटमार बन्द करने के आश्वासन पर उसे मथुरा की गद्दी तथा 575 गाँवों की जागीर दी गयी। राजाराम ने इस जागीर से सामयिक लाभ उठाया और यह जागीर जाटों के लिए वरदान और मुगल साम्राज्य के लिए काँटों का ताज साबित हुई। राजाराम ने नियमित बन्दूकची सवार की शर्त पर इनाम के रूप में अपने भाई-बन्धु तथा अन्य किसानों में इन गाँवों की धरती को बाँट दिया। भरतपुर राज्य की पट्टा प्रणाली अथवा सैनिक जागीर के विकास का यह प्रथम चरण था। इससे राजाराम तथा परवर्ती सिनसिनवार सरदारों को मात्र सम्मान ही नहीं मिला, अपितु उनको सैनिक शक्ति भी प्राप्त हुई, जिससे क्रान्ति, विकास तथा स्वाधीनता की परम्परा का मार्ग खुल गया।

राजाराम ने बढाई सेना की शक्ति

‘सैनिक सेवावृत्ति’ के कारण राजाराम को स्थाई बन्दूकची तथा सवार सेना रखने का अधिकार मिला। अन्य जाट सरदार तथा कुन्तल (खूँटेल) आगरा, धौलपुर, फतेहपुर सीकरी के जाट पाल सिनसिनवारों के साथ मिलकर एक संगठन में आबद्ध हो गये। राजाराम और रामकी चाहर ने अल्हड़ जाट नवयुवकों की एक नियमित सेना तैयार की और उनके हाथों में आग्नेय अस्त्र, बन्दूक आदि देकर उन्हें पूरा सिपाही बनाया। इनको गुरिल्ला युद्ध एवं दलनायक की आज्ञा में रहने की शिक्षा-दीक्षा दी। कुछ समय में ही उसके नेतृत्व में लगभग 20000 नवयुवक आकर एकत्रित हो गये। जाट अभियान छापामार प्रणाली तथा हिस्सेदारी पर आधारित था। इस प्रणाली के अनुसार पराजय के बाद सैनिकों को अपने अधिनायक की कमान में पुनः लौट आने का आदेश दिया जाता था। मुगल परगनों की लूट के माल असबाब तथा युद्ध सज्जा को सुरक्षित रखने के लिए उसने मार्गहीन बीहड़ जंगलों के बीच में स्थान-स्थान पर अनेकों छोटी-छोटी गढ़ियों का निर्माण कार्य शुरू हुआ और मुगल तोपखाने की पंक्ति से बचाने के लिए स्थायी प्रबन्ध किये। धीरे-धीरे सिनसिनी, पैंघोर, सोघर, सौंख, अवार, पींगोरा, इन्दौली, इकरन, अधापुर, अडीग, अछनेरा, गूजर-सौंख आदि अनेकों ग्राम एवं गढ़ियां इस क्रान्ति के प्रमुख गढ़ बन गयीं।

राजाराम ने अकबर की हड्डियों को जलाकर लिया गोकुला जाट की हत्या बदला

समय गुजरने के साथ राजाराम के हृदय में गोकला की हत्या का बदला लेने की आग तीव्रतर होती जा रही थी। गोकला के खून का बदला लेने के लिए वह हर समय तत्पर रहता था। वह औरंगजेब से गोकला का बदला लेना चाहता था। वह औरंगजेब को नीचा दिखाना चाहता था और उसको जाटों के अदम्य साहस का प्रमाण देकर उसको उसकी औकात बताने के लिए संकल्पबद्ध था। उसने अपने इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए ऐसा कार्य कर डाला, जिसने एक ओर तो जाटों के गौरव में चार चांद लगा दिये और दूसरी ओर उस काल के सर्वशक्तिमान सम्राट औरंगजेब को बुरी तरह से विचलित और अपमानित कर डाला। 1685 में एक दिन राजाराम अपने सैन्य बल के साथ सिकन्दरा जा पहुंचा। सिकन्दरा में औरंगजेब के परदादा अकबर का मकबरा था। राजाराम ने मकबरे के रक्षक दल को मारकर भगा दिया। राजाराम ने अकबर के मकबरे को जी भरकर लूटा। मकबरे में मौजूद सारे सोने-चांदी के बर्तन, मकबरे पर जलने वाले हीरे जड़ित स्वर्ण निर्मित दीपक और अन्य सभी बहुमूल्य वस्तुएं लूट लीं। उसने अकबर के मकबरे को लूटने के बाद भूमिसात कर दिया। जिन वस्तुओं को राजाराम अपने साथ नहीं ले जा पाया, उनको वहीं नष्ट कर दिया गया।
इसके बाद राजाराम ने अकबर की कब्र को खोद डाला और उसकी कब्र से अकबर की हड्डियों को निकाल लिया। और अकबर की हड्डियों को जलाकर यमुना नदी में प्रवाहित कर दिया गया।

 

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